
एक अपरिचित अध्याय
नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे करिश्माई और विवादास्पद व्यक्तित्वों में से एक हैं. उनका जीवन, उनके संघर्ष, और उनका कथित अंत हमेशा से भारतीय इतिहास के सबसे बड़े रहस्यों में से रहे हैं. उनके व्यक्तिगत जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा, उनकी पत्नी एमिली शेंकल (Emilie Schenkl), अक्सर गुमनामी के अँधेरे में रहा है. यह आलेख उनके संबंध, नेताजी के अंत के रहस्य और आज़ादी के बाद भारत द्वारा उनके परिवार के प्रति कथित उपेक्षा पर प्रकाश डालता है.
एमिली शेंकल एक ऑस्ट्रियाई महिला थीं, जिनका जन्म 26 दिसंबर 1910 को विएना, ऑस्ट्रिया में हुआ था. उनके और सुभाष चंद्र बोस के बीच का संबंध द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यूरोप में बोस की गतिविधियों के केंद्र में विकसित हुआ.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस, भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्थन जुटाने और भारतीय समस्या पर एक पुस्तक लिखने के उद्देश्य से यूरोप में थे। विएना उस समय उनका केंद्र था. एमिली शेंकल ने बोस के साथ टंकक (टाइपिस्ट) के रूप में काम करना शुरू किया. उनकी ईमानदारी, समर्पण और बुद्धिमत्ता ने बोस को प्रभावित किया. पेशेवर संबंध धीरे-धीरे एक गहरे व्यक्तिगत और भावनात्मक रिश्ते में बदल गया. एमिली ने बोस को उनकी पुस्तक ‘द इंडियन स्ट्रगल’ के मसौदे में मदद की.
नेताजी का निजी जीवन उनके राजनीतिक जीवन जितना ही गोपनीयता से भरा था. भारत की तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए, उन्हें एक यूरोपीय महिला से अपने विवाह को गुप्त रखना आवश्यक लगा. यह माना जाता है कि उन्होंने वर्ष 1937 में ऑस्ट्रिया के बैड गास्टीन में हिंदू रीति-रिवाजों से एमिली शेंकल से गुप्त रूप से विवाह किया. यह विवाह पूरी तरह से निजी था और उस समय किसी भी सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया गया था. उनकी एक पुत्री, अनीता बोस फाफ (Anita Bose Pfaff), का जन्म 29 नवंबर 1942 को वियना में हुआ था.
वर्ष 1943 में, नेताजी ने भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए एक गुप्त पनडुब्बी यात्रा द्वारा दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए प्रस्थान किया. यह एमिली और बोस की अंतिम मुलाकात थी. एमिली ने अपनी शेष जीवन बोस की वापसी की उम्मीद में एकल माता के रूप में बिताया था. एमिली शेंकल ने बोस के नाम का उपयोग कभी नहीं किया और अपनी आजीविका चलाने के लिए टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में काम किया. बोस की अनुपस्थिति में उन्होंने उनकी बेटी अनीता का पालन-पोषण किया, हमेशा इस उम्मीद के साथ कि एक दिन उनके पति लौटेंगे और उनके बलिदान को पहचान मिलेगी.
18 अगस्त 1945 को ताइवान के ताइपेई में एक विमान दुर्घटना में नेताजी की कथित मृत्यु भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा रहस्य बनी हुई है.
भारत सरकार द्वारा गठित शाह नवाज समिति (वर्ष 1956) और खोसला आयोग (वर्ष 1970) ने निष्कर्ष निकाला कि बोस की मृत्यु विमान दुर्घटना में हुई थी. जापान के रेनकोजी मंदिर में रखी राख को बोस की माना गया. परन्तु बोस के कई समर्थक और परिवार के सदस्य इस दुर्घटना की कहानी पर संदेह करते रहे हैं. उनका मानना था कि बोस बच गए और सोवियत संघ भाग गए, या गुप्त रूप से कहीं और रह रहे थे.
न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग (वर्ष 2005): – इस आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि बोस की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी, और रेनकोजी मंदिर में रखी राख उनकी नहीं है. हालाँकि, भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया, जिससे रहस्य और गहरा गया.
नेताजी के अंत का रहस्य तथ्यों की कमी, शीत युद्ध की भू-राजनीति (सोवियत संघ की भूमिका), और भारत सरकार की अस्पष्टता के कारण दशकों तक बना रहा. यह रहस्य भारतीय जनमानस में बोस के प्रति आस्था और बलिदान की भावना को बनाए रखता है, जबकि सरकार के आधिकारिक संस्करण पर संदेह पैदा करता है. यह दावा कि “उनके परिवार को भारतवर्ष की धरती पर पैर भी नहीं रखने दिया,” तथ्यात्मक रूप से पूरी तरह सही नहीं है.
एमिली ने नेताजी की मृत्यु के बाद अपना जीवन मुख्य रूप से ऑस्ट्रिया में बिताया. वह वर्ष 1996 में अपनी मृत्यु तक कभी भारत में नहीं रहीं. हालाँकि, उन्होंने अपने जीवनकाल में अपनी पुत्री अनीता बोस फाफ को भारत भेजा. नेताजी की पुत्री, डॉ. अनीता बोस फाफ, कई बार भारत आई हैं और उन्होंने भारत में विभिन्न समारोहों और कार्यक्रमों में भाग लिया है. वह एक विवाहित यूरोपीय हैं और जर्मनी में रहती हैं. भारत सरकार ने उन्हें सरकारी सम्मान प्रदान किया है और वह भारत के साथ अपने संबंध को स्वीकार करती हैं.
