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रात भर चलती रहती है उंगलियां मोबाइल पर

किताब सीने पर रखकर सोए हुए एक जमाना हो गया।पढ़ना मेरा शुरू से शौक रहा है और मैं देखता था बड़े बुजुर्ग घर में धार्मिक साहित्य रखते थे और उनका वाचन करते थे। पिताजी छुट्टी में घर आते तो साथ में कुछ किताबें, साहित्य लेकर आते थे। मैं भी पुस्तक मेले में जाता और अपनी मनपसंद पुस्तके लेकर आता। साहित्य, समाचार पत्र एवं अन्य उपयोगी पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने का बेहद शौक था। बचपन में कॉमिक्स कहानियों की किताबें खूब पढ़ता था। कभी-कभी तो पढ़ने में इतना मशगूल हो जाता था कि सब कुछ भूल जाता था। कई बार तो पढ़ते-पढ़ते कब नींद आ जाती पता ही नहीं चलता। रात में माँ कमरे में आती और सीने पर रखी पुस्तक हटा कर दूर रखती। पर आजकल लोगों की पढ़ने की रुचि बहुत कम हो गई है।

लोगों की क्या लगता है मेरी भी रूचि कम हो गई है। पहले तो प्रायः हर स्कूल कॉलेज में लाइब्रेरी हुआ करती थी और बच्चे भी नियमित रूप से लाइब्रेरी में जाया करते थे पर अब ऐसा बहुत कम है। कुछ एक स्कूल और कॉलेज में लाइब्रेरी है मगर उसमें जाने का समय विद्यार्थियों के पास नहीं है। कक्षा में विषय के दिखावे के पीरियड अवश्य होते हैं, खेलकूद का भी समय होता है मगर पुस्तक पढ़ने अथवा पुस्तकालय का कोई पीरियड नहीं होता। आज तो गली मोहल्ले में भी कोई वाचनालय या पुस्तकालय नजर नहीं आता जहां शांति से कुछ अच्छा पढ़ाने को मिले। गांव में दो पुस्तकालय हैं जहां कभी नंबर नहीं आता था आज सुने पड़े नजर आते हैं क्योंकि मोबाइल में सब कुछ छीन लिया है। पुस्तकें पढ़ने का शौक इंसान को खुशी और आनंद तो देता ही है साथ ही पुस्तकें पढ़ने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों का लाभ प्राप्त होता है।

पुस्तक पढ़ना व्यक्ति के लिए किसी दवा से कम नहीं होता है। वास्तव में पुस्तकें कितना सुकून देती है यह कोई पुस्तक प्रेमी ही बता सकता है। पुस्तक इंसान की सबसे अच्छी दोस्त और मार्गदर्शक होती है। पुस्तकों के जरिए हम देश दुनिया की जानकारी तो करते ही हैं साथ ही अपने इतिहास, समाज को भी करीब से जानने का मौका मिलता है। आज पुस्तकें पढ़ने की रुचि कम हुई है उसके पीछे मूल कारण है मोबाइल पर बहुत अधिक समय बिताना। कहने का यथार्थ यह है कि इंटरनेट के इस क्रांति युग में पुस्तकों के महत्व को हम भूलते जा रहे हैं। अब पढ़ना मोबाइल तक सिमट कर रह गया है। कोई पढ़ना चाहे तो मोबाइल पर भी ऑनलाइन बुक्स बहुत हैं पर पढ़ते नहीं है। हां मोबाइल चौबीसों घंटे हाथ में रहता है पर खाली इंटरनेट पर चैट करते हैं, वीडियो देखते हैं या टाइम पास करते हैं। बच्चे हों या बड़े सब मोबाइल में बिजी हैं।

मोबाइल हमारी याददाश्त क्षमता को कमजोर कर बुद्धू बनाता है, मानसिक विकास को अवरुद्ध करता है, जबकि पुस्तकें जिज्ञासा की प्रवृत्ति को बढ़ाती है। वक्त में, लोगों की सोच और शौक में जिस तेजी से परिवर्तन हो रहा है इससे पुस्तकों पर संकट मंडराने लगा है। डर लगता है कहीं ऐसा दिन में आ जाए की पुस्तकें गुजरे जमाने की चीज बनकर रह जाए। यदि पुस्तक पढ़ने का शौक वापस जगाना है तो हमें बच्चों की कहानियों की पुस्तकें या मन पसंद विषय की पुस्तकें दोबारा पढ़कर अपने पढ़ने की आदत फिर से बना सकते हैं।

एक जमाना था जब लोगों को पुस्तकें मिलती नहीं थी और कुछ भाषाओं की पुस्तकें ही प्रकाशित होती थी पर आज तो पुस्तकों के बड़े-बड़े मेले लगते हैं जहां हर प्रकार की पुस्तकें हर भाषा में उपलब्ध है। जॉन रस्किन की यह बात बिल्कुल सही है कि सभी पुस्तकें दो वर्गों में विभक्त है – समय की पुस्तकें और सर्वकालिक पुस्तकें। आज दोनों तरह की पुस्तकें उपलब्ध है।

Prabhakar Kumar.

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