व्यक्ति विशेष – 759.
क्रांतिकारी पुलिन बिहारी दास
पुलिन बिहारी दास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे, जो बंगाल में ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र आंदोलन के लिए जाने जाते हैं. उनका जन्म 24 जनवरी 1877 को बंगाल (अब बांग्लादेश) में हुआ था. वे अनुशीलन समिति नामक क्रांतिकारी संगठन के सक्रिय सदस्य और नेता थे.
पुलिन बिहारी दास ने अपने प्रारंभिक जीवन में ही स्वतंत्रता संग्राम के प्रति गहरी रुचि दिखाई. उन्होंने शिक्षा प्राप्त करने के बाद कलकत्ता (अब कोलकाता) में ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया. वे प्रभावशाली व्यक्ति थे और युवाओं को संगठित करके ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करते थे.
पुलिन बिहारी दास ने वर्ष 1902 में अनुशीलन समिति की स्थापना की, जो एक क्रांतिकारी संगठन था. यह संगठन ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में शामिल था. पुलिन बिहारी ने बंगाल के विभिन्न हिस्सों में इस संगठन की शाखाएँ स्थापित कीं और युवाओं को प्रशिक्षण दिया.
उनका सबसे प्रसिद्ध कार्य वर्ष 1908 में बरीसाल बम केस (Barisal Conspiracy Case) था, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाया. हालांकि इस मामले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन उन्होंने अपने संघर्ष को जारी रखा. पुलिन बिहारी दास का मानना था कि केवल सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से ही भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिल सकती है.
ब्रिटिश सरकार ने पुलिन बिहारी दास को उनकी क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए कई बार गिरफ्तार किया और उन्हें जेल में डाल दिया. उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा जेल में बिताया. जेल में भी उन्होंने अपने साथियों को प्रोत्साहित किया और स्वतंत्रता संग्राम की भावना को जीवित रखा.
पुलिन बिहारी दास का निधन 17 अगस्त 1949 को हुआ. वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी के रूप में याद किए जाते हैं, जिन्होंने अपने जीवन को देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया. उनकी बहादुरी और देशभक्ति ने कई अन्य युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रेरित किया.
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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर
कर्पूरी ठाकुर भारतीय राजनीति के एक प्रमुख व्यक्तित्व थे, जिन्हें उनके समर्पण और जनसेवा के लिए याद किया जाता है. वे बिहार के एक गरीब परिवार में जन्मे थे और बाद में बिहार के मुख्यमंत्री भी बने. कर्पूरी ठाकुर को उनके सामाजिक न्याय और गरीबों, वंचितों, और पिछड़े वर्गों के उत्थान के प्रयासों के लिए जाना जाता है.
कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी, 1924 को समस्तीपुर के पितौंझिया (अब कर्पूरीग्राम) में हुआ था उनका निधन 17 फरवरी, 1988 को दिल का दौरा पड़ने से हुआ था. वे स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भी सक्रिय रहे थे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दिया.
उन्होंने अंग्रेजी राज से भारत की आजादी के लिए लड़ाई में हिस्सा लिया और इस दौरान वे कई बार जेल गए. कर्पूरी ठाकुर ने भारतीय राजनीति में गरीबों और वंचितों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई. उन्हें विशेष रूप से शिक्षा और रोजगार में सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने के लिए याद किया जाता है. उनके कार्यकाल में कई सामाजिक सुधारों की शुरुआत हुई थी.
कर्पूरी ठाकुर की विरासत आज भी बिहार और पूरे भारत में जीवित है, और उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में याद किया जाता है जिन्होंने समाज के हर वर्ग की भलाई के लिए काम किया.
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साहित्यकार चन्द्रबली पाण्डेय
चन्द्रबली पाण्डेय एक भारतीय साहित्यकार हैं. उनका जन्म 25 अप्रैल 1904 को नसीरुद्दीनपुर, आजमगढ़ ज़िला, उत्तर प्रदेश के एक साधारण परिवार सरयूपारीण ब्राह्मण के घर हुआ था. उनके पिता किसान थे. चन्द्रबली पाण्डेय हिन्दी साहित्य में अपने योगदान के लिए प्रसिद्ध हैं.
उन्होंने विभिन्न विधाओं में काम किया है जिसमें कविता, निबंध, और आलोचना शामिल हैं. उनके कार्य अक्सर भारतीय समाज और इतिहास के प्रति गहरी समझ और जागरूकता को दर्शाते हैं. चन्द्रबली पाण्डेय ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है.
उनके लेखन में भारतीय संस्कृति और परंपराओं की झलक मिलती है, और वे अपनी लेखनी के माध्यम से समाज में चेतना और नवजागरण की भावना को बढ़ावा देने का प्रयास करते हैं. उनकी रचनाएं अक्सर प्रेरणादायक होती हैं और लोगों को आत्म-चिंतन और समाज के प्रति जिम्मेदारी के महत्व को समझने के लिए प्रेरित करती हैं. चन्द्रबली पाण्डेय का 24 जनवरी 1958 को हुआ था.
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भौतिक विज्ञानी प्रोफेसर होमी जे. भाभा
प्रोफेसर होमी जहांगीर भाभा भारत के एक महान भौतिक विज्ञानी और भारतीय परमाणु कार्यक्रम के जनक माने जाते हैं. उनका जन्म 30 अक्टूबर 1909 को मुंबई में एक प्रतिष्ठित पारसी परिवार में हुआ था. भाभा ने भारत में परमाणु विज्ञान और अनुसंधान को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे भारत विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में सशक्त बना.
