
सितार वादक पंडित रवि शंकर
पंडित रवि शंकर एक विश्व-प्रसिद्ध सितार वादक थे, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया. उनका जन्म 7 अप्रैल 1920 को वाराणसी में हुआ था और उनका निधन 11 दिसंबर 2012 को हुआ. रवि शंकर ने अपने संगीत कैरियर की शुरुआत एक नर्तक के रूप में की थी, लेकिन बाद में उन्होंने सितार को अपना मुख्य वाद्य बना लिया और उसमें अद्वितीय प्रतिभा दिखाई.
पंडित रवि शंकर ने अपने गुरु, उस्ताद अलाउद्दीन खान से संगीत की शिक्षा प्राप्त की. उन्होंने सितार पर कई नवाचार किए और शास्त्रीय रागों को नए ढंग से प्रस्तुत किया. रवि शंकर ने भारतीय संगीत को पश्चिमी दुनिया में भी लोकप्रिय बनाया, जिसमें उनके बीटल्स के जॉर्ज हैरिसन के साथ सहयोग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
पंडित रवि शंकर ने विभिन्न संगीत समारोहों में भाग लिया और अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किए गए, जिसमें भारत सरकार द्वारा प्रदान किए गए भारत रत्न भी शामिल हैं. उनकी संगीत शैली ने विश्व भर के संगीतकारों को प्रभावित किया और उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक दूत के रूप में माना जाता है.
========== ========= ===========
राष्ट्रीय महिला आयोग की पहली अध्यक्ष जयंती पटनायक
राष्ट्रीय महिला आयोग की पहली अध्यक्ष जयंती पटनायक थीं. जयंती पटनायक ने अपने कार्यकाल के दौरान महिलाओं के अधिकारों और कल्याण के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया. राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना वर्ष 1992 में हुई थी, और यह भारत सरकार का एक प्रमुख निकाय है जो महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव के मुद्दों को संबोधित करता है और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए काम करता है.
जयंती पटनायक का जन्म 07 अप्रैल 1932 को अस्का, गंजाम जिला, उड़ीसा में हुआ था. उनके पिता का नाम निरंजन पटनायक था. जयंती की प्रारंभिक शिक्षा हरिहर हाई स्कूल, अस्का में हुई थी. जयंती का विवाह वर्ष 1953 में जानकी बल्लभ पटनायक से हुयी, जो वर्ष 1980 – 89 तक उड़ीसा के मुख्यमंत्री रहे.
जयंती पटनायक ने आयोग के माध्यम से महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में सुधार लाने के लिए कई पहलें कीं. उनके नेतृत्व में, आयोग ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा, उनके शिक्षा और रोजगार के अवसरों में सुधार, और लैंगिक समानता के प्रोत्साहन के लिए विभिन्न कार्यक्रम और नीतियां विकसित कीं.
जयंती पटनायक की अध्यक्षता में, आयोग ने महिलाओं के मुद्दों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया और महिलाओं की भलाई के लिए जागरूकता फैलाई. उनका योगदान महिलाओं के अधिकारों और कल्याण के क्षेत्र में भारतीय समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में महत्वपूर्ण रहा है.
========== ========= ===========
अभिनेता जितेंद्र
जितेंद्र जिनका असली नाम रवि कपूर है. वो भारतीय सिनेमा जगत के एक प्रसिद्ध अभिनेता हैं और मुख्यतः हिंदी फिल्मों में अपने काम के लिए जाने जाते हैं. 7 अप्रैल 1942 को जन्मे जितेंद्र ने वर्ष 1960 के दशक से अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत की और वर्ष 1980 के दशक तक वे हिंदी सिनेमा के एक प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे. उन्होंने अपने कैरियर में 200 से अधिक फिल्मों में काम किया है.
जितेंद्र को विशेष रूप से उनकी उत्साही डांस स्टाइल और सफेद रंग के कपड़े पहनने की उनकी आदत के लिए जाना जाता है. वह अपनी फिल्मों में अक्सर ऊर्जावान और जीवंत नृत्य प्रस्तुतियों के लिए प्रसिद्ध हैं. उनकी कुछ सबसे मशहूर फिल्मों में “गीत गाया पत्थरों ने”, “फर्ज”, “मौसम”, “आँखों आँखों में”, “हिम्मतवाला”, और “तोहफा” शामिल हैं.
