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रंकनीति बनाम रणनीति…

जनमत की शक्ति

रमेश अब और भी हताश हो गया था. उसकी हर ‘नीति’ विफल हो रही थी. उसने अब एक और नीच तरीका आजमाने का फैसला किया. उसने अफवाहें फैलाना शुरू कर दिया कि विक्रम अपनी चाय में मिलावट करता है और उसकी दुकान पर साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता.

यह अफवाहें धीरे-धीरे पूरे इलाके में फैल गईं और कुछ दिनों के लिए विक्रम के ग्राहकों की संख्या में कमी आई. विक्रम जानता था कि यह रमेश की एक और चाल है और उसे इसका जवाब देना होगा। लेकिन इस बार वह सीधी टक्कर लेने की बजाय, एक अलग रणनीति अपनाने वाला था.

विक्रम ने अपने सभी नियमित ग्राहकों को इकट्ठा किया. उसने उन्हें अपनी चाय बनाने की प्रक्रिया दिखाई, अपनी रसोई दिखाई और उन्हें विश्वास दिलाया कि वह हमेशा गुणवत्ता और स्वच्छता का पूरा ध्यान रखता है. उसने उनसे अनुरोध किया कि वे खुद जाकर दूसरों को सच्चाई बताएं.

उसके ग्राहकों ने उसका साथ दिया. वे गली-गली घूमकर लोगों को बताते कि विक्रम की चाय कितनी अच्छी और शुद्ध होती है. उन्होंने रमेश की अफवाहों को झूठा साबित किया. धीरे-धीरे, लोगों का विश्वास विक्रम पर फिर से जम गया और उसकी दुकान पर फिर से भीड़ लगने लगी.

इस घटना ने रमेश को एक और सबक सिखाया. उसने समझा कि ताकत और धन से ज़्यादा महत्वपूर्ण लोगों का विश्वास होता है. विक्रम ने अपनी ईमानदारी और अच्छे व्यवहार से लोगों का दिल जीता था, और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत थी. उसकी ‘रंकनीति’ केवल अपनी रक्षा करने तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसने लोगों के दिलों को जीतने की कला भी सीख ली थी.

शेष भाग अगले अंक में…,

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