होमी भाभा ने अपनी पढ़ाई मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज और कैंब्रिज विश्वविद्यालय से की, जहां उन्होंने भौतिकी में उच्च शिक्षा प्राप्त की. उनकी विशेष रुचि कण भौतिकी (पार्टिकल फिजिक्स) में थी, और वे कॉस्मिक किरणों पर अपने शोध के लिए प्रसिद्ध थे, उन्होंने ही पहली बार इस विषय में महत्वपूर्ण कार्य किया और भौतिक विज्ञान में योगदान देने वाले वैज्ञानिकों में अपना नाम स्थापित किया,
भारत में परमाणु विज्ञान की नींव रखने के उद्देश्य से उन्होंने वर्ष 1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) की स्थापना की. इसके बाद वर्ष 1954 में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) की स्थापना की, जो मुंबई में स्थित है. भाभा का उद्देश्य भारत को एक स्वावलंबी और तकनीकी रूप से सशक्त राष्ट्र बनाना था, और उनकी योजना के तहत ही भारत का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम शुरू हुआ.
भाभा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अत्यधिक मान्यता मिली. वे इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और उनके नेतृत्व में भारत ने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग पर जोर दिया.
भाभा का जीवन असमय समाप्त हो गया जब 24 जनवरी 1966 को एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई. इस दुर्घटना के कारणों को लेकर कई विवाद और अटकलें रहीं, लेकिन उनके निधन से भारत को बहुत बड़ी क्षति हुई. उनके योगदान के कारण, भारत उन्हें अत्यंत आदर और सम्मान के साथ स्मरण करता है.
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शास्त्रीय संगीतज्ञ पंडित भीमसेन जोशी
पंडित भीमसेन जोशी भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान गायक थे, जिन्हें खासतौर पर किराना घराने के प्रमुख गायक के रूप में जाना जाता है. उनकी गायकी में उत्कृष्टता, भावपूर्ण अभिव्यक्ति और अद्भुत स्वर साधना की झलक मिलती थी.
भीमसेन जोशी का जन्म 4 फ़रवरी 1922 को कर्नाटक के ‘गड़ग’ में हुआ था. उनके पिता ‘गुरुराज जोशी’ स्थानीय हाई स्कूल के हेडमास्टर और कन्नड़, अंग्रेज़ी और संस्कृत के विद्वान् थे. उनके चाचा जी.बी जोशी चर्चित नाटककार थे तथा उन्होंने धारवाड़ की मनोहर ग्रन्थमाला को प्रोत्साहित किया था. उनके दादा प्रसिद्ध कीर्तनकार थे.
भीमसेन जोशी को बचपन से ही संगीत में रुचि थी. उन्होंने गुरु सवाई गंधर्व से संगीत की शिक्षा ली, जो खुद किराना घराने के महान गायक थे. उनकी गायकी में तानों की रफ्तार, भावपूर्ण आलाप, और गहरी संप्रेषणीयता विशेष रूप से प्रसिद्ध थी. जोशी ने खयाल गायन में नए आयाम जोड़े और इसे एक नई ऊंचाई पर पहुंचाया. उनके गाए हुए भजन और अभंग (मराठी संत कवियों के गीत) भी बेहद लोकप्रिय हुए.
पंडित भीमसेन जोशी ने संगीत के कई पहलुओं में अपने ज्ञान को साझा किया, और वे एक उत्कृष्ट विशेषज्ञ थे. उन्होंने विभिन्न संगीत सम्मलेनों में भाग लिया और अपनी संगीतिक प्रतिभा का प्रदर्शन किया. पंडित भीमसेन जोशी के कार्यक्षेत्र में विशेष प्रमुखता रखने वाले कुछ विशेष विषय हैं, जैसे कि रागवाद्य और पर्कुश वादन कला. उन्होंने संगीत के इन दो पहलुओं पर अपने अद्वितीय योगदान के लिए प्रसिद्धता प्राप्त की.
प्रसिद्ध रचनाएँ: –
“मिले सुर मेरा तुम्हारा” (राष्ट्रीय एकता का प्रसिद्ध गीत),
“जो भजे हरि को सदा” (भजन),
“माझे माहेर पंढरी” (मराठी अभंग),
उनके राग मियां की तोड़ी, दरबारी कान्हड़ा, भीमपलासी, यमन, और पूरिया धनाश्री में गाए बंदिशें अत्यंत प्रसिद्ध हैं.
पंडित भीमसेन जोशी को कई सम्मानों से सम्मानित किया गया जिनमें – भारतीय संगीत में उनके अतुलनीय योगदान के लिए वर्ष 2008 में भारत रत्न, वर्ष 1999 में पद्म विभूषण, वर्ष 1985 में पद्म भूषण, वर्ष 1972 में पद्म श्री और वर्ष 1975 व 86 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था.
पंडित भीमसेन जोशी का निधन 24 जनवरी 2011 को पुणे में हुआ था. उनका नाम भारतीय संगीत के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण और प्रतिष्ठित व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है, और उनके संगीतीय योगदान को सराहा जाता है.



