Life Style

मन का प्रभाव भोजन पर भी पड़ता है…

मन बहुत ही चंचल होता है, इसका शरीर के साथ बड़ा ही घनिष्ठ संबंध होता है, प्रत्यक्ष रूप में तो सब प्रकार के कार्य हमारी इन्द्रियां ही करती हैं, पर वास्तव में उसका संचालन करने वाला मन ही होता है, इसीलिए मानसिक विचारों का प्रभाव शरीर पर सदैव ही पड़ता है. इससे हमारा भोजन भी इससे अछूता नहीं रहता है. पुरानो में कहा गया है, कि मनुष्य जैसा भोजन करता है, वैसा ही प्रभाव उसके मन पर भी पड़ता है. भोजन तीन प्रकर के होते हैं- सात्विक, राजसिक व तामसिक. एक उक्ति भी कही गई है, कि ‘जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन.’ जिस प्रकार भोजन का प्रभाव मन पर पड़ता है, उसी प्रकार मन के विचारों और उसकी दशा का असर भोजन पर भी पड़ता है. भोजन के समय जो शांत और प्रसन्नचित रहने की सलाह दी जाती है, उसका अर्थ यह होता है कि किसी भी प्रकार की उत्तेजना, आवेश, क्रोध या मानसिक हलचल की अवस्था में किया हुआ भोजन ठीक तरह से पचता नहीं है, और उससे शरीर को उचित लाभ भी नहीं मिलता है. अनेक बार तो विशेष उत्तेजनाओं की दिशा में किया गया भोजन शरीर को सीधे हानि ही पहुंचाता है.

कामुकता के भाव का उदय होते ही शरीर की गर्मी बढ़ जाती है, श्वास गरम हो जाता है, त्वचा का तापमान और खून का दौर भी बढ़ जाता है. इसी गर्मी के दाह से कुछ धातुएं पिघलने और कुछ जलने भी लगती हैं. ऐसे समय में किया गया भोजन ठीक से नहीं पचता है, दूषित रक्त बनाता है व  विवेकहीनता को जन्म देता है. क्रोधित अवस्था में किया गया भोजन भी शरीर पर बहुत ही अधिक हानिकारक प्रभाव देता है. न्यूयार्क में वैज्ञानिकों ने परीक्षा करने के लिए गुस्से में भरे हुए मनुष्य के खून की कुछ बूंदें लेकर पिचकारी द्वारा खरगोश के शरीर में पहुंचायीं गई, इसका परिणाम यह हुआ कि बाइस मिनट के बाद खरगोश आदमियों को काटने लगा. एक घंटे के बाद स्वयं पांव पटक-पटक कर मर गया. क्रोध के कारण पैदा होने वाली विषैली शर्करा खून को अत्यधिक अशुद्ध कर देती है. इस अशुद्धता के कारण चेहरा लाल और सारा शरीर पीला पड़ जाता है. पाचन शक्ति बिगड़ जाती है, नसें खिंचती हैं, व गर्मी का भी प्रकोप बढ़ जाता है. क्रोधित अवस्था में किया गया भोजन शरीर के लिए नुक्सानदेह ही साबित होता है. इस अवस्था में पाचक रसों के स्थान पर विषैले अम्ल उत्पन्न होने लगते हैं, ये अम्ल भोजन के साथ मिलकर शरीर के अवयवों में विकृति पैदा कर देते हैं. क्रोध के समय एक गिलास ठंडा पानी पी लेना आयुर्वेदिक चिकित्सा है. इससे मस्तिष्क और शरीर की बढ़ी हुई गर्मी को ठंढक मिलती है. विद्वानों के मतानुसार जिस स्थान पर क्रोध आये, वहां से उठकर चले जाना या किसी और काम में लग जाना ही ठीक होता है. इससे मन की दिशा बदल जाती है तथा चित्त का झुकाव दूसरी ओर हो जाता है. कुछ समय बाद शांत मन: स्थिति में भोजन करना स्वास्थ्य के लिए लाभदायी होता है. लोभ की मनोदशा में भोजन करने के फलस्वरूप शरीर में जमा करने की क्रिया अधिक और त्यागने से कम होने लगती है, पेट पर इसका असर तुरंत ही दिखाई पड़ता है. मल-मूत्र के आवेग को कभी रोकना नहीं चाहिए. दस्त साफ होने में रूकावट पड़ने लगती है, पेट भरा-भरा सा लगता रहता है, शौच के समय आंतों की मांसपेशियां अपने संचालक अर्थात् सुस्त मन के आदेश का पालन करती हैं. इस अवस्था में मांस-पेशियां त्याग में बड़ी कंजूसी करती हैं. फलस्वरूप जो मल अत्यधिक मात्रा में होता है, वही निकलता है, बाकी पेट में ज्यों का त्यों पड़ा रहता है और सड़-गल कर विषों की उत्पति करता है. पेट का विष रक्त में सम्मिलित होकर असंख्य रोगों का घर बन जाता है. हृदय की अधिक धड़कन, सिर का दर्द, निद्रा की कमी तथा गठिया रोग, अक्सर इसी प्रकार के दूषित विकार से होता है.

