हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी संक्रांति आ ही गई. आज के बाद भगवान भास्कर उत्तरायण हो जायेंगें. अब धीरे-धीरे हेमंत ऋतू या यूँ कहें कि भीषण ठंड से निजात मिलने के दिन आ रहें हैं. आखिर संक्रांति के बाद ही क्यूँ हेमंत ऋतू समाप्त होता है. आखिर क्या कारण है कि प्रति वर्ष 14-15 जनवरी के बाद ही मौसम का मिजाज ठीक होता है साथ ही यह भी जानते हैं कि इस समय को मकर संक्रांति क्यों कहते है और इसका महत्व क्या है?
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, संक्रमण पर्व मकर संक्रान्ति में मकर का विशेष महत्व बताया गया है. इसकी अलग तरह से विवेचना की गई है. चुकीं मकर मत्स्य वर्ग में आता है और माँ गंगा का वाहन भी है और गंगा को मकरवाहिनी भी कहते है. वायुपुराण के अनुसार, मकर को नौ निधियां भी कहते हैं. ये नौ निधियां हैं पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द नील और खर्व. पृथ्वी की एक अक्षांश रेखा को मकर रेखा कहते हैं जबकि, ज्योतिष गणना के बारह राशियों में से दसवीं राशि का नाम मकर है. श्रीमद्भागवत के अनुसार, सुमेरु पर्वत के उत्तर में दो पर्वत हैं उनमें से एक का नाम मकर पर्वत भी है. पुरानों के अनुसार, कामदेव की पताका का प्रतीक होता है मकर इसीलिए, कामदेव को मकरध्वज भी कहा जाता है.
पुरानों के अनुसार तिल के 6 प्रकार के उपयोग बताये गये हैं. ये उपाय… तिल मिश्रित स्नान, तिल का उबटन, तिल का तिलक, तिल मिश्रित जल, तिल का हवन और तिल का भोजन. कहा जाता है कि, तिल समस्त रोगों का नाश करता है जबकि, तिल स्नेह का और गुड मिठास का प्रतीक माना जाता है. महाभारत पुराण के अनुसार, संक्राति के अवसर पर तिल दान एवं तिल खाने की बात को स्वीकार किया गया है. उसके बाद से ही पुरे भारत वर्ष में मकर संक्रांति के अवसर पर तिल खाने और दान करने की परम्परा चली आ रही है. यह संस्कृति चुकीं महाभारत काल की आस्था, पौराणिक जन-विश्वास प्राकृतिक निधि, जलदेवता, वरुणा तथा गंगा वाहन मकर से जुड़ा हुआ है और सूर्य-रश्मियों के क्रान्तिकारी उत्कर्ष से भरा है और संक्रान्ति के अवसर पर गायत्री महामंत्र से सूर्योपासना का संदेश छुपा हुआ होता है.
संकलन: – ज्ञानसागरटाइम्स टीम.
Video Link: – https://youtu.be/38-41ySf250



