
क्या वर्तमान समय की राजनीति अहम् का टकराव है…?
आधुनिक राजनीति में व्यक्तिगत अहम् की भूमिका निर्विवाद रूप से बढ़ी है. नेता अक्सर अपने निजी प्रभुत्व, प्रतिष्ठा, और विचारधारा को राष्ट्र हित से ऊपर रखते दिखते हैं. यह लेख इसी प्रश्न की पड़ताल करता है: – क्या वर्तमान राजनीति वास्तव में अहम् के टकराव का मैदान बन गई है?
पारंपरिक राजनीति में विचारधाराएँ, सामाजिक सुधार, और सामूहिक हित प्रमुख थे. महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, या अब्राहम लिंकन जैसे नेता अपने चरित्र बल और जनसमर्थन से प्रभावित करते थे. परंतु 21वीं सदी में “नेतृत्व का व्यक्तित्व केंद्रित मॉडल” उभरा है, जहाँ नेता स्वयं को “ब्रांड” के रूप में प्रस्तुत करते हैं. उदाहरणार्थ, डोनाल्ड ट्रम्प का “अमेरिका फर्स्ट” नारा या नरेंद्र मोदी का “मोदी सर्वत्र” अभियान व्यक्तिगत छवि निर्माण पर केंद्रित हैं.
अहम् के प्रमुख उदाहरण
सोशल मीडिया और छवि प्रबंधन: – नेता ट्विटर, फेसबुक के माध्यम से सीधे जनता से जुड़ते हैं, परंतु यह संवाद अक्सर विवादास्पद बयानबाजी या प्रतिद्वंद्वियों को नीचा दिखाने का मंच बन जाता है. जैसे, ट्रम्प का “फेक न्यूज़” आरोप या राहुल गांधी और BJP नेताओं के बीच ट्विटर युद्ध.
वैश्विक नेता और अहम्: – व्लादिमीर पुतिन का यूक्रेन पर आक्रमण, या किम जोंग-उन की परमाणु तस्वीरें राष्ट्रीय सुरक्षा के बजाय व्यक्तिगत सत्ता प्रदर्शन लगती हैं.
घरेलू राजनीति: – भारत में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवादहीनता, जैसे संसद में हंगामे, यह दर्शाता है कि समझौते की जगह टकराव को प्राथमिकता दी जा रही है.
अध्ययन बताते हैं कि अधिकांश नेता उच्च नार्सिसिज़्म (अहंकार) और मैकियावेलियन लक्षण रखते हैं. ये गुण उन्हें सत्ता के लिए प्रेरित करते हैं, परंतु सहयोग और समझौते की क्षमता कम कर देते हैं. उदाहरण के लिए, ट्रम्प का राष्ट्रपति काल अमेरिकी इतिहास में सबसे अधिक कर्मचारी टर्न-ओवर वाला रहा, जो उनके “मेरी राय ही सही” दृष्टिकोण का परिणाम था.
परिणाम: – जनहित से विमुखता
नीतिगत गतिरोध: – अमेरिका में स्वास्थ्य सुधार या जलवायु नीति पर सहमति न बन पाना.
संस्थानों का कमजोर होना: – न्यायपालिका, मीडिया, या चुनाव आयोग पर नेताओं का हस्तक्षेप.
सामाजिक विभाजन: – नेताओं का समुदाय-विशेष को लक्षित भाषण (जैसे भारत में हिंदुत्व vs. सेक्युलरिज़म बहस).
कुछ विद्वान मानते हैं कि नेतृत्व के लिए आत्मविश्वास और दृढ़ता जरूरी है. उदाहरण के लिए, विंस्टन चर्चिल का द्वितीय विश्वयुद्ध में अडिग रुख ब्रिटेन के लिए मददगार था. परंतु आज यही गुण “अहम् का अंधकार” बन जाते हैं जब नेता आलोचना को स्वीकार नहीं करते.
वर्तमान राजनीति में अहम् का टकराव एक वास्तविक और गंभीर चुनौती है. यह लोकतंत्र की मूलभूत भावना-सहभागिता और समावेश-को क्षति पहुँचाता है. हालाँकि, इसका समाधान केवल नेताओं के व्यवहार पर निर्भर नहीं, बल्कि जनता की जागरूकता और संस्थागत सुधारों में निहित है. जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था, “राजनीति समाज सेवा का माध्यम होनी चाहिए, सत्ता पाने का नहीं.” यह दर्शन आज भी प्रासंगिक है.
संजय कुमार सिंह (पैनलिष्ट)
ज्ञानसागरटाइम्स