सुन्दरकाण्ड-09… - Gyan Sagar Times
Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-09…

...हनुमान-रावण संवाद...

दोहा :-

कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।

सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद ।।

वालव्याससुमनजीमहाराज

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमान जी को देखकर रावण दुर्वचन कहता हुआ खूब हँसा. फिर पुत्र वध का स्मरण किया तो उसके ह्रदय मे विषाद (दुःख)  उत्पन्न हो गया.

चौपाई :-

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।

की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, लंकापति रावण ने कहा – रे वानर ! तू कौन है ? किसके बल पर तूने वन को उजाड़कर नष्ट कर डाला ? क्या तूने कभी मेरे बारे में कानो से नही सुना है ? रे शठ ! मै तुझे अत्यंत निःशंख देख रहा हूँ.

मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।

सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, तूने किस अपराध से राक्षसो को मारा ? रे मूर्ख ! बता, क्या तुझे प्राण जाने का भय नही है? हनुमान् जी ने कहा – हे रावण ! सुन, जिनका बल पाकर माया, संपूर्ण ब्रह्मांडो के समूहो की रचना करती है.

जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।

जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, जिनके बल से हे दशशीश ! ब्रह्मा, विष्णु, महेश सृष्टि का सृजन, पालन और संहार करते है, जिनके बल से सहस्रमुख ( फणो ) वाले शेष जी पर्वत और वन सहित समस्त ब्रह्मांड को सिर पर धारण करते है.

धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।

हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, जो देवताओ की रक्षा के लिए नाना प्रकार की देह धारण करते है और जो तुम्हारे जैसे मूर्खो को शिक्षा देने वाले है, जिन्होने शिवजी के कठोर धनुष को तोड़ डाला और साथ ही राजाओ के समूह का गर्व भी चूर्ण कर दिया.

खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, जिन्होने खर, दूषण, त्रिशिरा और बालि को भी मार डाला, जो सब के सब अतुलनीय बलवान् थे.

दोहा :-

जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।

तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, जिनके लेशमात्र बल से तुमने समस्त चराचर जगत् को जीत लिया और जिनकी प्रिय पत्नी को तुम चोरी से हर लाए हो, और  मैं उन्ही का दूत हूँ.

चौपाई :-

जानउँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।

समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, मैं तुम्हारी प्रभुता को खूब जानता हूँ सहस्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी और बालि से युद्ध करके तुमने यश प्राप्त किया था. हनुमानजी के मार्मिक वचन सुनकर रावण ने हँसकर बात टाल दी.

खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।

सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हे स्वामी मुझे भूख लगी थी, इसलिए मैने फल खाए और वानर स्वभाव के कारण वृक्ष तोड़े. हे निशाचर के मालिक ! देह सबको परम प्रिय है. कुमार्ग पर चलने वाले दुष्ट राक्षस जब मुझे मारने लगे.

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।

मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, तब जिन्होने मुझे मारा , उनको मैने भी मारा. उस पर तुम्हारे पुत्र ने मुझको बाँध लिया. किन्तु  मुझे अपने बाँधे जाने की कुछ भी लज्जा नही है. मै तो अपने प्रभु का कार्य करना चाहता हूँ.

बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।

देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हे रावण ! मै हाथ जोड़कर तुमसे विनती करता हूँ, तुम अभिमान छोड़कर मेरी सीख सुनो. तुम अपने पवित्र कुल का विचार करके देखो और भम्र को छोड़कर भयहारी भगवान् को भजो.

जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।

तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, जो देवता, राक्षस और समस्त चराचर को खा जाता है, वह काल भी जिनके डर से अत्यंत डरता है, उनसे कदापि वैर न करो और मेरे कहने से जानकी जी को दे दो.

प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।

गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, खर के शत्रु श्रीरघुनाथजी शरणागतो के रक्षक और दया के समुन्द्र है. उनकी शरण जाने पर प्रभु तुम्हारा अपराध भुलाकर तुम्हे अपनी शरण में रख लेंगे.

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।

रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, तुम श्रीरामजी के चरण कमलो को ह्रदय मे धारण करो और लंका का अचल राज्य करो. ऋषि पुलस्त्यजी का यश निर्मल चंद्रमा के समान है. उस चन्द्रमा में तुम कलंक न बनो.

राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।

बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, राम नाम के बिना वाणी शोभा नही पाती, मद-मोह को छोड़, विचारकर देखो. हे देवताओ के शत्रु ! सब गहनो से सजी हुई सुंदरी स्त्री भी कपड़ो के बिना नंगी शोभा नही पाती.

राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।

सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, रामविमुख पुरूष की संपत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसकी पाना न पाने के समान है. जिन नदियो के मूल मे कोई जलस्त्रोत नही है या यूँ कहें कि (जिन्हे केवल बरसात ही आसरा है ) वे वर्षा बीत जाने पर फिर तुरंत ही सूख जाती है.

सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।

संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हे रावण ! सुनो, मै प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि रामविमुख की रक्षा करने वाला कोई भी नही है. हजारो शंकर, विष्णु और ब्रह्मा भी श्रीरामजी के साथ द्रोह करने वाले तुमको नही बचा सकते हैं.

दोहा :-

मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।

भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, मोह ही जिनका मूल है ऐसे अज्ञानजनित, बहुत पीड़ा देने वाले, तमरूप अभिमान का त्याग कर दो और रघुकुल के स्वामी, कृपा के समुन्द्र भगवान् श्रीरामचन्द्रंजी का भजन करो.

चौपाई :-

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।

बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, यद्यपि हनुमान् जी ने भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और नीति से सनी हुई बहुत ही हित की वाणी कही, तो भी वह महान् अभिमानी रावण हँसकर बोला कि हमे यह बंदर बड़ा ज्ञानी गुरू मिला!

मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।

उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, रे दुष्ट ! तेरी मृत्यु निकट आ गई है. रे अधम ! मुझे शिक्षा देने चला है. हनुमान् जी ने कहा – इससे उलटा ही होगा अर्थात् मृत्यु तेरी निकट आई है, मेरी नही. यह तेरा मतिभ्रम ( बुद्धि का फेर ) है, मैने प्रत्यक्ष जान लिया है.

सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।

सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हनुमान् जी के वचन सुनकर वह बहुत ही कुपित हो गया और बोला – अरे ! इस मूर्ख का प्राण शीघ्र ही क्यो नही हर लेते ? सुनते ही राक्षस उन्हे मारने दौड़े उसी समय मंत्रियो के साथ विभीषण जी वहाँ आ पहुँचे.

नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।

आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, उन्होने सिर नवाकर और बहुत विनय करके रावण से कहा कि दूत को मारना नही चाहिए, यह नीति के विरुद्ध है. हे गोसाई. कोई दूसरा दंड दिया जाए. सबने कहा – भाई ! यह सलाह उत्तम है.

सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, यह सुनते ही रावण हँसकर बोला – अच्छा तो, बंदर को अंग-भंग करके भेज दिया जाए.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्री रामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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