आज़ादी के बाद की कांग्रेस सरकारों (विशेष रूप से नेहरू-गांधी परिवार) पर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि उन्होंने नेताजी के योगदान को कम करके आंका और उनके रहस्य को सुलझाने में अनिच्छा दिखाई. बोस का करिश्मा जवाहरलाल नेहरू की राजनीतिक विरासत के लिए एक चुनौती पेश करता था.
वर्ष 2015 में, यह खुलासा हुआ कि नेहरू सरकार ने दशकों तक बोस के परिवार के सदस्यों (जैसे भतीजे शिशिर कुमार बोस) पर खुफिया निगरानी रखी थी. आलोचकों ने इसे राजनीतिक दुर्भावना और एक स्वतंत्रता सेनानी के परिवार के प्रति अन्याय के रूप में देखा.
नेताजी को भारत की आज़ादी में उनके अमूल्य योगदान के बावजूद, उन्हें उनकी पत्नी एमिली और बेटी अनीता को आधिकारिक सम्मान या आवश्यक सुरक्षा प्रदान करने में सरकारों ने विलंब किया. एमिली शेंकल को उनकी मृत्यु तक बोस की पत्नी के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता देने में भी संकोच किया गया.
बोस से संबंधित फाइलों को दशकों तक गुप्त रखना भी उपेक्षा की भावना को बढ़ाता है. जनता की मांग के बाद, वर्ष 2016 में नरेंद्र मोदी सरकार ने बोस से संबंधित कई गुप्त फाइलों को सार्वजनिक किया. इन फाइलों के विमुद्रीकरण से यह स्पष्ट हुआ कि नेताजी के अंत के रहस्य को सुलझाने की दिशा में पहले की सरकारों ने पर्याप्त प्रयास नहीं किए थे, जिससे उपेक्षा का आरोप मजबूत होता है.
एमिली शेंकल: उनका संघर्ष और योगदान
बोस के जाने के बाद, एमिली ने अपनी बेटी अनीता को पालने की पूरी जिम्मेदारी अकेले उठाई. ऑस्ट्रिया में युद्ध के बाद के कठिन समय में उन्होंने एक सामान्य कामकाजी महिला के रूप में जीवन जिया, जबकि वह एक महान भारतीय नेता की पत्नी थीं. उन्होंने बोस के पत्रों और दस्तावेजों को सावधानीपूर्वक संरक्षित रखा, जो बाद में बोस के जीवन और विचारों को समझने में महत्वपूर्ण साबित हुए. उन्होंने हमेशा बोस के मिशन को सम्मान दिया और कभी भी अपनी व्यक्तिगत पहचान को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया.
एमिली को भारत में उनकी मृत्यु के बाद ही कुछ हद तक आधिकारिक पहचान मिली. उनका योगदान मुख्य रूप से व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर रहा, लेकिन यह बोस के यूरोपीय नेटवर्क और उनके अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. एमिली शेंकल ने वर्ष 1996 में अपनी मृत्यु तक विएना में एक शांत और गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत किया.
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और एमिली शेंकल की कहानी भारतीय इतिहास का एक अत्यंत संवेदनशील और भावनात्मक अध्याय है. एमिली शेंकल को अक्सर एक ‘जर्मन/ऑस्ट्रियाई पत्नी’ के रूप में संक्षिप्त कर दिया जाता है, लेकिन उनका जीवन स्वतंत्रता संग्राम के एक अंतर्राष्ट्रीय आयाम और एक महान नेता के मानवीय पहलू को दर्शाता है. उनकी बेटी अनीता बोस फाफ ने भारत और बोस की विरासत के प्रति हमेशा गहरा सम्मान दिखाया है.
भारत में आज़ादी के बाद की सरकारों द्वारा बोस और उनके परिवार के प्रति अपनाए गए रुख पर किया गया विश्लेषण दिखाता है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, वैचारिक मतभेद और सत्ता की राजनीति ने एक राष्ट्रीय नायक के योगदान को अस्पष्ट करने की कोशिश की थी. हालाँकि, यह कहना कि उन्हें ‘भारत में पैर भी नहीं रखने दिया गया’ अतिशयोक्तिपूर्ण है, लेकिन उपेक्षा, गोपनीयता और संदेह का माहौल निश्चित रूप से बनाया गया था.
आज, नेताजी को भारत में एक सर्वमान्य नायक के रूप में स्वीकार किया जाता है. केंद्र सरकारें अब उन्हें और उनके परिवार को उचित सम्मान देने के लिए कदम उठा रही हैं. फिर भी, एमिली शेंकल और अनीता बोस फाफ का बलिदान और संघर्ष अपरिचित ही रहा. इस कहानी में छुपे हुए प्रेम, त्याग और राष्ट्रीय कर्तव्य के भाव को भारतीय इतिहास की किताबों में सही जगह मिलना अभी बाकी है.
संजय कुमार सिंह,
राजनीतिक संपादक.