जितेंद्र ने न केवल रोमांटिक और एक्शन भूमिकाएं निभाई हैं, बल्कि कॉमेडी और पारिवारिक ड्रामा जैसी विधाओं में भी अपनी अदाकारी का जौहर दिखाया है. उनके अभिनय कैरियर के अलावा, जितेंद्र एक सफल निर्माता भी हैं और बालाजी टेलीफिल्म्स के संस्थापक हैं, जो टेलीविजन और फिल्मों में कई प्रसिद्ध प्रोजेक्ट्स का निर्माण कर चुकी है. उनकी बेटी एकता कपूर और बेटा तुषार कपूर भी भारतीय एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में सक्रिय हैं.
========== ========= ===========
सिने निर्देशक और निर्माता राम गोपाल वर्मा
राम गोपाल वर्मा जिनका जन्म 7 अप्रैल 1962 को विजयवाड़ा, आंध्र प्रदेश में हुआ था. राम गोपाल वर्मा भारतीय सिनेमा के एक प्रसिद्ध निर्देशक, निर्माता, स्क्रीनराइटर, और प्ले बैक सिंगर हैं. उन्होंने अपने कैरियर में हिंदी, तेलुगू और तमिल सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. वर्मा की शिक्षा B.Tech in Civil Engineering में हुई थी, लेकिन उन्होंने अपने जुनून के चलते फिल्म निर्देशन की ओर रुख किया.
राम गोपाल वर्मा ने अपने कैरियर की शुरुआत एक साइट इंजीनियर के रूप में की और बाद में हैदराबाद में एक वीडियो कैफ़े खोला, जहाँ से उनको साउथ इंडियन फिल्मों में काम मिलना शुरू हुआ. उनका पहला बड़ा ब्रेक वर्ष 1989 में तेलुगू फिल्म ‘शिवा’ से मिला, जिसके बाद उन्होंने हिंदी सिनेमा में भी अपने पाँव जमाए. उनकी प्रमुख फिल्मों में ‘सत्या’, ‘भूत’, ‘सरकार’, ‘डरना मना है’, और ‘एक हसीना थी’ शामिल हैं. वर्मा की फिल्में अक्सर उनके रोमांच और थ्रिल के लिए प्रसिद्ध हैं.
वर्मा का परिवार भी काफी विविध है, उनके पिता का नाम कृष्णम राजू वर्मा और माता का नाम सूर्यम्मा है. उनकी एक बेटी रेवती है. उनके जीवन में कई महिलाओं के साथ संबंध रहे हैं, जिसमें उर्मिला मातोंडकर, अंतरा माली, निशा कोठारी, मधु शालिनी (तेलुगु अभिनी) और दिवंगत जिया खान शामिल हैं.
राम गोपाल वर्मा अपनी अद्वितीय फिल्म निर्माण शैली के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसमें वे अक्सर समाज के अंधेरे पक्षों को उजागर करते हैं. उनकी फिल्मों में अक्सर गहराई से चित्रित किए गए पात्र और तीव्र ड्रामा होता है. वर्मा ने न केवल भारतीय सिनेमा में अपनी छाप छोड़ी है, बल्कि उन्होंने वैश्विक पटल पर भी अपनी पहचान बनाई है. उन्होंने ‘रंगीला’, ‘सरकार’, और ‘सत्या’ जैसी कुछ यादगार फिल्में बनाई हैं, जिन्होंने उन्हें क्रिटिक्स और दर्शकों से सराहना प्राप्त की है.
========== ========= ===========
अभिनेत्री शगुफ्ता अली
शगुफ्ता अली भारतीय फिल्म और टेलीविजन की एक अभिनेत्री हैं, जिन्होंने अपने अभिनय कौशल से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई है. उन्होंने विभिन्न धारावाहिकों और फिल्मों में अपनी बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है, जिससे वे भारतीय मनोरंजन उद्योग में एक महत्वपूर्ण नाम बन गई हैं.
शगुफ्ता अली का जन्म 7 अप्रैल 1967 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था. उनके पिता, शाहिद बिजनौरी, एक प्रसिद्ध अभिनेता, गीतकार और कवि थे, जिससे शगुफ्ता को कला और साहित्य का समृद्ध वातावरण मिला था. शगुफ्ता अली ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत वर्ष 1989 में टेलीविजन धारावाहिक “दर्द” से की. उसी वर्ष, उन्होंने फिल्म “कानून अपना अपना” से बॉलीवुड में प्रवेश किया.
