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रंकनीति बनाम रणनीति…

नीति का परिवर्तन

लगातार विफलताओं के बाद, रमेश थक गया था. उसे समझ में आ गया था कि वह विक्रम को सीधी टक्कर से या नीच हरकतों से नहीं हरा सकता. विक्रम की ‘रंकनीति’ उसकी हर ‘नीति’ पर भारी पड़ रही थी.

एक दिन, रमेश खुद विक्रम की दुकान पर आया. उसके चेहरे पर हार और निराशा के भाव थे. उसने विक्रम से कहा, “तुम जीत गए, विक्रम. तुम्हारी रणनीति मेरी रणनीति से कहीं ज़्यादा मजबूत है. मैंने तुम्हें कम आँका.”

विक्रम ने विनम्रता से कहा, “मैंने कभी जीतने के लिए लड़ाई नहीं की, रमेश भाई. मैंने बस अपना काम ईमानदारी से करने की कोशिश की.”

रमेश ने गहरी सांस ली और कहा, “शायद यही असली रणनीति है. लोगों का विश्वास जीतना और ईमानदारी से काम करना.”

उस दिन के बाद, रमेश का व्यवहार बदल गया. उसने विक्रम को परेशान करना बंद कर दिया और धीरे-धीरे उसने भी अपने भोजनालय में सुधार करना शुरू कर दिया. उसने समझा कि केवल ताकत और धौंस से सफलता नहीं मिलती, बल्कि लोगों का सम्मान और विश्वास जीतने से मिलती है.

विक्रम की ‘रंकनीति’ न केवल उसे रमेश के अत्याचारों से बचाने में सफल हुई, बल्कि उसने रमेश को भी एक महत्वपूर्ण सबक सिखाया. यह कहानी दिखाती है कि कैसे बुद्धिमत्ता, धैर्य, ईमानदारी और लोगों का समर्थन, बड़ी से बड़ी ताकत को भी मात दे सकता है. ‘रंकनीति’ हमेशा संसाधनों की कमी को मात देने और विपरीत परिस्थितियों में भी सफलता प्राप्त करने का मार्ग दिखाती है.

समाप्त

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