रीटा का अनुमान सही साबित हुआ. अगले दिन, सुबह होते ही चंचल, रीटा, सूरज और उमेश शहर के पुराने कब्रिस्तान की ओर चल पड़े. यह जगह शहर के बाकी हिस्सों से भी ज़्यादा वीरान और डरावनी थी. टूटी हुई कब्रें और सूखी घास हवा में एक अजीब सी उदासी घोल रही थीं. चंचल को फिर से अपने अंदर वही अजीब सी बेचैनी महसूस होने लगी, जो उसकी बीमारी के दौरान अक्सर होती थी. ऐसा लगा मानो कब्रिस्तान की हर खामोश कब्र उसे कोई अनसुनी कहानी सुना रही हो.
उन्होंने उस बूढ़े संगीतकार की कब्र ढूंढनी शुरू की, जिसके बारे में रीटा ने बताया था. डायरी में “जीवन का अंतिम गीत” का जिक्र था, और उन्हें लगा कि यह किसी संगीतकार से ही जुड़ा होगा. काफी देर तक भटकने के बाद, उन्हें एक बिना नाम की कब्र मिली, जिसके पास एक टूटा हुआ वीणा रखा था. यह वही बूढ़ा संगीतकार था.
सूरज ने अपनी टॉर्च जलाई और कब्र के आसपास की मिट्टी को ध्यान से देखने लगा. तभी उसकी नज़र एक छोटी सी, जंग लगी धातु की वस्तु पर पड़ी. उसने उसे उठाया। यह एक पुरानी, अजीब सी चाबी थी, जिस पर वही गोलाकार प्रतीक बना हुआ था जो बावड़ी के पास शिलालेखों पर था.
“मिल गई! चाबी मिल गई!” सूरज खुशी से चिल्लाया.
चंचल की आँखें चमक उठीं. उसे लगा जैसे उसकी बीमारी का बोझ कुछ कम हो गया हो. रीटा ने चाबी को ध्यान से देखा. यह काफी पुरानी थी और उस पर मिट्टी जमी हुई थी.
“हमें तुरंत बावड़ी पर जाना चाहिए,” रीटा ने कहा.
वे चारों बिना देर किए वापस बावड़ी की ओर भागे. सूरज ने काँपते हाथों से चाबी को उस छोटे से छेद में डाला, जो शिलालेखों के बीच बना था. चाबी ठीक बैठ गई, पर कुछ हुआ नहीं.
“यह खुल क्यों नहीं रहा?” उमेश ने निराशा से पूछा.
चंचल को फिर से वही अनदेखी आवाज़ सुनाई दी, जो उसे बावड़ी में सुनाई दी थी. इस बार आवाज़ ज़्यादा साफ़ थी, मानो हवा में तैर रही हो. आवाज़ कह रही थी, “अंधेरा प्रकाश को जन्म देता है… विश्वास ही मार्ग दिखाता है.”
चंचल ने अपनी आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली. उसे अचानक अपने सपनों में देखी हुई कुछ और बातें याद आईं. “विश्वास… प्रकाश…” उसने बुदबुदाया.
“शायद यह चाबी किसी तंत्र का हिस्सा है, इसे घुमाने से पहले कुछ और चाहिए,” रीटा ने सोचा. उसने शिलालेखों पर बने प्रतीकों को फिर से देखा. उनमें से एक प्रतीक एक उगते हुए सूरज जैसा था, और दूसरा एक चाँद जैसा.
“मुझे लगता है हमें सूरज के निकलने का इंतजार करना होगा,” चंचल ने अचानक कहा. “डायरी में लिखा था ‘जहाँ सूरज की पहली किरण पड़ती है’. शायद यह कोई समय का संकेत है.”
उन्होंने फैसला किया कि वे रात वहीं बावड़ी के पास बिताएंगे और सुबह का इंतजार करेंगे. रात भर, चंचल को फिर से सपने आए. इस बार सपने ज़्यादा स्पष्ट थे उसे एक प्राचीन शहर दिखाई दिया, जो अब वीरान था. लोग खुशी से रह रहे थे, पर फिर एक अजीब सी बीमारी फैल गई, जिसने धीरे-धीरे उन्हें निगल लिया. सपने में उसने कुछ लोगों को देखा जो बावड़ी के पास एक गोलाकार पत्थर को घुमा रहे थे, और जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, एक रोशनी निकली और बीमारी कुछ समय के लिए रुक गई.
सुबह होते ही, जैसे ही सूरज की पहली किरण बावड़ी के छेद पर पड़ी, चंचल ने चाबी को घुमाया. एक धीमी गड़गड़ाहट की आवाज़ आई और बावड़ी के अंदर का गोलाकार पत्थर धीरे-धीरे घूमने लगा. पत्थर के घूमने के साथ ही, बावड़ी के अंदर से एक मद्धम नीली रोशनी निकलने लगी, और हवा में एक अजीब सी खुशबू फैल गई.
चंचल को लगा जैसे उसके शरीर में ऊर्जा का संचार हो रहा हो. उसकी बीमारी का दर्द कम हो गया था, और उसका मन शांत महसूस कर रहा था.
“यह क्या है?” उमेश ने आश्चर्य से पूछा.
“मुझे लगता है यह कोई प्राचीन औषधि है… या कुछ ऐसा जो इस शहर को बचा सकता था,” रीटा ने कहा. “और शायद यह चंचल की बीमारी से भी जुड़ी है.”
क्या यह नीली रोशनी चंचल की बीमारी का इलाज थी? क्या इस बावड़ी के नीचे कोई और रहस्य छिपा था? और इस वीरान शहर का अतीत इस सब से कैसे जुड़ा था?
क्या आप जानना चाहेंगे कि इस नीली रोशनी का क्या रहस्य था?
शेष भाग अगले अंक में…,