जिस प्रकार भय का विकार भी शरीर पर अति घातक प्रभाव डालता है. मनुष्य का शरीर सबसे अधिक बलवान और शक्तिशाली होता है. उसमें यदि भय की भावनाएं प्रवेश कर जायें तो, शरीर को नष्ट होने में देर नहीं लगती है. भय की अवस्था में हमारे शरीर के अंदर की प्रक्रियाओं में बाधा उत्पन्न होती है, इन्द्रियों का काम रूक-सा जाता है, यही  रक्त शिराओं के प्रवाह, बीज कोषों के कार्य और पेट की क्रियाओं पर अपना प्रभाव डालता है. इससे हृदय की गति तीव्र हो जाती है, वह जोर से धड़कने लगता है, रक्त दबाव बढ़ जाता है, पाचन क्रिया रूक जाती है, और यकृत के जरिये मांसपेशियों से शक्कर निकलने लगती है. भय की दशा में किया गया भोजन शरीर तथा मन को दुर्बल तथा रोगों का शिकार बनाता है. आमतौर पर यह देखा जाता है कि माताएं बच्चों को आहार खिलाने के लिए भोजन छिन जाने या काला भूत आने जैसे मानसिक भय दिखाती हैं, बच्चों को भोजन कराने का यह तरीका निश्चय ही बदल देना चाहिए. इस प्रकार की मानसिक स्थिति से अच्छे पदार्थ का भी बुरा ही प्रभाव पड़ता है. जो व्यक्ति हर एक पदार्थ में बुराई देखता है, उसे उसका नतीजा भी वैसे ही मिलता है, इसलिए अपनी परिस्थिति या समयानुसार जो कुछ भी सामान्य भोजन मिलता हो, उसे प्रसन्नचित्त से व शरीर तथा मन के लिए कल्याणकारी समझकर ग्रहण करना चाहिए. भोजन करते समय किसी विषय पर गंभीर रूप से विचार करने से या किसी महत्त्वपूर्ण समस्या पर दिमाग दौड़ाने से शरीर का रक्त मस्तिष्क की तरफ ज्यादा जाने लगता है, इससे पाचक तंत्रों में कमी होने लगती है, कमजोरी आती है, पाचन क्रिया में भी बाधा पड़ने लगती है, व भोजन देर से या अधूरा पचता है. जब भी भोजन करें तो एकांत में तथा एकाग्र चित्त होकर करे, ऐसा पुराणों व ग्रंथो में लिखा गया है.