शगुफ्ता अली ने कई लोकप्रिय टेलीविजन धारावाहिकों में काम किया है, जिनमें : “सांस” (1998-1999), “पुनर विवाह” (2012-2013), “एक वीर की अरदास…वीरा” (2013-2015), “ससुराल सिमर का”, “साथ निभाना साथिया” (2016-2017), “बेपनाह” (2018).
शगुफ्ता अली ने कई फिल्मों में भी अभिनय किया है, जिनमें: – “कानून अपना अपना” (1989), “इंद्रजीत” (1991), “हीरो नंबर 1” (1997), “मेहंदी” (1998), “सिर्फ तुम” (1999), “लैला मजनू” (2018).
शगुफ्ता अली ने निर्देशक शुजा अली से विवाह किया है. उनके दो बच्चे हैं: बेटी ज़ैनब अली और बेटा मोहम्मद अब्बास. शगुफ्ता ने अपने अभिनय कैरियर में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई हैं और भारतीय टेलीविजन और सिनेमा में अपनी पहचान बनाई है. उनके योगदान और संघर्षों की कहानी प्रेरणादायक है, और वे नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए एक मिसाल हैं.
========== ========= ===========
अभिनेत्री पार्वती…
पार्वती तिरुवोथु एक प्रतिष्ठित भारतीय अभिनेत्री हैं, जिन्होंने मुख्यतः मलयालम, तमिल, कन्नड़ और हिंदी सिनेमा में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया है. अपने सशक्त अभिनय और विविध भूमिकाओं के माध्यम से उन्होंने दर्शकों और समीक्षकों दोनों का दिल जीता है. वह महिला सशक्तिकरण की प्रबल समर्थक हैं और फिल्म उद्योग में महिलाओं के अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से कार्यरत हैं.
पार्वती का जन्म 7 अप्रैल 1988 को केरल के कोझीकोड में हुआ था. उनके माता-पिता, पी. विनोद कुमार और टी. के. उषा कुमारी, दोनों वकील हैं. उनका एक भाई भी है, जिसका नाम ओम तिरुवोथु करुणाकरण है. शिक्षा के लिए उनका परिवार तिरुवनंतपुरम स्थानांतरित हो गया, जहां उन्होंने केंद्रीय विद्यालय, पंगोडे से स्कूली शिक्षा प्राप्त की. बाद में, उन्होंने ऑल सेंट्स कॉलेज, तिरुवनंतपुरम से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की डिग्री हासिल की. पार्वती एक प्रशिक्षित भरतनाट्यम नृत्यांगना भी हैं और उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत किरण टीवी में एक टेलीविजन एंकर के रूप में की थी.
पार्वती ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत वर्ष 2006 में मलयालम फिल्म “आउट ऑफ सिलेबस” से की, जिसमें उन्होंने गायत्री की भूमिका निभाई. उसी वर्ष, उन्होंने “नोटबुक” फिल्म में पूजा कृष्णन का किरदार निभाया, जिससे उन्हें पहचान मिली. वर्ष 2008 में, तमिल फिल्म “पू” में मारी की भूमिका में उनके प्रदर्शन को अत्यधिक सराहा गया, जिससे उन्होंने तमिल सिनेमा में भी अपनी जगह बनाई. इसके बाद, उन्होंने कन्नड़ फिल्म “मिलाना” (2007) में अंजलि की भूमिका निभाई, जो एक व्यावसायिक सफलता थी. पार्वती ने वर्ष 2017 में हिंदी फिल्म “करीब करीब सिंगल” में इरफान खान के साथ जया शशिधरन की भूमिका निभाई, जिससे उन्होंने बॉलीवुड में भी अपनी पहचान बनाई.
========== ========= ===========
कवि जानकी वल्लभ शास्त्री
जानकी वल्लभ शास्त्री जिनका जन्म 5 फरवरी 1916 को बिहार के मैगरा गाँव में हुआ था. वो हिन्दी और संस्कृत साहित्य के प्रतिष्ठित कवि और लेखक थे. उन्होंने अपनी शिक्षा बिहार-उड़ीसा की प्रथमा परीक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण करते हुए आरंभ की और बाद में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की. उनका लेखन कैरियर विविध विधाओं में फैला हुआ था, जिसमें कविता, नाटक, उपन्यास, संस्मरण, और समीक्षा शामिल हैं.
