Article

गोस्वामी तुलसीदास…

हमारे समाज में भी हमें आए दिन इस तरह के नज़ारे देखने को मिलते हैं, जब कोई इंसान किसी मुद्दे पर कोई बयान दे देता है, तो कुछ भोले भाले लोग बिना जांच पड़ताल किए उसके बयान पर यक़ीन भी कर लेते हैं।गोस्वामी तुलसीदास महाराज हमारी संस्कृति का, हमारी सभ्यता का एक अहम हिस्सा हैं, तुलसीदास महाराज ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने साथ-साथ पूरे भारतवर्ष को राम नाम का दृश्य दिखाया, तुलसीदास महाराज ही व्यक्ति हैं जिन्होंने श्रीरामचरितमानस और हनुमान चालीसा जैसी नायाब रचनाओं को जन्म दिया और अपने दोहों के ज़रिएज़, अपनी चौपाइयों के ज़रिए, अपने सौरठों के ज़रिए पूरी दुनिया को इंसानियत का, धर्म का, भक्ति का, प्रीति का असली मतलब समझाया।आज के दौर में पहले ही हममें से अधिकतर लोग अपनी संस्कृति छोड़कर पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगते जा रहे हैं, और ऐसे हालात में अगर कुछ ज़िम्मेदार लोग तुलसीदास महाराज के दो-चार दोहों का अर्थ तोड़ मरोड़ कर लोगों के सामने पेश करेंगे और उन दो-चार दोहों के बल पर पूरी रामचरितमानस और तुलसीदास महाराज की बाक़ी रचनाओं पर प्रतिबंध लगाने की माँग करेंगे, तो जिन लोगों ने तुलसीदास महाराज की रचनाएं नहीं पढ़ी हैं, जो लोग तुलसीदास महाराज के जीवन से उनके व्यतित्व से वाकिफ़ नहीं हैं, वह लोग तो इन तमाम बातों पर आँख बंद करके भरोसा कर लेंगे, मिसाल के तौर पर अगर कोई यह बात कहता है कि तुलसीदास महाराज के दोहे या उनकी रचनाएं ग़लत हैं, तो बहुत मुमकिन है कि उस समाज का एक बड़ा वर्ग तुलसीदास महाराज को सिरे से नकार दे आलोचना करना ग़लत नहीं है, तज़दीक़ करना ग़लत नहीं है, लेकिन सैकड़ों पन्नो के ग्रंथ में से दो-चार पंक्तियां उठाकर उन पंक्तियों के बिनाह पर पूरे ग्रंथ को ग़लत करार दे देना सरासर बेवकूफ़ी की है, जिन तुलसीदास महाराज के बारे में कहा जा रहा है कि वह स्त्री विरोधी थे, दलित विरोधी थे, उनके अंदर दया नहीं थी, उन्हीं तुलसीदास महाराज ने यह भी कहा है कि

दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।

तुलसी दया न छोड़िए, जब तक घट में प्राण।

वह व्यक्ति जिन्होंने भक्ति की नई परिभाषा इजाद की, वह व्यक्ति जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाज की बेहतरी के लिए समर्पित कर दिया, वह व्यक्ति जिन्होंने भारतीय संस्कृति को और भारतीय साहित्य को एक अलग ऊंचाइयों पर ले जा कर खड़ा कर दिया, ऐसे व्यक्ति के बारे में अगर बिना सोचे समझे इस तरह की बातें कही जायेंगी तो इस ग़लती की सज़ा हमारे साथ-साथ हमारी आने वाली नस्ल को भी चुकानी पड़ेगी, अपनी संस्कृति से, अपनी सभ्यता से, अपने मूल्यों से हाथ धोना पड़ेगा। हम यह नहीं कह रहे हैं कि सवाल करना ग़लत है, हम बस इतना कहने की कोशिश कर रहे हैं कि उन सवालों के जवाब सुने बिना अपना फ़ैसला सुना देना सही बात नहीं है।

हमें पूरा यक़ीन है की अगर तुलसीदास महाराज आज इस धरा पर मौजूद होते तो भी वह अपने ऊपर लगे हुए इल्ज़ामों से क्रोधित नहीं होते, बल्कि ऐसे हालात में भी उनकी जीभ पर मीठी वाणी का ही वास होता, क्योंकि तुलसी मीठे बचन “ ते सुख उपजत चहुँ और। “ बसीकरण इक मन्त्र हैं परिहरू बचन कठोर। अर्थात – तुलसीदास जी कहते हैं कि जो मीठी बोली की फ़सल बोता है, उसको मीठा फल ही मिलता है। किसी को अपने वश में करने के सबसे अच्छे मंत्र हैं, “मीठे बोल”। इसलिए हर इंसान को कठोर और कड़वे वचन छोड़कर, मीठे वचन को अपना लेना चाहिए।

==============  =============  ============

In our society too, we get to see such scenes every day, when a person gives a statement on some issue, some innocent people believe his statement without doing any investigation. Goswami Tulsidas Maharaj is our Culture, an important part of our civilization, Tulsidas Maharaj is the only person who showed the name of Ram to the whole of India along with himself, Tulsidas Maharaj is the only person who gave birth to unique creations like Shri Ramcharitmanas and Hanuman Chalisa and his Through couplets, through his quatrains, through his saturates, he explained the real meaning of humanity, religion, devotion and love to the whole world. going, and in such a situation, if some responsible people distort the meaning of two or four couplets of Tulsidas Maharaj and present them in front of the people and on the basis of those two couplets, they make a proposal to ban the entire Ramcharitmanas and other works of Tulsidas Maharaj. If we demand, those who have not read the works of Tulsidas Maharaj People who are not aware of Tulsidas Maharaj’s life and personality will blindly believe all these things, for example, if someone says that Tulsidas Maharaj’s couplets or his compositions are wrong. If there is, then it is very possible that a large section of that society rejecting Tulsidas Maharaj outright and criticizing it is not wrong, it is not wrong to investigate, but by picking two or four lines from the hundreds of pages of the book, but without those lines, It is sheer stupidity to give the book a wrong name, Tulsidas Maharaj, about whom it is being said that he was anti-women, anti-Dalit, had no compassion, the same Tulsidas Maharaj has also said that

Kindness is the root of religion, pride is the root of sin.

Don’t leave Tulsi mercy, as long as your life is in danger.

About the person who created a new definition of Bhakti, the person who dedicated his whole life to the betterment of society, and the person who took Indian culture and Indian literature to a different height. If such things are said without thinking, then the punishment for this mistake will have to be paid by us as well as our future generation, we will have to lose our culture, our civilization, and our values. We are not saying that asking questions is wrong, we are just trying to say that it is not the right thing to do without hearing the answers to those questions.

We are sure that even if Tulsidas Maharaj was present on this earth today, he would not have been angry with the allegations leveled against him, but even in such a situation, sweet words would have resided on his tongue, because Tulsi sweet words “bring happiness”. Chahu and ′′ Settlement is a mantra Pariharu’s words are harsh. That is – Tulsidas ji says that the one who sows the crop of sweet speech, gets sweet fruit only. The best spells to control someone are “sweet words”. That’s why every human being should leave harsh and bitter words and adopt sweet words.

Prabhakar Kumar.

: [responsivevoice_button voice="Hindi Female"]

Related Articles

Back to top button