Dharm

माँ गौरी…

श्वेते वृषे समरूढा श्वेताम्बराधरा शुचिः।

महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

नवरात्रि के आठवें दिन साधक माँ गौरी या यूँ कहें कि महागौरी की अराधना की जाती है. दुर्गा पूजा के आठवें दिन को अष्टमी या दुर्गा अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. देवी गौरी को पार्वती का ही एक रूप माना जाता है, जो स्नेह, कोमलता, पवित्रता और मातृत्व की प्रतिमूर्ति हैं. माँ गौरी का स्वरूप सौम्य और कल्याणकारी है, जो भक्तों को शांति, समृद्धि और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद देती हैं. इन्हें शिव की अर्धांगिनी और ब्रह्मांड की जननी के रूप में पूजा जाता है.

माँ गौरी जिन्हें शक्ति (महाशक्ति) का प्रतीक माना जाता है. वह भगवान शिव की पत्नी और भगवान गणेश एवं भगवान कार्तिकेय की माँ हैं. माँ गौरी का वर्णन पुराणों, महाकाव्यों और धर्मग्रंथों में मिलता है. माँ गौरी के अनेक रूप हैं, जैसे दुर्गा, काली, चामुंडा और अन्नपूर्णा. हर रूप में उनका एक विशेष उद्देश्य और शक्ति होती है. माँ गौरी को सफेद या पीले वस्त्र पहने हुए दिखाया जाता है, जो पवित्रता और शांति का प्रतीक है. उनके हाथों में त्रिशूल, कमल और वरमुद्रा होते हैं. उनका वाहन वृषभ (बैल) है जो शक्ति और धैर्य का प्रतीक है. अर्धनारीश्वर के रूप में वह शिव की शक्ति और सहचरी हैं.

मन्त्र: –

“सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते।।

पूजा के नियम :-

माँ महागौरी की उपासना करते समय पीले या लाल रंग के वस्त्र पहने और माँ को लाल-पीले, उजले व नील फूलों से चंदन, अक्षत, दूध, दही, शक्कर, फल, पंचमेवे और पंचामृत अर्पित करें. माता के समक्ष शुद्ध घी का दीपक जलाएं तथा धूप अगरबत्ती भी जलाएं और इत्र चढ़ाएं, माँ महागौरी के स्वरूप-विग्रह को अपने हृदय में अवस्थित करते हुए, उनके मन्त्रों का जाप करें. महागौरी की उपासना या दुर्गा अष्टमी करने वाले साधक को रात्री जागरण करना चाहिए.

कथा: –

पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती (गौरी) ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उनसे विवाह किया. इस प्रकार, गौरी सती प्रेम और समर्पण की मूर्ति बन गईं. सनातन धर्म में गौरी-शंकर की पूजा का विशेष महत्व है. यह दंपत्ति आदर्श पारिवारिक जीवन का प्रतीक है. विवाहित महिलाएँ अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए माँ गौरी की आराधना करती हैं.

माँ गौरी का जीवन संघर्ष और त्याग का प्रतीक है. उन्होंने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया. यह हमें सिखाता है कि आत्मविश्वास और धैर्य से हर लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है. माँ गौरी न केवल शक्ति और सौंदर्य की देवी हैं, बल्कि करुणा और माँ की ममता का जीवंत रूप भी हैं. उनके उपदेश हमें जीवन में सकारात्मकता, शक्ति और समर्पण का मार्ग दिखाते हैं.

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