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कितना सहायक होगा राहुल का बिहार दौरा…?

राहुल गांधी का बिहार दौरा, चाहे वह चुनावी रैली हो या जनसंपर्क अभियान, हमेशा से राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय रहा है. उनके दौरे को लेकर यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या यह कांग्रेस और महागठबंधन के लिए वास्तव में सहायक होगा, या फिर यह महज एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा. इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए, हमें कई पहलुओं पर विचार करना होगा, जैसे कि बिहार की वर्तमान राजनीतिक स्थिति, राहुल गांधी की व्यक्तिगत छवि, और कांग्रेस का राज्य में संगठनात्मक ढांचा.

बिहार में राजनीति जातिगत समीकरणों, सामाजिक न्याय के मुद्दों और विकास के वादों पर आधारित है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA), जिसमें भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (यूनाइटेड) (JDU) शामिल हैं, का एक मजबूत आधार है, खासकर शहरी क्षेत्रों और कुछ पिछड़ी जातियों में. दूसरी ओर, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व में महागठबंधन का मुख्य आधार मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण है। कांग्रेस इस महागठबंधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन उसका अपना वोट बैंक कमजोर हुआ है.

राहुल गांधी के दौरे के कई संभावित प्रभाव हो सकते हैं, जो इस बात पर निर्भर करेंगे कि वह किस तरह से अपनी बात रखते हैं और जनता से जुड़ पाते हैं. राहुल गांधी का दौरा महागठबंधन को एक राष्ट्रीय चेहरा प्रदान करता है. यह संदेश देता है कि यह सिर्फ एक क्षेत्रीय गठबंधन नहीं है, बल्कि इसे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का समर्थन प्राप्त है. इससे महागठबंधन के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में उत्साह का संचार हो सकता है. यह विशेष रूप से उन मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण है जो राष्ट्रीय राजनीति और प्रधानमंत्री मोदी की छवि से प्रभावित होते हैं.

राहुल गांधी ने हाल के दिनों में अपनी छवि को एक गंभीर राजनेता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, जो बेरोजगारी, महंगाई और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर मुखरता से बात करते हैं. बिहार में बड़ी संख्या में युवा मतदाता हैं जो इन मुद्दों से सीधे प्रभावित होते हैं. अगर राहुल गांधी इन मुद्दों पर प्रभावी ढंग से बात कर पाते हैं, तो वह युवाओं और शहरी मतदाताओं को आकर्षित कर सकते हैं, जो पारंपरिक रूप से NDA का समर्थन करते रहे हैं.

बिहार में कांग्रेस लंबे समय से कमजोर स्थिति में है. उसका संगठनात्मक ढांचा कमजोर हो चुका है और उसके पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है. राहुल गांधी का दौरा पार्टी कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक सकता है और उन्हें चुनाव के लिए प्रेरित कर सकता है. यह कांग्रेस को अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने में मदद कर सकता है.

राहुल गांधी के दौरे में कुछ चुनौतियां और जोखिम भी हैं जिन्हें नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है. राहुल गांधी को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह सिर्फ राष्ट्रीय मुद्दों पर ही बात न करें, बल्कि बिहार के स्थानीय मुद्दों जैसे कि बाढ़, पलायन, शिक्षा और स्वास्थ्य पर भी ध्यान केंद्रित करें. अगर वह स्थानीय मुद्दों से दूर रहते हैं, तो उनकी बात जनता तक नहीं पहुंच पाएगी. NDA, खासकर भाजपा, राहुल गांधी पर अक्सर ‘पप्पू’ और ‘अपरिपक्व’ राजनेता का आरोप लगाती रही है. राहुल गांधी को अपनी छवि को बेहतर बनाने और यह साबित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी कि वह एक गंभीर और विश्वसनीय विकल्प हैं. कांग्रेस का कमजोर संगठनात्मक ढांचा एक बड़ी बाधा है. अगर पार्टी के पास लोगों तक राहुल गांधी का संदेश पहुंचाने के लिए प्रभावी तंत्र नहीं है, तो उनका दौरा सिर्फ एक फोटो-ऑप बनकर रह जाएगा.

राहुल गांधी का बिहार दौरा, यदि सही रणनीति के साथ किया जाए, तो महागठबंधन और कांग्रेस दोनों के लिए बहुत सहायक हो सकता है. यह उन्हें एक राष्ट्रीय मंच प्रदान करेगा, युवाओं को आकर्षित कर सकता है, और कार्यकर्ताओं में उत्साह भर सकता है. हालांकि, उन्हें स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना होगा, अपनी विश्वसनीयता साबित करनी होगी और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करना होगा. यदि वह इन चुनौतियों का सामना करने में सफल होते हैं, तो उनका दौरा बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है. अन्यथा, यह सिर्फ एक और राजनीतिक दौरा बनकर रह जाएगा, जिसका चुनावी नतीजों पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ेगा.

ई. हेमंत कुमार.  

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