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धुप-छांव -12.

चौपाल की टूटी खाट और बचपन की चीख़ें “जो खाट अब नहीं बोलती, वही सबसे ज़्यादा सुनती है.”

गाँव की चौपाल अब भी वहीं है—पुराने नीम के पेड़ के नीचे, जहाँ कभी शाम को बुज़ुर्ग बैठकर किस्से सुनाते थे. खड़खड़ाती एक टूटी खाट अब भी वहीं पड़ी है, उसकी रस्सियाँ कुछ जगहों से ढीली, लेकिन बाँध अब भी मजबूत.

अर्पिता पास जाती है… हाथ फेरती है उस खाट की बुनावट पर, जैसे किसी पुराने रिश्ते की नाड़ी टटोल रही हो.

खाट की गूंज: एक स्मृति से संवाद

खाट (कल्पित स्वर): “तेरे पाँव पहचानती हूँ… वही चाल, वही रुकावट। जब तुम छोटी थीं, तब भी डरती थीं बैठने से—जैसे किसी और की जगह ले रही हो. आज भी वैसी ही हो, बस अब चुप ज़्यादा रहती हो.”

अर्पिता: “मुझे याद है… यहीं प्रभात पहली बार अपने दोस्तों को कहानी सुना रहा था, और मैं कोने में खड़ी थी—बिना बुलाए, ध्यान लगाए।”

खाट: “हां, और जब उसने कहा था, ‘कहानी तभी पूरी होती है जब कोई उसे चुपचाप सुन रहा हो,’ तब उसका चेहरा तुम्हारी ओर था. मैंने देखा था.”

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“चौपाल का शोर वो संगीत है जिसमें कोई ताल नहीं—बस धड़कन है. अगर तुम सुन सको, तो वहाँ हर रिश्ते की पहली चीख़ अब भी गूंजती है.”

अर्पिता नीचे जोड़ती है:

“मैंने तब भी कुछ नहीं कहा था… और आज भी यही सीख रही हूँ, कि प्रेम अक्सर शोर नहीं माँगता—बस एक टूटी खाट की याद काफी है।”

बचपन की चीख़ें: याद नहीं, अनुभव

उस खाट पर बैठी एक बच्ची दौड़ती है—खुली चोटी, मिट्टी लगे पाँव, और हाथ में रंगीनी बिंदी की शीशी. अर्पिता मुस्कराती है—वो दृश्य कल्पना नहीं, उसके भीतर का कोई टुकड़ा है जो अब भी चौपाल में खेल रहा है.

 संकेतात्मक समापन

यह अध्याय बचपन की मासूम चीख़ों और मौन प्रेम की गूंज के बीच झूलता है. चौपाल की टूटी खाट अब भी ठीक है—क्योंकि वह बैठने नहीं, सुनने के लिए बनी थी.

शेष भाग अगले अंक में…,

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