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व्यक्ति विशेष – 696.

झलकारी बाई

झलकारी बाई भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की एक अद्वितीय योद्धा थीं. झलकारी बाई झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में एक प्रमुख महिला योद्धा थीं और वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

झलकारी बाई का जन्म 22 नवंबर 1830 को उत्तर प्रदेश के झांसी के पास भोजला गांव में हुआ था. वे एक साधारण किसान परिवार से थीं और बचपन से ही साहसी और दृढ़ चरित्र की थीं. उन्होंने बचपन में घुड़सवारी, तीरंदाजी, और तलवारबाजी में निपुणता हासिल की.

उनका विवाह एक सैनिक पूरन सिंह से हुआ, जो झांसी की सेना में थे. झलकारी बाई की वीरता और साहस को देखकर रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें अपनी सेना में स्थान दिया. वे रानी के विश्वासपात्रों में से एक थीं और युद्ध के समय रानी का नेतृत्व करती थीं.

वर्ष 1857 के विद्रोह के दौरान, जब अंग्रेजों ने झांसी किले पर हमला किया, झलकारी बाई ने रानी लक्ष्मीबाई की हमशक्ल बनकर अंग्रेजों को चकमा दिया. उन्होंने अंग्रेजों का ध्यान भटकाया ताकि रानी सुरक्षित निकल सकें और संघर्ष जारी रख सकें. उनका यह बलिदान झांसी की रानी के संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है.

झलकारी बाई की वीरता और बलिदान ने न केवल महिलाओं की शक्ति को दर्शाया, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को भी स्थापित किया. उन्हें आज भी साहस, बलिदान और निष्ठा के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है. झलकारी बाई ने यह संदेश दिया कि किसी भी संघर्ष में महिलाएं पुरुषों के बराबर खड़ी हो सकती हैं.

झलकारी बाई का निधन 4 अप्रैल 1857 को झांसी में हुआ था. भारत सरकार ने 22 जुलाई 2001 में झलकारी बाई के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया था.

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प्रथम महिला चिकित्सक रखमाबाई राऊत

रखमाबाई राऊत भारत की पहली महिला चिकित्सक थीं और उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा के क्षेत्र में एक नई दिशा स्थापित की. उनका जन्म 22 नवंबर 1864 को बॉम्बे (अब मुंबई) में हुआ था. वह न केवल भारत की पहली महिला डॉक्टरों में से एक थीं, बल्कि बाल विवाह और महिला अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने वाली एक सशक्त समाज सुधारक भी थीं.

रखमाबाई का बचपन कठिन परिस्थितियों में बीता. उनकी मां जयंतीबाई एक विधवा थीं और उन्होंने दादा जीभाई मालवीय से पुनर्विवाह किया. 11 साल की उम्र में, रखमाबाई का विवाह 19 वर्षीय दूल्हा दादाजी भिखाजी से कर दिया गया. विवाह के बाद, जब उनके पति ने उनके साथ रहने का आग्रह किया, तब रखमाबाई ने बाल विवाह और जबरन वैवाहिक जीवन के खिलाफ आवाज उठाई.

रखमाबाई का विवाह दादाजी भिखाजी से बाल्यावस्था में हुआ था, लेकिन वह इस विवाह को नकारना चाहती थीं और अपने पति के साथ रहने से इनकार कर दिया. दादाजी ने वर्ष 1884 में बॉम्बे हाईकोर्ट में उनके खिलाफ मामला दायर किया, जो एक ऐतिहासिक मुकदमे के रूप में जाना जाता है. इस मुकदमे ने महिलाओं के अधिकारों पर चर्चा की शुरुआत की, खासकर बाल विवाह और वैवाहिक अधिकारों के संबंध में. वर्ष 1888 में कोर्ट ने फैसला सुनाया कि रखमाबाई को अपने पति के साथ रहना होगा, अन्यथा उन्हें जेल जाना पड़ेगा. इसके बावजूद, रखमाबाई ने अदालत के इस फैसले का विरोध किया और यह मामला बाल विवाह के खिलाफ समाज में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया. बाद में, ब्रिटिश सरकार ने हस्तक्षेप किया और उनकी सजा को रद्द कर दिया.

रखमाबाई ने इस सामाजिक लड़ाई के बाद चिकित्सा के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने का फैसला किया. वह इंग्लैंड चली गईं और वर्ष 1889 में लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर विमेन से चिकित्सा की डिग्री प्राप्त की. वर्ष 1894 में भारत लौटने के बाद, उन्होंने सूरत और फिर राजकोट के अस्पतालों में काम किया. अंततः उन्होंने बॉम्बे (मुंबई) के कामा अस्पताल में महिलाओं के लिए चिकित्सक के रूप में सेवा की.

रखमाबाई न केवल एक चिकित्सक थीं, बल्कि उन्होंने सामाजिक सुधारों और महिला सशक्तिकरण के लिए भी कार्य किया. उन्होंने बाल विवाह, महिलाओं की शिक्षा, और विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दों पर समाज में जागरूकता फैलाने का काम किया. उनके संघर्ष ने भारतीय महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

रखमाबाई ने अपना शेष जीवन समाजसेवा और चिकित्सा के क्षेत्र में समर्पित किया. उनका योगदान महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है. उनकी बहादुरी और दृढ़ संकल्प ने उन्हें भारतीय समाज में एक प्रेरणास्रोत बना दिया है.

