
स्वतंत्रता सेनानी कनाईलाल दत्त
कनाईलाल दत्त भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक वीर स्वतंत्रता सेनानी थे, जो अंग्रेजों के खिलाफ अपने साहसिक कार्यों के लिए जाने जाते हैं. उनका जन्म 30 अगस्त 1888 को बंगाल के हुगली जिले में हुआ था. वे क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के सक्रिय सदस्य थे, जो भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का समर्थन करती थी.
कनाईलाल दत्त को विशेष रूप से पुलिन बिहारी दास के मार्गदर्शन में क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल किया गया. उन्होंने अपने साथी क्रांतिकारी सत्येन बोस के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ कई साहसिक अभियानों को अंजाम दिया. उन्हें वर्ष 1908 में नारायणगढ़ जेल में एक ब्रिटिश अधिकारी की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया.
कनाईलाल दत्त का जीवन बलिदान और देशभक्ति का प्रतीक है. उन्हें 10 नवंबर 1908 को केवल 20 वर्ष की आयु में फांसी की सजा दी गई. उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक प्रेरणादायक उदाहरण है, जिसने अन्य युवाओं को भी स्वतंत्रता के लिए समर्पित होने की प्रेरणा दी.
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राजनीतिज्ञ और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकम सिंह
सरदार हुकम सिंह भारतीय राजनीति के एक प्रमुख नेता थे, जिन्होंने लोकसभा अध्यक्ष और राजस्थान के राज्यपाल के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनका जन्म 30 अगस्त 1895 को सहिवाल जिले (अब पाकिस्तान में) में हुआ था.
सरदार हुकम सिंह का प्रारंभिक जीवन पंजाब में बीता. उन्होंने खालसा कॉलेज, अमृतसर से स्नातक किया और बाद में लॉ कॉलेज, लाहौर से एल एल. बी. की डिग्री प्राप्त की. इसके बाद वे मोंटगोमरी में वकील के रूप में कार्य करने लगे. हुकम सिंह ने सिख गुरुद्वारों को ब्रिटिश शासन के प्रभाव से मुक्त कराने के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई. वर्ष 1923 में जब शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को गैरकानूनी घोषित किया गया, तो उन्होंने इसके लिए संघर्ष किया और वर्ष 1924 में उन्हें दो साल की जेल की सजा हुई.
सरदार हुकम सिंह वर्ष 1950-52 की अंतरिम संसद और पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा के सदस्य रहे. 17 अप्रैल 1962 को उन्हें तीसरी लोकसभा के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया गया और उन्होंने 16 मार्च 1967 तक इस पद को संभाला. इसके बाद वे वर्ष1967 – 72 तक राजस्थान के राज्यपाल रहे.
भारत विभाजन के दौरान, उन्होंने मोंटगोमरी में हिंदू और सिख समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने दंगाइयों से बचने के लिए लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया और अंततः खुद भी भारत आकर अपने परिवार से मिले. सरदार हुकम सिंह का 27 मई 1983 को निधन हो गया. वे एक प्रख्यात सांसद, न्यायविद, समाज सुधारक और सक्षम प्रशासक थे, जिन्होंने भारतीय राजनीति में अमिट छाप छोड़ी.
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साहित्यकार भगवती चरण वर्मा
भगवती चरण वर्मा हिंदी साहित्य के एक साहित्यकार थे. जिनका जन्म 30 अगस्त 1903 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर गाँव में हुआ था और उनका निधन 5 अक्टूबर 1981 को हुआ. वह एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, जिन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, और पत्रकारिता जैसे कई क्षेत्रों में अपना योगदान दिया.
भगवती चरण वर्मा ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए., एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की. उन्होनें लेखन तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य किया. भगवती चरण वर्मा मुख्य रूप से अपने उपन्यासों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने साहित्य में सामाजिक और मनोवैज्ञानिक यथार्थ को गहराई से दर्शाया हैं.
