लोकआस्था का महापर्व:– छठ - Gyan Sagar Times
Dhram Sansar

लोकआस्था का महापर्व:– छठ

हिन्दू धर्मानुसार, भगवान आदित्य ही ऐसे एकमात्र देवता हैं जो प्रत्यक्ष रूप से लोगों को दिखाई देते हैं, इनका वर्णन वेद और पुरानों में भी किया गया है. भगवान सूर्य की पत्नी का नाम अदिति और छाया है. वैदिक काल से ही भगवान विश्वरूप की पूजा होती चली आ रही है, भगवान भास्कर के उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण व ब्रह्म वैवर्त पुराण में विस्तार से चर्चा की गई है. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, सूर्य शक्तियों के स्वामी हैं और उनकी शक्ति का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी अदिति और छाया है. भगवान सूर्य की आराधना में उनकी पत्नी को ही अर्घ्य देकर प्रणाम करते हैं. हिन्दू धर्म में सूर्य की उपासना प्रतिदिन करते हैं, आमजनजीवन प्रतिदिन भगवान आदित्य को स्नान कर और उषाकाल में ही अर्घ्य देकर अपने दैनिक कार्य प्रारम्भ करते हैं. कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष चतुर्दशी से प्रारम्भ होकर सप्तमी को समाप्त होनेवाले चार दिवसीय महापर्व को अपभ्रंश रूप में छठ पूजा या छठी मईया भी कहते हैं. बताते चले कि, “षष्ठी” का अपभ्रंश है छठ, कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को यह व्रत मनाये जाने के कारण इसका नामकरण छठ व्रत पड़ा. चार दिवसीय महापर्व में सबसे बड़ी बात यह है कि 36 घंटो का निर्जला उपवास जिसमें पानी (जल) पीने से व्रत टूट जाता है. हिन्दू धर्म की सबसे कठिन उपासना भगवान विश्वरूप (सूर्य) की ही होती है.

सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, नेपाल सहित पुरे विश्व में मनाया जाता है. सूर्योपासना का महापर्व सिर्फ हिन्दू ही नहीं अन्य धर्मो के मानने वाले लोग भी मनाते है. सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण ही इसे छठ कहा जाता है, इस पर्व को साल में दो बार मनाया जाता है, क. चैत महीने में, ख. कार्तिक महीने में. चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाये जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है. पारिवारिक सुख-समृद्धी तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है, इसे स्त्री और पुरुष दोनों समान रूप से इस पर्व को मनाते हैं. सूर्योपासना और छठ से सम्बन्धित हमारे धर्मग्रन्थो में कई कहानियाँ या प्रसंगों का वर्णन मिलता है. महाभारत में एक प्रसंग आता है… सूत पुत्र या यूँ कहें, सूर्य पुत्र कर्ण. कहा जाता है कि, कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वह घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर भगवान आदित्य की आराधना किया करते थे.

महाभारत के एक और प्रसंग के अनुसार, जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्री कृष्ण द्वारा बताये जाने पर द्रौपदी ने भी छठ व्रत रखा था और उनकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया. पुरानो के अनुसार, राजा प्रियवद की कोई सन्तान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर को महारानी मालिनी को खिलाई गई. कुछ समय पश्चात राजा प्रियवद को मृत पुत्र का जन्म हुआ, प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे, उसी समय ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि, सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ. हे राजन! आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें. राजा प्रियवद ने भी पुत्र की इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. राजा प्रियवद ने षष्ठी देवी का व्रत-पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को की थी. लोक परम्परा के अनुसार कहा जाता है कि, भगवान सूर्यदेव और छठी मइया का सम्बन्ध भाई-बहन का है, लोक मातृका के अनुसार षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी.

चार दिवसीय महापर्व छठ की शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को नहाय-खाय के रूप में मनाया जाता है. इस दिन सर्व प्रथम छठ व्रती अपने घरों की सफाई करते हैं और स्नान कर पवित्र होकर शुद्ध शाकाहारी भोजन बनाकर व्रती भगवान भास्कर के व्रत का संकल्प लेते हैं और उसके बाद बना हुआ प्रसाद ग्रहण करते हैं, उसके बाद ही परिवार व समाज केलोग प्रसाद ग्रहण करते हैं. दुसरे दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी को को व्रतधारी दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं, इसे ‘खरना’ कहा जाता है. प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है, इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है. इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है. तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी के दिन में प्रसाद बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ भागों में “टिकरी” भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, उसे बनाते हैं. शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं. सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है. चौथा और आखरी दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. व्रति वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। सभी व्रती तथा श्रद्धालु घर वापस आते हैं और  गाँव के पीपल के पेड़ को पूजा करते हैं. पूजा के बाद व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर और गुड व आदि खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना भी कहते हैं.

छठ पूजा में सबसे बड़ी बात यह होती है कि, इस पूजा में सादगी और पवित्रता का बड़ा ख्याल रखा जाता है. भक्ति और अध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बांस और मिटटी से बने बर्तनों का ही प्रयोग किया जाता है. पकवान बनाने के लिए गन्ने का रस या मीठा (गुंड), चावल और गेहूं का ही प्रयोग किया जाता है. छठ के बारे में कहा जाता है कि, इसकी विधि सबसे अलग है, यह जन सामान्य के द्वारा अपने रीती-रिवाजो के रंगों में गधी गई उपासना पद्धति है, इसके केंद्र में वेद-पुराण ना होकर ग्रामीण परिवेश से जुड़ी हुई परम्परा या जीवन दीखता है. इस व्रत को करने के लिए किसी पुरोहित या गुरु की जरूरत नहीं होती है. आस-पास के सहयोग और परिवार के लोग मिलकर ही सामूहिक अभियान संगठित कर जनता स्वयं ही नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था कर उत्सव का आनंद मनाती है. इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है साथ ही सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन होता है.

