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धुप-छांव -6.

खोया हुआ प्रेम – परछाईं नहीं, अक्स है जो हमारे भीतर बचा रहता है “प्रेम जो पूरी तरह नहीं कहा गया, वही सबसे ज़्यादा हमारे भीतर जीता है.”

प्रेम का खो जाना — क्या वास्तव में खो जाना है?

अर्पिता और प्रभात की कहानी में प्रेम कभी “पूर्ण रूप” में प्रकट नहीं हुआ, लेकिन उसकी अनुपस्थिति एक गहरी उपस्थिति बन गई.

उन्होंने एक-दूसरे से प्रेम किया, पर उसे परिभाषित नहीं किया.

उनके बीच संवाद था, परंतु नामकरण नहीं.

एक ने कभी कहा नहीं, दूसरे ने कभी पूछा नहीं-और यही “नक़्शे से बाहर की जगह” प्रेम को सबसे गहरा बना गई.

यह खोया हुआ प्रेम एक स्पष्ट “विरह” नहीं है, यह सन्नाटा है जिसमें भावनाएँ गूंजती हैं.

गहराई कहाँ है इस प्रेम में?

शेष भाग अगले अंक में…,

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