जीका वायरस…. - Gyan Sagar Times
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जीका वायरस….

जब भी हम सभी वायरस की बात करते है तो कोई भी वायरस मच्छर, मक्खी या अन्य किसी जीव के जरिए मानव तक पहुंचता हैं. बताते चलें कि, डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया भी मच्छरों के जरिए ही फैलता है ठीक उसी प्रकार “जीका” भी मच्छर के जरिए ही होता है. यह एक प्रकार का एडीज मच्छर ही है, जो दिन में सक्रिय रहते हैं. अगर यह मच्छर किसी संक्रमित व्यक्ति को काट लेता है, जिसके खून में वायरस मौजूद है, तो यह किसी अन्य व्यक्ति को काटकर वायरस फैला सकता है. मच्छरों के अलावा असुरक्षित शारीरिक संबंध और संक्रमित खून से भी जीका वायरस फैलता है.

जीका वायरस के लक्षण भी डेंगू बुखार की तरह होते हैं, इसके मुख्य लक्षण है बुखार, लाल आँखें, जोड़ों में दर्द, सर दर्द, शरीर पर रैशेस या लाल चकते. कुछ मामलों में यह बीमारी हमारे नर्वस सिस्टम के डिसऑर्डर में भी बदल जाती है. चिकित्सक के अनुसार, सबसे ज्यादा खतरा गर्भवती महिलाओं या नवजात शिशु पर पड़ता है. यह वायरस इतना खतरनाक है कि, अगर किसी गर्भवती महिला को हो जाए तो गर्भ में पल रहे बच्चे को भी यह बुखार हो सकता है. जिस वजह से बच्चे के सिर का विकास रूक सकता है और वर्टिकली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन भी फैल सकता है. वर्टिकली ट्रांसमिटेड इंफेक्शन में स्किन रैशेज़ या दाग, पीलिया, लिवर से जुड़ी बीमारियां, अंधापन, दिमागी बीमारी, ऑटिज़्म, सुनने में दिक्कत और कई बार बच्चे की मौत भी हो सकती है. वहीं, वयस्कों में जीका वायरस गुलैन-बैरे सिंड्रोम का कारण बन सकता है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली नसों पर हमला करती हैं, इस वजह से शरीर में कई दिक्कतों  की शुरुआत होती है.

इसका संबंध अफ्रीका के जिका जंगल से है. जहां से 1947 में अफ्रीकी विषाणु अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिक पीले बुखार पर रिसर्च करने रीसस मकाक (एक प्रकार का लंगूर) को लाए. इस लंगूर को हुए बुखार की जांच की गई, जिसमें पाए गए संक्रामक घटक (Infectious component) को जगंल का ही नाम ‘जिका’ दिया गया. इसके 7 साल बाद 1954 में नाइजीरिया के एक व्यक्ति में यह वायरस पाया गया. इस वायरस के ज्यादा मामले पहली बार 2007 में अफ्रीका और एशिया के बाहर देखने को मिले. इस वायरस का कोई टीका नहीं है, न ही कोई उपचार है. इस संक्रमण से पीड़ित लोगों को दर्द में आराम देने के लिए पैरासिटामॉल (एसिटामिनोफेन) दी जाती है.

आप अपने आस-पास मच्छरों को फैलने से रोकने के लिए पानी को ठहरने ना दें, हमेशा मच्छरदानी का प्रयोग करना चाहिए, आस-पास की साफ़-सफाई रखनी चाहिए और शरीर पर पुरे कपड़े पहनना चाहिए.

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