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बौद्ध संस्कृति…

चीनी सम्राट मिंग ति के निमंत्रण पर दो भारतीय बौद्ध विद्वान 67 ई. में सबसे पहले चीन गए थे। एक का नाम काश्यप मातंग और दूसरे का नाम धर्मरक्षित था। धर्मरक्षित का एक नाम धर्मरत्न भी मिलता है।काश्यप मातंग का जन्म मगध में हुआ था। लेकिन चीन जाते समय वे गांधार में रहते थे। काश्यप मातंग और धर्मरत्न बौद्ध धर्म की पुस्तकें चीन ले गए। वे एक श्वेत घोड़े पर सवार होकर गए थे।चीनी सम्राट ने उनके रहने के लिए श्वेताश्व विहार का निर्माण करवाया। यही चीन का प्राचीनतम बौद्ध विहार था।शुरुआती दौर में बौद्ध धर्म को कनफ्यूसियस‌ मतानुयायियों के विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे चीन में बौद्ध धर्म का समर्थन प्राप्त होने लगा। द्वितीय सदी के प्रसिद्ध दार्शनिक मोत्सू ने बौद्ध धर्म को कनफ्यूसियस के धर्म से श्रेष्ठ बताया।चीनी सम्राट वु (265-290 ई.) तथा मिन् (313-316 ई.) के समय में यहाँ अनेक बौद्ध मठों एवं विहारों का निर्माण हुआ।

लगभग 100 वर्षों बाद दक्षिणी चीन के राजा लियांग-वूती ने बौद्ध धर्म को राजधर्म का दर्जा दिया। वेई, सुई और तांग राजवंशों ने बौद्ध धम्म को राजकीय संरक्षण दिए।तांग काल को तो इतिहास में ” चीन का बौद्ध काल ” कहा जाता है।तांग काल में प्रभाकर मित्र, दिवाकर, बोधिरुचि, अमोघवज्र, वज्रमित्र जैसे बौद्ध विद्वान चीन गए।अनेक चीनी यात्री भी बौद्ध ग्रंथों की खोज में भारत आए। फाहियान, ह्वेनसांग और इत्सिंग इनमें सर्वाधिक प्रमुख हैं।भारत के कई बौद्ध विद्वान चीन में काफी लोकप्रिय हुए। उनमें एक नाम बोधिधर्म का है। काँचीपुरम के बोधिधर्म वहाँ इतने लोकप्रिय हुए कि उनकी वहाँ पूजा की जाने लगी।बौद्ध धर्म के प्रचार के साथ चीन में अनेक बौद्ध गुफाएँ बनाई गईं। इन गुफाओं में कहीं चट्टानें काट कर बड़ी बड़ी मूर्तियाँ बनाई गईं तो कहीं उनके अंदर चित्रकारी की गई।

दुन-हुआंग और लांग-मेन के बौद्ध गुफा परिसर दुनिया में प्रसिद्ध है।कोरियाई देशों में बौद्ध धम्म 372 ई. में चीन से पहुँचा। कोरिया चीन के उत्तर-पूर्व में स्थित है। सबसे पहले सुन्दो नामक एक बौद्ध भिक्षु बुद्ध की मूर्ति और सूत्र लेकर कोरिया पहुँचे।बाद में 384 ई. में बौद्ध आचार्य मल्लानंद कोरिया गए। कोरिया के प्योंगयांग नगर में एक भारतीय बौद्ध भिक्षु ने 404 ई. में दो मठों का निर्माण कराया था। उसके बाद अनेक बौद्ध विद्वान कोरिया गए। कोरिया से भी अनेक यात्री ज्ञान की खोज में भारत आए।बड़ी संख्या में बौद्ध ग्रंथों का कोरिया की भाषा में अनुवाद हुए।

