story

धुप-छांव -10.

पेड़ की परछाईं की पहली पुकार “जहाँ धूप थक जाती है, वहीं परछाईं बात करने लगती है।” आम का वह पुराना पेड़ अब भी वहीं खड़ा है—मूक, स्थिर, लेकिन हर पत्ता जैसे किसी पुराने शब्द की प्रतिध्वनि है. अर्पिता उस पेड़ की छांव में बैठती है, वही जगह जहाँ कभी प्रभात अपनी कॉपी खोलकर लिखा करता था. हवा में हलकी-सी मिट्टी की खुशबू है, और कुछ मौन.

वो अपनी डायरी खोलती है। पहली पंक्ति पहले ही प्रभात ने उसके लिए लिख छोड़ी थी— “यह छांव अब तुम्हारी है.”

परछाईं की पहली पुकार – एक आंतरिक संवाद

परछाईं (कल्पित स्वर): “तुम आईं… देर से सही, पर आईं। मुझे तुम्हारे क़दमों की आहट वर्षों से याद थी। तुम वो हो जिसे किसी ने पुकारा नहीं, लेकिन जिसकी वापसी सभी इंतज़ार करते रहे.”

अर्पिता (धीरे से): “मैं उस रिश्ते से लौट रही हूँ जो कभी पूरा नहीं कहा गया… लेकिन हर सांस उसी की थी.”

परछाईं: “प्रभात यहीं था… हर रोज़ इस पेड़ के नीचे बैठता, तुम्हारी कहानियों को अपनी कहानी बना देता. उसने तुम्हें कभी बाँधा नहीं… क्योंकि प्रेम का अर्थ पकड़ना नहीं, बस… रुकना होता है, अगर कोई लौट आए तो.”

डायरी की पहली स्मृति

अर्पिता एक पीला पृष्ठ पलटती है। लिखा है—

“छांव में बैठने वाले अक्सर दूसरों की धूप बनते हैं… तुम भी मेरी धूप थी, बस मैंने कभी कहा नहीं.”

उस वाक्य के नीचे छूटे हुए शब्द हैं—कोरे, लेकिन अर्थपूर्ण. अर्पिता वहाँ अपना पहला वाक्य जोड़ती है—

“मैं लौट आई हूँ, अब मैं तुम्हारी नहीं… पर तुम्हारी छांव की हूँ.”

संकेतात्मक समापन

यह अध्याय सिर्फ एक दृश्य नहीं था, यह एक स्पंदन था—उस मौन प्रेम का, जो कभी परिभाषित नहीं हुआ. अब यह स्मृति अर्पिता की डायरी की पहली आवाज़ बन गई है.

शेष भाग अगले अंक में…,

:

Related Articles

Back to top button