उनके उपन्यासों में समाज की सच्चाई, उसकी विसंगतियों और बदलते मूल्यों का वास्तविक चित्रण मिलता है. वे समस्याओं को उपदेशक की तरह नहीं, बल्कि एक सजग चितेरे की तरह प्रस्तुत करते हैं. उन्होंने पात्रों के मन की गहराई में उतरकर उनकी भावनाओं और संघर्षों को उजागर किया. उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास चित्रलेखा इसी का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसमें पाप-पुण्य की अवधारणा पर गहराई से विचार किया गया है.
वर्मा ने इतिहास को भी अपनी रचनाओं का आधार बनाया, जैसे कि भूले-बिसरे चित्र. इस उपन्यास में उन्होंने कई पीढ़ियों के सामाजिक और पारिवारिक बदलावों को चित्रित किया, जिसके लिए उन्हें वर्ष 1961 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.
प्रमुख कृतियाँ: – चित्रलेखा (1934), भूले-बिसरे चित्र (1959), टेढ़े-मेढ़े रास्ते (1946), सबहिं नचावत राम गोसाईं (1970).
कविता संग्रह: – मधुकण (1932), प्रेम-संगीत (1937), मानव (1940).
कहानी संग्रह: – दो बाँके (1938), इंस्टालमेंट (1936).
साहित्य के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया. उनके उपन्यास ‘भूले-बिसरे चित्र’ के लिए वर्ष 1961 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा वर्ष 1971 में पद्म भूषण सम्मान से सम्मानित किया गया. इसके अलावा, वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे. भगवतीचरण वर्मा का निधन 5 अक्टूबर 1981 को हुआ था.
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गीतकार शैलेन्द्र
गीतकार शैलेन्द्र, हिंदी सिनेमा के सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय गीतकारों में से एक थे. उन्होंने अपने गीतों में आम इंसान के जीवन के सुख-दुख, संघर्ष और उम्मीद को बड़ी ही सरलता और गहराई से बयां किया. उनके गीत सिर्फ गीत नहीं थे, बल्कि वे कविताएं थीं जो लोगों के दिल को छू जाती थीं.
शैलेन्द्र का जन्म 30 अगस्त 1923 को रावलपिंडी (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था. उनका पूरा नाम शंकरदास केसरीलाल शैलेन्द्र था. उनका बचपन बेहद गरीबी में बीता. एक समय ऐसा भी था जब उन्हें भूख मिटाने के लिए बीड़ी पीनी पड़ती थी. उनकी मां और बहन की बीमारी के कारण हुई असामयिक मृत्यु ने उनके मन में ईश्वर के प्रति विश्वास को हिला दिया था.
उन्होंने मथुरा में रेलवे में नौकरी की और साथ ही कविताएं भी लिखते रहे. वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुड़े थे और उनकी कविताएं साहित्यिक पत्रिकाओं में छपती थीं. राज कपूर ने उन्हें एक कवि सम्मेलन में सुना और उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर अपनी फिल्म ‘बरसात’ (1949) में गीत लिखने का मौका दिया. यहीं से हिंदी सिनेमा में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई.
शैलेन्द्र और राज कपूर की जोड़ी भारतीय सिनेमा की सबसे कामयाब जोड़ियों में से एक थी. राज कपूर की फिल्मों के लिए शैलेन्द्र ने कई अविस्मरणीय गीत लिखे, जिनमें “आवारा हूँ” (आवारा), “मेरा जूता है जापानी” (श्री 420), और “किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार” (अनाड़ी) जैसे गीत शामिल हैं. इन गीतों में समाज के सबसे निचले तबके के लोगों की भावनाओं को दर्शाया गया था.
शैलेन्द्र के गीतों में मानवीय संवेदना, आशा और दार्शनिकता का अद्भुत मिश्रण मिलता है. उन्होंने 171 हिंदी और 6 भोजपुरी फिल्मों के लिए गीत लिखे और अपने गीतों के लिए तीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार भी जीता.
गीत: –
- ‘मेरा जूता है जापानी’ – (फिल्म: श्री 420)
- ‘आवारा हूँ’ – (फिल्म: आवारा)
- ‘आज फिर जीने की तमन्ना है’ – (फिल्म: गाइड)
- ‘गाता रहे मेरा दिल’ – (फिल्म: गाइड)
- ‘अजीब दास्तां है ये’ – (फिल्म: दिल अपना और प्रीत पराई)
- ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ – (फिल्म: तीसरी कसम)
- ‘ये रात भीगी भीगी’ – (फिल्म: चोरी चोरी)
- ‘किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार’ – (फिल्म: अनाड़ी)
शैलेन्द्र ने फिल्म ‘तीसरी कसम’ का निर्माण भी किया. इस फिल्म को बनाने में उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा. 14 दिसंबर 1966 को मात्र 43 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया.