आठवीं सदी में कोरियाई यात्री हाइचो बौद्ध संस्कृति को जानने के लिए भारत की यात्रा की। वे पूर्वी भारत में 724 ई. में पहुँचे थे।उन्होंने सारनाथ, राजगीर, कुशीनगर और बौद्ध गया के प्रसिद्ध स्तूपों को देखा। बताया कि सभी मगध राज्य में हैं। सारनाथ के अशोक स्तंभ से वे बहुत प्रभावित हुए।जापान में बौद्ध धम्म कोरिया से पहुँचा। बात 552 ई. की है।उस समय कोरिया के सम्राट ने जापानी सम्राट के लिए अनेक प्रकार की भेंट भेजी, जिनमें बौद्ध मूर्तियाँ, सूत्र, पूजा की वस्तुएँ और उनके साथ अनेक कलाकार एवं वास्तुकार आदि शामिल थे। जल्द ही जापान में बौद्ध धर्म प्रभावशाली हो गया। वहाँ जिस लिपि में बौद्ध सूत्र लिखे जाते थे, उसे शित्तन कहा जाता है। यह शित्तन वस्तुतः सिद्धम का दूसरा रूप है।

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Two Indian Buddhist scholars first went to China in 67 AD at the invitation of Chinese Emperor Ming Ti. One’s name was Kashyap Mathang and the other’s name was Dharmarakshit. One name Dharmarakshit is also known as Dharmaratna. Kashyap Matang was born in Magadha. But while going to China, he lived in Gandhara. Kashyapa Mathang and Dharmaratna took the books of Buddhism to China. He went riding on a white horse. The Chinese emperor built Shvetashva Vihara during his stay. This was the oldest Buddhist monastery in China. In the early days, Buddhism had to face opposition from the followers of Confucius. But gradually Buddhism started gaining support in China. Famous philosopher Motsu of the second century described Buddhism as superior to the religion of Confucius. During the time of Chinese Emperor Wu (265-290 AD) and Min (313-316 AD), many Buddhist monasteries and viharas were built here.

About 100 years later, King Liang-wu of Southern China made Buddhism the state religion. The Wei, Sui, and Tang dynasties gave state patronage to Buddhism. The Tang period is known in history as the “Buddhist period of China”. Buddhist scholars like Prabhakara Mitra, Divakara, Bodhiruchi, Amoghavajra, and Vajramitra went to China during the Tang period. Chinese travelers also came to India in search of Buddhist texts. Fahien, Hiuen Tsang, and Etsing are the most prominent among them. Many Buddhist scholars from India became very popular in China. One of them is named Bodhidharma. Bodhidharma of Kanchipuram became so popular that he was worshiped there. With the spread of Buddhism, many Buddhist caves were built in China. In these caves, big statues were made by cutting rocks, and somewhere paintings were done inside them.

The Buddhist cave complexes of Dun-Huang and Long-Men are famous around the world. Buddhism arrived in Korean countries from China in 372 AD. Korea is located in the northeast of China. First of all, a Buddhist monk named Sundo reached Korea with Buddha’s idol and sutra. Later in 384 AD, Buddhist teacher Mallananda went to Korea. An Indian Buddhist monk built two monasteries in Pyongyang city of Korea in 404 AD. After that many Buddhist scholars went to Korea. Many travelers from Korea also came to India in search of knowledge. A large number of Buddhist texts were translated into the Korean language.

In the eighth century, the Korean traveler Haicho traveled to India to know about Buddhist culture. He reached eastern India in 724 AD. He saw the famous stupas of Sarnath, Rajgir, Kushinagar, and Bodh Gaya. Told that all are in Magadha state. He was greatly influenced by the Ashoka Pillar of Sarnath. Buddhism reached Japan from Korea. It is about 552 AD. At that time, the Emperor of Korea sent many types of gifts to the Japanese Emperor, including Buddhist idols, sutras, and objects of worship, and many artists and architects, etc. were included with them. Buddhism soon became dominant in Japan. The script in which Buddhist sutras were written there is called Shittan. This Shittan is actually another form of Siddham.

Prabhakar Kumar.

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