उनकी प्रमुख कृतियों में ‘राधा’ (महाकाव्य), ‘काकली’ (संस्कृत काव्य), और ‘निराला के पत्र’ (संपादित पत्र-साहित्य) आदि शामिल हैं. उन्होंने अपनी रचनाओं में समीक्षात्मक और रचनात्मक ग्रंथों के माध्यम से हिन्दी साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की. उनका पहला गीत ‘किसने बांसुरी बजाई’ विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ और उन्हें छायावाद के पांचवें कवि के रूप में जाना जाता है, हालांकि उन्होंने अपने लेखन में छायावादी अतिशयोक्ति और रहस्यात्मकता से परे एक अलग पहचान बनाई.
उन्हें उनके साहित्यिक योगदान के लिए दयावती पुरस्कार, राजेन्द्र शिखर सम्मान, भारत-भारती सम्मान, साधना-सम्मान, और शिवपूजन सहाय सम्मान जैसे अनेक सम्मानों से नवाज़ा गया. इसके बावजूद, उन्होंने पद्मश्री सम्मान को अस्वीकार कर दिया था, जो उनके स्वाभिमान और सिद्धांतों को दर्शाता है. उनका निधन 7 अप्रैल 2011 को मुजफ्फरपुर में हुआ, और उनके जाने के बाद भी उनकी कृतियां हिन्दी साहित्य में एक अमूल्य निधि के रूप में स्थान रखती हैं.
========== ========= ===========
सिनेमेटोग्राफ़र वी. के. मूर्ति
वेंकटरामा पंडित कृष्णमूर्ति, जिन्हें वी. के. मूर्ति के नाम से जाना जाता है. उनका जन्म 26 नवंबर 1923 को मैसूर, कर्नाटक में हुआ था. मूर्ति ने अपने कैरियर की शुरुआत में मुंबई जाकर फिल्म उद्योग में काम पाने की कोशिश की, लेकिन पहले प्रयास में सफलता नहीं मिली. वापस लौटकर उन्होंने ‘बैंगलोर इंस्टीट्यूट’ में सिनेमाटोग्राफी की शिक्षा ली और डिप्लोमा प्राप्त किया.
मूर्ति ने वर्ष 1951- 2001 तक चलचित्रण में अपनी सेवाएं दीं और विशेष रूप से गुरु दत्त की फ़िल्मों के लिए जाने जाते हैं. उन्हें सिनेमास्कोप में शूट करने वाले पहले भारतीय सिनेमाटोग्राफर के रूप में पहचाना जाता है और वह दादा साहब फाल्के सम्मान प्राप्त करने वाले पहले सिनेमाटोग्राफर भी थे.
उनका पहला प्रमुख प्रोजेक्ट वर्ष 1952 में फिल्म ‘जाल’ थी, जिसमें वह गुरुदत्त के साथ काम कर रहे थे. मूर्ति और गुरुदत्त की मुलाकात ‘बाजी’ फिल्म के दौरान हुई थी, और मूर्ति की प्रतिभा से प्रभावित होकर गुरुदत्त ने उन्हें अपने साथ काम करने का ऑफर दिया. इस सहयोग ने हिंदी सिनेमा को ‘कागज़ के फूल’, ‘प्यासा’, ‘चौदहवीं का चांद’, और ‘साहिब, बीबी और ग़ुलाम’ जैसी कई यादगार फिल्में दीं.
उनके काम की पहचान इतनी अद्वितीय थी कि उनके काम की पहचान इतनी अद्वितीय थी कि उन्होंने ‘कागज़ के फूल’ और ‘साहिब, बीबी और ग़ुलाम’ फिल्मों में प्रकाश और छाया का इस्तेमाल करके सिनेमाटोग्राफी के क्षेत्र में नए मानक स्थापित किए. उनके इस अनूठे काम के लिए उन्हें वर्ष 1959 – 62 में ‘सर्वश्रेष्ठ सिनेमाटोग्राफर’ के लिए फिल्म फेयर पुरस्कार मिला. उनकी प्रतिभा ने न सिर्फ भारतीय सिनेमा में उनका नाम अमर कर दिया, बल्कि 2008 में उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.
7 अप्रैल 2014 को, 91 वर्ष की आयु में बेंगलुरु में वी. के. मूर्ति का निधन हो गया, लेकिन उनकी अद्वितीय शैली और अविस्मरणीय फिल्में हमेशा भारतीय सिनेमा की अमूल्य धरोहर के रूप में याद की जाएंगी.