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रंकनीति बनाम रणनीति…

मोहरों की चाल

रमेश, गोविंद की चेतावनी के बाद कुछ दिनों तक शांत रहा, लेकिन उसके मन में विक्रम के प्रति द्वेष की आग धधकती रही. वह अपमान महसूस कर रहा था कि एक मामूली चाय वाले के कारण उसे पीछे हटना पड़ा. उसने अब अपनी रणनीति बदलने का फैसला किया. सीधी टक्कर की बजाय, उसने विक्रम को आर्थिक रूप से कमजोर करने की योजना बनाई.

रमेश ने अपनी पहुँच का इस्तेमाल करके उस थोक व्यापारी को प्रभावित किया जिससे विक्रम चाय पत्ती और अन्य सामान खरीदता था. व्यापारी पर दबाव डालकर, रमेश ने विक्रम के लिए सामान की कीमतें बढ़वा दीं. उसे उम्मीद थी कि बढ़ी हुई लागत के कारण विक्रम को अपनी चाय महंगी करनी पड़ेगी, जिससे उसके ग्राहक कम हो जाएंगे.

विक्रम को जब बढ़ी हुई कीमतों का पता चला तो वह चिंतित हुआ. उसकी चाय पहले से ही सबसे किफायती थी और उसे और महंगा करना मुश्किल था. उसके पास रमेश जितने वित्तीय संसाधन नहीं थे कि वह नुकसान सह सके. यह रमेश की ‘नीति’ का एक सूक्ष्म लेकिन प्रभावी वार था.

लेकिन विक्रम ने हार नहीं मानी. उसकी ‘रंकनीति’ में धैर्य और सूझबूझ सबसे महत्वपूर्ण थे. उसने तुरंत प्रतिक्रिया देने की बजाय, स्थिति का विश्लेषण किया. उसने महसूस किया कि रमेश केवल कीमतों पर नियंत्रण कर सकता है, गुणवत्ता पर नहीं.

विक्रम ने एक नई रणनीति अपनाई. उसने सीधे किसानों से संपर्क करना शुरू कर दिया जो चाय की पत्ती उगाते थे. गोविंद ने इस काम में उसकी मदद की, अपने पुराने संपर्कों का इस्तेमाल करके विक्रम को अच्छे किसानों से मिलवाया. विक्रम ने उनसे सीधे थोक में चाय पत्ती खरीदना शुरू कर दिया, जिससे उसे रमेश द्वारा बढ़ाई गई कीमतों का असर कम हो गया.

इतना ही नहीं, विक्रम ने अपनी चाय की गुणवत्ता पर और भी ध्यान देना शुरू कर दिया. वह खुद सुबह जल्दी उठकर अच्छी चाय पत्ती का चुनाव करता और उसे विशेष तरीके से बनाता. उसकी चाय का स्वाद और भी बेहतर हो गया, और उसके पुराने ग्राहक और भी ज़्यादा उसके दीवाने हो गए.

रमेश यह देखकर हैरान था कि उसकी आर्थिक रूप से दबाव बनाने की ‘नीति’ भी विफल हो रही है. विक्रम न केवल अपनी दुकान चला रहा था, बल्कि उसकी चाय और भी लोकप्रिय हो रही थी. रमेश को समझ नहीं आ रहा था कि एक गरीब चायवाला कैसे हर बार उसकी चाल को नाकाम कर देता है.

शेष भाग अगले अंक में…,

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