रखमाबाई राऊत का निधन 25 सितंबर 1955 को हुआ. उनकी कहानी ने न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में महिला अधिकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी, और उन्हें भारत की पहली महिला चिकित्सकों में से एक के रूप में सदैव याद किया जाएगा.

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कोरियोग्राफर सरोज खान

सरोज खान भारतीय फिल्म उद्योग की एक प्रमुख कोरियोग्राफर थीं. उनका वास्तविक नाम निर्मला नागपाल था. उन्हें भारतीय सिनेमा में कई प्रतिष्ठित नृत्य संख्याओं को कोरियोग्राफ करने के लिए जाना जाता है. उन्होंने अपनी कोरियोग्राफी से हिंदी फिल्मों में नृत्य की एक नई परिभाषा दी.

सरोज खान का जन्म 22 नवंबर 1948 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था. उन्होंने मात्र तीन वर्ष की आयु में बाल कलाकार के रूप में अपने कैरियर की शुरुआत की. उन्होंने 13 वर्ष की आयु में कोरियोग्राफी असिस्टेंट के रूप में काम करना शुरू किया. सरोज खान ने अपने कैरियर में 2000 से अधिक गानों को कोरियोग्राफ किया.

लोकप्रिय गाने: –  “एक दो तीन” (तेजाब), “धक धक करने लगा” (बेटा), “डोला रे डोला” (देवदास), “ये इश्क हाय” (जब वी मेट), “हमको आज कल है इंतजार” (सैलाब).

सरोज खान ने तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड सहित अमेरिकी कोरियोग्राफी अवार्ड से सम्मानित की गई. सरोज खान ने न केवल नृत्य कोरियोग्राफी में उच्च मानक स्थापित किए, बल्कि उन्होंने कई युवा नर्तकियों और कलाकारों को प्रशिक्षित भी किया. उनकी शिक्षाओं ने कई प्रसिद्ध नृत्य कलाकारों और अभिनेत्रियों के कैरियर को नया आकार दिया.

सरोज खान का विवाह बी सोहनलाल से हुआ था, जो एक प्रमुख कोरियोग्राफर थे. उनके तीन बच्चे हैं: हामिद खान (राजू), हिना खान और सुकैना खान. वह एक दृढ़ नृत्य शिक्षिका और एक आदर्श मां थीं. सरोज खान का निधन 3 जुलाई 2020 को मुंबई में हुआ था.

सरोज खान का योगदान भारतीय सिनेमा के नृत्य और कोरियोग्राफी में अत्यंत महत्वपूर्ण है. उन्होंने अपनी कला और कौशल से कई पीढ़ियों को प्रेरित किया और हिंदी फिल्मों में नृत्य के क्षेत्र में एक उच्च मानक स्थापित किया. उनकी कोरियोग्राफी भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक स्थायी छाप छोड़ गई है, और उनके योगदान को हमेशा सम्मान और श्रद्धा के साथ याद किया जाएगा.

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अभिनेत्री विन्ध्या तिवारी

विन्ध्या तिवारी एक भारतीय टेलीविजन अभिनेत्री हैं, जो अपने अभिनय और खूबसूरत व्यक्तित्व के लिए जानी जाती हैं. उन्होंने विभिन्न हिंदी टेलीविजन धारावाहिकों में काम किया है और अपनी सशक्त भूमिकाओं से दर्शकों का दिल जीता है. विद्या तिवारी मुख्य रूप से टीवी इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना चुकी हैं.

विन्ध्या तिवारी का जन्म 22 नवम्बर 1989 को वाराणसी ,उत्तरप्रदेश में हुआ था. उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद अभिनय में कैरियर बनाने का निर्णय लिया. विन्ध्या ने अपने कैरियर की शुरुआत टेलीविजन शो से की. उन्होंने छोटे पर्दे पर विभिन्न धारावाहिकों में काम किया, जहां उनके अभिनय को सराहा गया.

प्रमुख धारावाहिक: –  “सर्वगुण संपन्न”, “कुंडली भाग्य” मर्यादा, मैडम सर, नागिन 2. इन शोज़ में उनकी भूमिकाओं ने उन्हें लोकप्रियता दिलाई.

विन्ध्या अपने पारंपरिक और आधुनिक दोनों तरह के लुक्स के लिए जानी जाती हैं.उनका आत्मविश्वास और अभिनय की गहराई दर्शकों को प्रभावित करती है. विन्ध्या भावनात्मक और जटिल किरदारों को सहजता से निभाती हैं. वह अपने काम के प्रति समर्पण और अनुशासन के लिए जानी जाती हैं.

विन्ध्या तिवारी लगातार अपने कैरियर में नई ऊंचाइयां छू रही हैं. वह विभिन्न प्रोजेक्ट्स में काम कर रही हैं और अपने अभिनय के माध्यम से नई पहचान बना रही हैं.

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