धनतेरस या धन्वन्तरी… - Gyan Sagar Times
Dhram Sansar

धनतेरस या धन्वन्तरी…

ॐ नमो भगवते धन्वन्तरये अमृत कलश हस्ताय सर्व आमय

                  विनाशनाय त्रिलोक नाथाय श्री महाविष्णुवे नम: ||

हिन्दू परम्परा के अनुसार कार्तिक का महिना बड़ा शुभ माना गया है, कृष्ण पक्ष हो शुक्ल पक्ष . कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को दीपावली का पर्व मनाया जाता है. पांच पर्वो का मिश्रण है दीपावली, इसकी शुरुआत धनतेरस या यूँ कहें आयुर्वेदाचार्य धन्वन्तरी देव की पूजा- अराधना की जाती है. धनतेरस का अर्थ होता है रुपैया-पैसा और सम्पत्ति होता है और तेरस का अर्थ होता है कृष्ण पक्ष का तेरहवां दिन. हिन्दू परम्परा के अनुसार सुख-समृद्धि, यश और वैभव का पर्व माना जाता है. कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन को मनाए जाने वाले इस महापर्व के बारे में स्कन्द पुराण में लिखा गया है कि, इसी दिन देवताओं के वैद्य धन्वंतरि अमृत कलश सहित सागर मंथन से प्रकट हुए थे, जिस कारण इस दिन धनतेरस के साथ-साथ धन्वंतरि जयंती भी मनाई जाती है. चुकीं धन्वंतरी को हिन्दू धर्म के अनुसार देवताओं के वैद्य (डॉक्टर) माने जाते है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये भगवान विष्णु के अवतार माने जाते हैं, पौराणिक कथाओं के अनुसार जब समुद्र मंथन हुआ था तो कार्तिक कृष्ण  पक्ष त्रयोदशी को धन्वंतरी, चतुर्दशी को माँ काली और अमावस्या को माँ भगवती लक्ष्मी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था.

धन्वंतरी को भगवान विष्णु का रूप भी कहते हैं जिनकी चार भुजायें हैं, उपर की दोंनों भुजाओं में शंख और चक्र  धारण किये हुये हैं, बाकी अन्य दो भुजाओं में जलूका व औषध और अमृत कलश लिए हुए हैं. इनका प्रिय धातु पीतल है, इसीलिये धनतेरस को पीतल आदि के बर्तन खरीदने की परंपरा भी है. धन्वंतरी को आयुर्वेद की चिकित्सा करनें वाले वैद्य आरोग्य देवता भी कहते हैं, इन्होंने ही अमृतमय औषधियों की खोज की थी. इन्ही के वंशज दिवोदास हुए, जिन्होंने “शल्य चिकित्सा” का पहला विद्यालय काशी में खोला, जिसके प्रधानाचार्य सुश्रत बनाये गये थे. “सुश्रत” ॠषि विश्वामित्र के पुत्र थे और उन्होंने ही “सुश्रत संहिता” लिखी थी. विश्व के पहले शल्य चिकित्सक के रूप में जाने जाते हैं “सुश्रत”. कहा जाता है की, जब भगवान शंकर ने विषपान किया था, तब  धन्वंतरि ने अमृत प्रदान किया, इस प्रकार काशी कालजयी नगरी बन गयी.

वैदिक काल में जो महत्व और स्थान अश्विनी को प्राप्त था वही पौराणिक काल में धन्वंतरि को प्राप्त हुआ. जहाँ अश्विनी कुमारों के हाथ में मधुकलश था, वहीं धन्वंतरि को अमृत कलश मिला, क्योंकि भगवान विष्णु ही संसार की रक्षा करते हैं, अत: रोगों से रक्षा करने वाले धन्वंतरि को विष्णु का अंश ही माना गया. पौराणिक कथाओं में महाभारत के अनुसार “कश्यप और तक्षक का संवाद”, ठीक उसी प्रकार धन्वंतरि और नागदेवी मनसा का ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी आया है, उन्हें गरुड़ का शिष्य कहा गया है.

मन्त्र:-

ॐ धन्वंतरये नमः॥

कथा:-

एक बार की बात है कि, यमराज ने यमदूतों से पूछा कि, प्राणियों को मृत्यु की गोद में सुलाते समय तुम्हारे मन में कभी दया का भाव आता क्या? दूतों ने यमदेवता के भय से पहले तो कहा कि, वह अपना कर्तव्य निभाते है और उनकी आज्ञा का पालन करते हैं, परंतु जब यमदेवता ने दूतों के मन का भय दूर कर दिया, और उन्होंने कहा कि, एक बार राजा हेमा के ब्रह्मचारी पुत्र का प्राण लेते समय उसकी नवविवाहिता पत्नी का विलाप सुनकर हमारा हृदय भी पसीज गया था, लेकिन विधि के विधान के अनुसार हम चाह कर भी कुछ न कर सके.

एक दूत ने बातों ही बातों में तब यमराज से प्रश्न किया कि, अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय है क्या? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए यम देवता ने कहा कि, जो प्राणी धनतेरस की शाम को यम के नाम पर दक्षिण दिशा में दीया जलाकर रखता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती है. इस मान्यता के अनुसार धनतेरस की शाम को आम-आवाम अपने आँगन में यम देवता के नाम पर दीप जलाकर रखते हैं. देश के कई भागों में धनतेरस के दिन भगवान यम की पूजा-अराधना भी करते हैं.

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