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व्यक्ति विशेष – 761.

जैन धर्म की आचार्य आचार्य चंदना

आचार्य चंदना जी (जिन्हें ‘ताई महाराज’ के नाम से भी जाना जाता है).  जैन धर्म की एक विलक्षण साध्वी हैं, जिन्होंने समाजसेवा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया है. भारत सरकार ने उनके सामाजिक कार्यों के लिए उन्हें वर्ष 2022 में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया है.

आचार्य चंदना जी का जन्म 26 जनवरी, 1937 को महाराष्ट्र के चकलम्बा गाँव में हुआ था. उनके बचपन का नाम शकुंतला था. उनकी माता का नाम प्रेम कुंवर और पिता का नाम मानिकचंद है. महज 14 वर्ष की अल्पायु में ही उनके मन में वैराग्य की भावना जाग्रत हुई. उन्होंने उपदेश रत्न महाराज से दीक्षा ग्रहण कर जैन साध्वी के रूप में अपने कठिन आत्म-साधना के मार्ग पर निकल पड़ीं.

बारह वर्षों तक मौन व्रत धारण कर उन्होंने जैन धर्मग्रंथों और जीवन के गहन अर्थ का अध्ययन किया उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से दर्शनाचार्य की उपाधि साथ ही बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से नव्या-न्याय और व्याकरण में शास्त्री की उपाधि ली. उन्होंने अन्य संस्थानों से साहित्य रत्न और धार्मिक परीक्षाओं में उच्च योग्यता से पास किया.

आचार्य चंदना ने बिहार के राजगीर में वर्ष 1974 में वीरायतन नामक अंतरराष्ट्रीय धर्मार्थ संगठन की स्थापना की. जिसका उद्देश्य आध्यात्मिक विकास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और जाति-पंथ-लिंग से परे सेवा. उन्होंने नेत्र चिकित्सा, निःशुल्क अस्पताल, और शिक्षा के माध्यम से समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचने की कोशिस की.

 आचार्य चंदना के इस कदम ने सदियों पुरानी उस परंपरा को चुनौती दी, जिसमें साधु-साध्वी केवल विहार और प्रवचन तक सीमित रहते थे पर, उन्होंने दिखाया कि करुणा ही महावीर का सच्चा संदेश है.

बताते चलें कि, 2500 वर्षों के जैन समाज के इतिहास में यह पहली बार हुआ जब किसी महिला को ‘आचार्य’ की पदवी दी गई. वर्ष 1987 में चंदना को यह गौरव प्राप्त हुआ. यह केवल एक उपाधि नहीं थी, बल्कि महिला सशक्तिकरण और धार्मिक सुधार का एक बड़ा प्रतीक था.

 आचार्य चंदना का जीवन सिखाता है कि अहिंसा केवल जीव हत्या न करना नहीं है, बल्कि दूसरों के दुख को दूर करने का सक्रिय प्रयास है. उन्होंने यह सिद्ध किया कि त्याग और करुणा से समाज में गहरा परिवर्तन लाया जा सकता है.

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क्रान्तिकारी मानवेन्द्र नाथ राय

मानवेन्द्र नाथ रॉय एक भारतीय क्रान्तिकारी, दार्शनिक और राजनीतिक नेता थे. उनका जन्म 21 मार्च 1887 को बंगाल के एक छोटे गाँव में हुआ था. मानवेन्द्र नाथ रॉय को उनके राजनीतिक और सामाजिक विचारों के लिए जाना जाता है, जिसमें वे मार्क्सवादी और अंतर्राष्ट्रीयवादी विचारों को समर्थन करते थे.

रॉय ने अपने जीवन के कई वर्ष विदेश में बिताए, जहाँ उन्होंने मार्क्सवादी विचारधारा को अपनाया और इसके प्रचार में योगदान दिया. वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और बाद में उन्होंने रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी की स्थापना की। रॉय ने कई किताबें और निबंध लिखे जो सामाजिक और राजनीतिक विचारधाराओं पर चर्चा करते हैं.

उनके काम ने न केवल भारत में बल्कि विश्व स्तर पर भी विचारधारात्मक और राजनीतिक बहसों में योगदान दिया. उनका देहांत 25 जनवरी 1954 को हुआ था.

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साहित्यकार करतार सिंह दुग्गल

करतार सिंह दुग्गल एक भारतीय साहित्यकार थे जिनका जन्म 1 मार्च 1917 को रावलपिंडी, अविभाजित पंजाब में हुआ था. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज से प्राप्त की और अंग्रेज़ी में एम.ए. की डिग्री हासिल की. उनकी लेखनी में पंजाबी, हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाएँ शामिल थीं, और उन्होंने कहानियाँ, कविताएँ, उपन्यास, और नाटक लिखे.

दुग्गल ने अपने कैरियर के दौरान वर्ष 1942- 66 तक आकाशवाणी में विभिन्न पदों पर काम किया. इसके अलावा, वे वर्ष 1966- 73 तक नेशनल बुक ट्रस्ट के निदेशक और बाद में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में सलाहकार के रूप में कार्यरत रहे.

उनकी पत्नी का नाम ‘आयशा’ था और उनका एक पुत्र भी है. दुग्गल की कहानियों और कविताओं के कुल  24 संग्रह प्रकाशित हुए हैं, और उनके द्वारा लिखित नाटक और उपन्यास भी साहित्य संसार में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. उन्हें उनके योगदान के लिए वर्ष 1988 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया और उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ. करतार सिंह दुग्गल का निधन 26 जनवरी 2012 को दिल्ली में हुआ​​ था​​​​.

