Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-19…

समुन्द्र पर श्री राम जी का क्रोध और समुन्द्र की विनती, श्रीराम गुणगान की महिमा…

दोहा :-

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, तीन दिन बीत गए, किन्तु समुन्द्र विनय ही नही मानता है. तब श्रीरामचंद्रजी क्रोध में आकार बोले – बिना भय के प्रीति नही होती है.

चौपाई :-

लछिमन बान सरासन आनू।  सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती ।।

वालव्याससुमनजीमहाराज

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे लक्ष्मण ! धनुष-बाण लाओ, मै अग्निबाण से समुन्द्र को सोख डालूँ. मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुन्दर नीति ( उदारता का उपदेश ).

ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।

क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, ममता मे फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से  शांति  की बात और कामी से भगवान् की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर मे बीज बोने से होता है.

अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।

संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, ऐसा कहकर ज्योहीं श्री रघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया. यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत ही अच्छा लगा. प्रभु ने भयानक ( अग्नि ) बाण संधान किया, जिससे समुन्द्र के हृदय के अंदर अग्नि की ज्वाला उठी.

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।

कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, मगर, साँप तथा मछलियो के समूह व्याकुल हो गए. जब समुन्द्र ने जीवो को जलते जाना, तब सोने के थाल मे अनेक मणियो व रत्नो को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप मे आया.

दोहा :-

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।

बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, काकभुशुण्डि जी कहते है – हे गुरूड़ जी ! सुनिए, चाहे कोई करोड़ो उपाय करके सींचे, पर केला तो काटने पर ही फलता है, नीच विनय से नही मानता, वह डाँटने पर ही रास्ते पर आता है.

चौपाई :-

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।

गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, समुन्द्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा – हे नाथ ! मेरे सब दोष को क्षमा कीजिए. हे नाथ ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है.

तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।

प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हे सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है, सब ग्रंथो ने यही गाया है. जिसके लिए स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकार से रहने मे सुख पाता है.

प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही ।।

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे दंड दी, किंतु मर्यादा ( जीवो का स्वभाव ) भी आपकी ही बनाई हुई है. ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री – ये सब शिक्षा के अधिकारी है.

प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई ।।

प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, प्रभु के प्रताप से मै सूख जाऊँगा और सेना पार उतर जाएगी, इसमे मेरी बड़ाई नही है. तथापि प्रभु की आज्ञा का उल्लंघन नही हो सकता ) ऐसा वेद गाते है. अब आपको जो अच्छा लगे, मै तुरन्त वही करूँ.

दोहा :-

सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।

जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, समुन्द्र के अत्यंत विनीत वचन सुनकर कृपालु श्रीरामचंद्रजी ने मुस्कुराकर कहा – हे तात ! जिस प्रकार वानरो की सेना पार उतर जाए, वह उपाय बताओ!.

चौपाई :-

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई ।।

तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, समुन्द्र ने कहा – हे नाथ ! नील और नल दो वानर भाई है. उन्होने लड़कपन मे ऋषि से आशीर्वाद पाया था. उनके स्पर्श कर लेने से ही भारी-भारी पहाड़ भी आपके प्रताप से समुन्द्र पर तैर जाएँगे.

मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई ।।

एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, मै भी प्रभु की प्रभुता को हृदय मे धारण कर अपने बल के अनुसार ( जहाँ तक मुझसे बन पड़ेगा ) सहायता करूँगा. हे नाथ ! इस प्रकार समुन्द्र को बँधाइए, जिससे तीनो लोको मे आपका सुन्दर यश गाया जाए.

एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी ।।

सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, इस बाण से मेरे उत्तर तट पर रहने वाले पाप के राशि दुष्ट मनुष्यो का वध कीजिए. कृपालु और रणधीर श्री रामचंद्रजी ने समुन्द्र के मन की पीड़ा सुनकर उसे तुरन्त ही बाण से उन दुष्टो का बध कर दिया.

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी ।।

सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, श्रीरामचंद्रजी का भारी बल और पौरूष देखकर समुन्द्र हर्षित हो गया. उसने उन दुष्टो का सारा चरित्र प्रभु को कह सुनाया. फिर चरणो की वंदना करके समुन्द्र चला गया.

छन्द :-

निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ ।

यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, समुन्द्र अपने घर चला गया, श्रीरघुनाथजी को  उसकी सलाह अच्छी लगी. यह चरित्र कलियुग के पापो को हरने वाला है, इसे तुलसीदास ने अपनी बुद्धि के अनुसार गाया है.

सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना ।।

तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, श्रीरघुनाथजी के गुण समूह सुख के धाम, संदेह का नाश करने वाले और विषाद का दमन करने वाले है. अरे मूर्ख मन ! तू संसार का सब आशा-भरोसा त्यागकर निरंतर इन्हे गा और सुन.

दोहा :-

सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान ।

सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, श्रीरघुनाथजी का गुणगान संपूर्ण सुंदर मंगलो का देने वाला है. जो इसे आदर सहित सुनेंगे, वे बिना किसी अन्य साधन के ही भवसागर से पार कर जाएँगे.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्रीरामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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