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अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह
चित्रांगदा सिंह एक भारतीय अभिनेत्री, मॉडल और निर्माता हैं जो मुख्य रूप से हिंदी सिनेमा में काम करती हैं. उनका जन्म 30 अगस्त 1976 को राजस्थान के जोधपुर में हुआ था. उनके पिता कर्नल निरंजन सिंह चहल एक भारतीय सेना अधिकारी हैं. चित्रांगदा सिंह की शादी ज्योति रांधवा से हुई हैं. वह एक गोल्फ प्लेयर है. हलांकि इन दोनी की शादी किन्ही कारणों से ज्यादा दिन नहीं टिक सकी और वर्ष 2014 को इस जोड़ी का तलाक हो गया. इस जोड़ी का एक बेटा है जिसका नाम ज़ोरावर रंधावा है.
चित्रांगदा सिंह ने अपनी शुरुआती पढ़ाई मेरठ से संपन्न की है. उन्होंने होम साइंस से स्नातक की पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी से संपन्न की है. वह एक पारंगत कथक नृतिका भी हैं. पढ़ाई खत्म होने के बाद चित्रांगदा ने मॉडलिंग की दुनिया में कदम रखा, उन्होंने अपने मॉडलिंग कैरियर के दौरान कई ब्रांड्स को एंडोर्स भी किया.
चित्रांगदा सिंह ने अपने अभिनय कैरियर की शुरुआत वर्ष 2003 में फिल्म हज़ारों ख्वाइशें ऐसी से की थी. उसके बाद वर्ष 2005 में वह फिल्म काल में में नजर आई. हालांकि फिल्म काल बॉक्स-ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं.
प्रमुख फिल्में: – हजारों ख्वाहिशें ऐसी (2005), ये साली जिंदगी (2011), देसी बॉयज़ (2011), इंकार (2013), बाजार (2018), बॉब बिस्वास (2021), गैसलाइट (2023), सूरमा (2018).
फिल्मों के अलावा, उन्होंने कई विज्ञापनों और म्यूजिक वीडियो में भी काम किया है, जिसमें अल्ताफ राजा का लोकप्रिय गाना “तुम तो ठहरे परदेसी” भी शामिल है, जिससे उन्हें काफी लोकप्रियता मिली थी.
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अभिनेत्री अनु चौधरी
अनु चौधरी एक भारतीय अभिनेत्री हैं जो मुख्य रूप से ओड़िया, तेलुगु, छत्तीसगढ़ी, बंगाली और हिंदी फिल्मों में काम करती हैं. उन्होंने 65 से ज़्यादा फिल्मों में अभिनय किया है.
अनु चौधरी का जन्म 30 अगस्त 1979 को भुवनेश्वर के उड़िया फिल्म संपादक रबी चौधरी और सौदामिनी चौधरी के घर हुआ था. अनु ने रमा देवी महिला कॉलेज , भुवनेश्वर से गृह विज्ञान में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है. अनु ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत उड़िया फिल्म में बाल कलाकार के रूप में की थी. मुख्य मुख्य अभिनेत्री के रूप में उनकी पहली फिल्म माँ गोजबयानी थी जो वर्ष 1998 में एक बड़ी हिट फिल्म थी.
प्रमुख फ़िल्में: –
ओड़िया फ़िल्में: – माँ गोजा बयानी (उनकी पहली फिल्म), परब, दादर आदेश, सिंदूर, बाबू आई लव यू, हंगाम, राजमहल, इत्यादि.
हिंदी फ़िल्में: – बबलू हैप्पी है (2014),
अन्य: – उन्होंने तेलुगु, बंगाली और छत्तीसगढ़ी फिल्मों में भी काम किया है.
अनु चौधरी को ओड़िशा राज्य फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.