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कार्टूनिस्ट आर. के. लक्ष्मण

आर. के. लक्ष्मण (रासीपुरम कृष्णस्वामी अय्यर लक्ष्मण) भारत के सबसे प्रसिद्ध और सम्मानित कार्टूनिस्टों में से एक थे. वह अपनी व्यंग्यात्मक और सामाजिक टिप्पणियों के लिए जाने जाते थे और विशेष रूप से उनके द्वारा बनाया गया किरदार “कॉमन मैन” (आम आदमी) भारतीय समाज का प्रतीक बन गया. लक्ष्मण की कार्टून कला ने भारतीय राजनीति, समाज और आम लोगों की समस्याओं को अनोखे और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया.

आर. के. लक्ष्मण का जन्म 24 अक्टूबर 1921 को मैसूर में हुआ था. उनके भाई आर. के. नारायण, प्रसिद्ध लेखक और “मालगुड़ी डेज़” जैसी पुस्तकों के रचनाकार थे. लक्ष्मण ने बचपन से ही कला और चित्रांकन में गहरी रुचि दिखाई. वह अपने स्कूली दिनों में दीवारों पर और अपनी किताबों के किनारों पर स्केच बनाया करते थे. उनके द्वारा स्कूली पाठ्यपुस्तकों में बनाए गए चित्र यह दर्शाते थे कि वह कितना बड़ा कार्टूनिस्ट बनने वाले हैं.

हालांकि, लक्ष्मण को मुंबई के जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स में दाखिला नहीं मिला, लेकिन इससे उनका आत्मविश्वास कमजोर नहीं हुआ. उन्होंने स्वाध्याय के माध्यम से खुद को प्रशिक्षित किया और कार्टूनिस्ट बनने के अपने सपने को साकार किया.

लक्ष्मण ने अपने कैरियर की शुरुआत फ्रीलांस कार्टूनिस्ट के रूप में की थी. उन्होंने स्थानीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में कार्टून बनाने का काम शुरू किया. उनका पहला प्रमुख काम मुंबई स्थित “द फ्री प्रेस जर्नल” के लिए था, जहाँ उन्होंने कुछ समय के लिए बाल ठाकरे (जो बाद में शिवसेना के संस्थापक बने) के साथ काम किया.

हालांकि, लक्ष्मण को असली पहचान और प्रसिद्धि तब मिली जब उन्होंने “द टाइम्स ऑफ इंडिया” के लिए काम करना शुरू किया. वहाँ उन्होंने अपने प्रसिद्ध कार्टून कॉलम “यू सैड इट” (You Said It) की शुरुआत की, जो दशकों तक प्रकाशित होता रहा. इस कॉलम में उनके “कॉमन मैन” के पात्र के माध्यम से भारतीय राजनीति और समाज की स्थिति पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ की जाती थीं.

आर. के. लक्ष्मण का सबसे प्रसिद्ध योगदान “कॉमन मैन” का चरित्र है. यह एक साधारण भारतीय आदमी का प्रतीक है, जो देश के राजनीतिक और सामाजिक हालातों को बगैर किसी टिप्पणी के देखता रहता है. सफेद धोती-कुर्ता पहने, गंजे सिर और मोटे चश्मे वाला यह चरित्र भारतीय मध्यम वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है.

कॉमन मैन कभी कुछ नहीं कहता, सिर्फ घटनाओं का मूक दर्शक होता है, लेकिन उसके माध्यम से लक्ष्मण सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर तीखी टिप्पणियाँ करते थे. यह पात्र भारतीय जनता के लिए एक आइकन बन गया और इसने लक्ष्मण को व्यापक प्रसिद्धि दिलाई. आर. के. लक्ष्मण के कार्टून मुख्य रूप से राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर आधारित होते थे. उनके कार्टूनों में हास्य, व्यंग्य और सच्चाई का अनूठा मिश्रण था. उन्होंने भारतीय नेताओं, नौकरशाही, भ्रष्टाचार, और आम आदमी की कठिनाइयों पर कई कार्टून बनाए.

लक्ष्मण के कार्टून भारतीय समाज में चल रहे बदलावों, राजनीतिक घोटालों, और सामाजिक मुद्दों पर बहुत ही चुटीले और व्यंग्यात्मक तरीके से प्रतिक्रिया देते थे. उनके कार्टून कभी किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा के पक्षधर नहीं रहे; उन्होंने सभी पक्षों की आलोचना की और हमेशा निष्पक्ष रहे.

लक्ष्मण को पद्म भूषण (1973) और पद्म विभूषण (2005) से सम्मानित किया गया. वर्ष 1984 में उन्हें रामन मैगसेसे पुरस्कार मिला, जो एशिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है. उन्हें भारतीय कला और कार्टून की दुनिया में उनके अद्वितीय योगदान के लिए कई अन्य पुरस्कारों से भी नवाजा गया.

आर. के. लक्ष्मण ने भारतीय टेलीविजन पर भी काम किया और उनके कार्टून पात्रों पर आधारित “मालगुड़ी डेज़” को दूरदर्शन पर प्रसारित किया गया, जो एक अत्यधिक लोकप्रिय शो बना.

लक्ष्मण का निधन 26 जनवरी 2015 को पुणे में हुआ. उनके निधन के साथ भारतीय कार्टून और व्यंग्य कला के एक युग का अंत हो गया, लेकिन उनका योगदान आज भी भारतीय पत्रकारिता और समाज में जीवित है. उनके कार्टून भारतीय जनमानस में गहराई से बसे हुए हैं और वह आज भी एक प्रेरणास्रोत बने हुए हैं.

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