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The great festival of folk faith:- Chhath

 

According to the Hindu religion, Lord Aditya is the only deity who is directly visible to the people, he is also described in Vedas and Puranas. The name of the wife of Lord Surya is Aditi and Chhaya. The worship of Lord Vishwaroop has been going on since Vedic times, and the worship of Lord Bhaskar has been discussed in detail in Vishnu Purana, Shrimad Bhagwat Mahapuran, and Brahma Vaivarta Purana. According to mythological texts, Surya is the lord of powers and the main source of his power is his wife Aditi and Chhaya. In the worship of Lord Surya, he bows to his wife by offering arghya. In the Hindu religion, people worship the Sun every day, the common people start their daily work by bathing Lord Aditya every day and offering Arghya in the early morning. Starting from the Shukla Paksha Chaturdashi of Kartik month and ending on Saptami, the four-day festival is also called Chhath Puja or Chhathi Mayya in Apabhramsha form. It is said that Chhath is the Apabhramsha of “Shashthi”, due to the celebration of this fast on the Shashthi of Kartik Shukla Paksha, it was named Chhath Vrat. The biggest thing in the four-day festival is the 36-hour waterless fast, in which the fast is broken by drinking water. The most difficult worship of the Hindu religion is only of Lord Vishwaroop (Sun).

This unique folk festival of sun worship is mainly celebrated in the whole world including Bihar, Jharkhand, eastern Uttar Pradesh, and Nepal in eastern India. The great festival of Suryapasana is celebrated not only by Hindus but also by people of other religions. It is called Chhath because of Surya Shashthi fasting, this festival is celebrated twice a year, a. in the month of Chait, b. in the month of Kartik. The Chhath festival celebrated on Chaitra Shukla Paksha Shashthi is called Chaiti Chhath and the festival celebrated on Kartik Shukla Paksha Shashthi is called Kartiki Chhath. This festival is celebrated for family happiness and prosperity and for getting desired results, it is celebrated equally by both men and women. Many stories or episodes are described in our scriptures related to sun worship and Chhath. There is a context in the Mahabharata… Suta Putra or rather, Surya’s son Karna. It is said that Karna was a great devotee of Lord Surya and he used to worship Lord Aditya by standing in water for hours.

According to another episode of Mahabharata, when Pandavas lost their royal palace in gambling, then Draupadi also kept Chhath fast on being told by Shri Krishna that their wishes were fulfilled and Pandavas got the royal palace back. According to the ancients, King Priyavad had no children, then Maharishi Kashyap performed Putreshti Yagya and fed the Kheer made for Yagyahuti to Queen Malini. After some time a dead son was born to King Priyavad, Priyavad went to the crematorium with the son and the son started sacrificing his life in separation, at the same time Devasena, the psychic daughter of Brahma, appeared and said that, to be born from the sixth part of the original nature of the universe. Because I am called Shashti. Hey Rajan! You worship me and inspire people to worship. King Priyavad also fasted for Goddess Shashthi with the wish of a son and he got the son Ratna. King Priyavad did fast worship of Goddess Shashthi on Kartik Shukla Paksha Shashthi. According to folk tradition, it is said that Lord Suryadev and Chhathi Maiya have a brother-sister relationship, according to the folk Matrika, the first worship of Shashthi was done by Surya.

The beginning of the four-day Mahaparva Chhath is celebrated as Nahay-Khay on Kartik Shukla Paksha Chaturdashi. On this day, first of all, Chhath fast cleans their homes and after taking bath, making pure vegetarian food, the fasting takes a vow of Lord Bhaskar’s fast and after that, they take the prasad prepared, only then the family and the people of the society accept the prasad. Huh. On the second day of Kartik Shukla Paksha Panchami, the fasting fasts for the whole day and eating food in the evening, it is called ‘Kharna’. As prasad, rice kheer made in sugarcane juice is made with milk, rice pita, and ghee, no salt or sugar is used in it. During this, special care is taken of the cleanliness of the whole house. On the third day, Prasad is made on the day of Kartik Shukla Paksha. In the form of prasad, thekua, which is also called “tikri” in some parts, apart from rice laddus, also known as ladua, are made. In the evening, after all the preparations and arrangements, Arghya soup is decorated in a bamboo basket, and the family and all the people of the neighborhood fast start towards the Ghat to offer Arghya to the setting sun. Water and milk are offered to the Sun and Chhathi Maiya is worshiped with a soup filled with prasad. Arghya is offered to the rising sun on the morning of Kartik Shukla Paksha Saptami on the fourth and last day. The Vratis regroup at the same place where they had offered Arghya on the previous evening. Again the process of the previous evening is repeated. All the devotees and devotees come back home and worship the Peepal tree in the village. After the worship, the fasting is completed by drinking sherbet of raw milk and eating jaggery and etc., which is also called Paran or Parana.

The biggest thing in Chhath Puja is that, in this worship, great care is taken of simplicity and purity. In this festival full of devotion and spirituality, only utensils made of bamboo and clay are used. Sugarcane juice or sweet, rice and wheat are used to make the dish. It is said about Chhath that, its method is different, it is a method of worship done by the common man in the colors of his customs, not the Vedas-Purana in its center, but the tradition of life associated with the rural environment. Is. No priest or guru is needed to observe this fast. By organizing a collective campaign with the help of nearby people and family members, the people themselves celebrate the festival by cleaning the cities, managing the passage of the devotees, and making suitable arrangements for the donation of Arghya on the banks of the pond or river. In this festival, from the festival of Kharna to Ardhyadan, there is an essential presence of the society, as well as forgetting the difficulties of their daily life of the common and poor people, there is a huge and grand display of the collective work done with the spirit of service and devotion.

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