Dharm

सुन्दरकाण्ड-16.

विभीषण का भगवान् श्रीरामजी की शरण के लिए प्रस्थान और शरण प्राप्ति

दोहा: –

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, श्रीरामचंद्रजी संकल्प एवं  सर्वसमर्थ प्रभु है. हे रावण तुम्हारी सभा काल के वश है. अतः मै अब श्रीरघुवीर की शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना.

चौपाई: –  

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।

साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गए. शिवजी कहते है –  हे भवानी साधू का अपमान ही संपूर्ण कल्याण का नाश कर देता है.

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।

चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, रावण ने जिस क्षण विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा ऐश्र्वर्य से हीन हो गया. विभीषणजी हर्षित होकर मन में अनेको मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथ जी के पास चले.

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।

जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, मैं जाकर भगवान् के कोमल और लाल वर्ण के सुन्दर चरण कमलो के दर्शन करूँगा, जो सेवको को सुख देने वाले है, जिन चरणो का स्पर्श पाकर ऋषि पत्नी अहल्या तर गई और जो दंडकवन को पवित्र करने वाले है.

जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।

हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जिन चरणो को जानकी जी ने हृदय में धारण कर रखा है, जो कपटमृग के साथ पृथ्वी पर ( उसे पकड़ने को ) दौड़ थे और जो चरणकमल साक्षात् शिवजी के हृदय रूपी सरोवर मे विराजते है, मेरा अहोभाग्य है कि उन्ही को आज मैं देखूँगा.

महात्मा भवन,

श्रीरामजानकी मंदिर,

राम कोट, अयोध्या.

Mob: – 8709142129.

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Sunderkand-16.

Vibheeshan Ka Bhagaban ShriRama jI ki Sharan ke liye Prasthan Aur Sharan Prapti

Doha: –

Raamu Satyasankalp Prabhu Sabha Kaalabas Toree

Maee RaghubIr Saran Ab Jaau Dehu Jani Khori।।

Explaining the meaning of the verse, Valvyassumanji Maharaj says that Shri Ramchandraji is a determined and all-powerful Lord. O Ravana, your assembly is under the control of time. So now I take refuge in Shri Raghuveer, don’t blame me.

Choupai: –

As Kahi Chala Vibheeshanu JabaheenAayooheen Bhye Sab Tabaheen।।

Saadhu Avagya Turat BhavaaniKar Kalyaan Akhil Kai HanI ।।

Explaining the meaning of the verse, Maharajji says that as soon as Vibhishanji left after saying this, all the demons became ageless. Shivji says – O Bhavani, insulting a saint destroys the entire welfare.

Raavan Jabahin Vibheeshan TyaagaBhayu Bibhav Binu Tabahin Abhaaga।।

Chaleu Harashi Raghunaayak PaaheenKarat Manorath Bahu Man Maahin ।।

Explaining the meaning of the verse, Maharajji says that the moment Ravana abandoned Vibhishana, the unfortunate man became deprived of his opulence. Vibhishanji became happy and went to Shri Raghunath ji with many wishes in his mind.

Dekhihaun Jay charan JalajaataArun Mrdul Sevak Sukhadaata।।

Je Pad Parasee Taree RshinaareeDandak Kaanan paavaanakaari।।

Explaining the meaning of the verse, Maharajji says, I will go and see the soft and red beautiful lotus feet of the Lord, which give happiness to the servants, whose feet touched the sage’s wife and which makes Dandakavan sacred.

Je Pad Janakasutaan Ur LaeKapat Kurang Sang Dhar Dhae।।

Har Ur Sar Saroj Pad JeieAhobhaagy Mai Dekhihun Teie ।।

Explaining the meaning of the verse, Maharajji says that the feet which Janaki ji has kept in her heart, which were running on the earth with the deceitful deer (to catch her) and which lotus feet actually reside in the lake of Lord Shiva’s heart, are mine. It is unfortunate that I will see him today.

Mahatma Bhawan,

Shriram-janaki Temple,

Ram Kot, Ayodhya.

Mob: – 8709142129.

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