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The mind is very fickle, it has a very close relationship with the body, apparently, all kinds of work is done by our senses, but in reality, it is the mind that operates it, that is why the effect of mental thoughts is on the body. But it always happens. Due to this our food also does not remain untouched by it. It has been said in the Puranas, that the kind of food a man eats, the same effect falls on his mind. There are three types of food – Satvik, Rajasik, and Tamasik. A saying has also been said, that ‘the food you eat, the mind becomes like it’. Way food affects the mind, in the same way, the thoughts of the mind and its state also affect the food. It is advised to remain calm and cheerful at the time of eating, it means that the food eaten in a state of any kind of excitement, passion, anger, or mental agitation is not digested properly, and due to this, the body is not able to get proper nutrition. Don’t even get the benefits. Many times the food taken in the direction of special stimuli causes direct harm to the body.

As soon as the feeling of sexuality arises, the heat of the body increases, the breath becomes hot, and the temperature of the skin and the circulation of blood also increases. Due to the burning of this heat, some metals start melting and some also start burning. The food eaten at such a time is not digested properly, creates impure blood, and gives rise to indiscretion. Food eaten in an angry state also gives a very harmful effect on the body. Scientists in New York took a few drops of the angry man’s blood and delivered it to the rabbit’s body by spraying, the result was that after twenty-two minutes the rabbit started biting the man. After an hour, he himself died by stomping his feet. The toxic sugar produced due to anger makes the blood extremely impure. Due to this impurity, the face turns red and the whole body turns pale. Digestive power deteriorates, nerves get stretched, and the outbreak of heat also increases. Food eaten in an angry state proves to be harmful to the body. In this condition, instead of digestive juices, toxic acids start being produced, these acids mix with food and create distortion in the body’s components. Ayurvedic medicine is to drink a glass of cold water in times of anger. This gives coolness to the increased heat of the brain and body. According to the opinion of scholars, it is better to get up from the place where anger comes or to engage in some other work. Due to this the direction of the mind changes and the inclination of the mind becomes on the other side. Eating after some time in a calm state of mind is beneficial for health. As a result of eating food in the mood of greed, the process of accumulation in the body starts increasing and by discarding it, its effect is visible immediately in the stomach. The impulse of stool and urine should never be stopped. There is a hindrance in clearing the loose stools, the stomach feels full, and at the time of defecation, the muscles of the intestine follow the orders of their operator i.e. lethargic mind. In this state, the muscles are very stingy in sacrifice. As a result, the feces which are in excessive quantity only comes out, the rest remains in the stomach as it is and rots and produces poisons. Stomach poison gets mixed in the blood and becomes a home for innumerable diseases. Heart palpitations, headaches, lack of sleep, and arthritis are often caused by this type of contaminated disorder.

Just as the disorder of fear also has a very fatal effect on the body. The human body is the most strong and most powerful. If the feelings of fear enter it, then it does not take long for the body to be destroyed. In the state of fear, the internal processes of our body get obstructed, and the work of the senses gets stopped, this affects the flow of blood in the veins, the function of the seminal vesicles, and the functions of the stomach. Due to this, the heart rate becomes intense, it starts beating loudly, blood pressure increases, digestion stops, and sugar starts coming out of the muscles through the liver. Food eaten in a state of fear makes the body and mind weak and prone to diseases. Generally, it is seen that mothers show mental fear like snatching food or coming of black ghosts while feeding the children, this way of feeding the children should definitely be changed. With this kind of mental state, even good substances have bad effects. The person who sees evil in every substance gets the same result, so whatever normal food is available according to his circumstances or time, he should accept it with a happy mind and consider it beneficial for the body and mind. By thinking seriously about some subject while eating food or running the mind on some important problem, the body’s blood starts moving towards the brain, due to this, there is a decrease in the digestive system, there is weakness, there is an obstruction in the digestion process. It seems, that the food is digested late or incompletely. Whenever you eat food, do it in solitude and with a concentrated mind, it has been written in the Puranas and scriptures.

Radhika Kumari (Retired Teacher)…

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