Dhram Sansar

षट्तिला एकादशी…

वालव्याससुमनजीमहाराज

सत्संग के दौरान एक भक्त ने महाराज जी पूछा कि, महाराजजी माघ महीने के कृष्ण पक्ष की जो एकादशी होती है, उसके बारे में सुना है कि, इस दिन तिल का दान करना चाहिए. वालव्याससुमनजीमहाराज कहते है कि माघ का महीना पवित्र और पावन होता है और इस महीने के व्रत बड़े ही पुण्यदायी होते हैं. महाराजजी कहते हैं कि, एक समय की बात है दाल्भ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा कि, महाराजजी, इस पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी पराये धन की चोरी, दूसरों को देखकर इर्ष्या करना और अनेक प्रकार के व्यसनों का उपभोग करते हैं फिर भी उन्हें नरक प्राप्त नहीं होता है. महाराजजी इसका क्या कारण है आखिर कौन सा दान-पुण्य करते हैं कि उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं. हे प्रभु ऐसा कौन सा गुप्त तत्व है जिसका भेद ब्रह्मा, विष्णु, शिव-शंकर और अन्य देवता भी नहीं जानते हैं.

पुलस्त्यजी महाराज कहते है कि, माघ महीने में मनुष्यों को पवित्रता और शुद्धता से रहना चाहिए साथ ही इन्द्रियों को वश में कर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और इर्ष्या को त्यागकर भगवान वैकुंठपति का ध्यान लगाते हुए मन्त्रों का जप करना चाहिए. वालव्याससुमनजी महाराज कहते है कि इस व्रत में तिल का विशेष महत्व होता है. कहा जाता है कि तिल को जितने रूपों में दान किया जाता है उतने ही हजार वर्षों तक स्वर्ग में स्थान प्राप्त होता है. वालव्याससुमनजीमहाराज कहते है कि शास्त्रों के अनुसार तिल के छ: प्रकार के दान बताये गये हैं. तिल मिश्रित स्नान, तिल का उबटन, तिल का तिलक, तिल मिश्रित जल, तिल का हवन और तिल का भोजन. महाराजजी कहते हैं कि, इन चीजों का स्वयं भी प्रयोग करें और कुल पुरोहित या ब्राह्मण को दान भी दें.

व्रत विधि:-

एकादशी के पूर्व दशमी को रात्री में एक बार ही भोजन करना आवाश्यक है उसके बाद दुसरे दिन सुबह उठ कर स्नान आदि कार्यो से निवृत होने के बाद व्रत का संकल्प भगवान विष्णु के सामने संकल्प लेना चाहिए. उसके बाद भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र की स्थापना करें. भगवान विष्णु की पूजा के लिए धूप, दीप, फल और पंचामृ्त से पूजन करना चाहिए. भगवान विष्णु के स्वरूप का स्मरण करते हुए ध्यान लगायें, उसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके, कथा पढ़ते हुए विधिपूर्वक पूजन करें. ध्यान दें…. एकादशी की रात्री को जागरण अवश्य ही करना चाहिए, दुसरे दिन द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मणो को अन्न दान, जनेऊ व दक्षिणा देकर इस व्रत को संपन्न करना चाहिए.

पूजन सामाग्री:-

रोली, गोपी चन्दन, गंगा जल, दूध, दही, गाय के घी का दीपक, सुपाड़ी, मोगरे की अगरबत्ती, ऋतू फल, फुल, आंवला, अनार, लौंग, नारियल, तिल, तिल के बने पदार्थ, नीबूं, नवैध, केला, तिल और उड़द की खिचड़ी और तुलसी पत्र व मंजरी.

कथा:-

एक समय की बात है नारद मुनि त्रिलोक का भ्रमण करते हुए वैकुंठ धाम पहुंचे और वैकुंठपति को प्रणाम करते हुए प्रश्न किया ! हे प्रभु षट्तिला एकादशी का क्या महात्यम है और इस एकादशी से कैसा पुण्य मिलता है. भगवान विष्णु ने कहा कि, प्राचीन काल में पृथ्वी पर एक ब्राह्मणी रहती थी, उस ब्राह्मणी की  मुझमें बहुत ही श्रद्धा और भक्ति रखती थी. वह स्त्री मेरे निमित सभी व्रत रखती थी. एक बार उसने एक महीने तक व्रत रखकर मेरी आराधना की और व्रत के प्रभाव से स्त्री का शरीर तो शुद्ध हो गया परंतु, यह स्त्री कभी ब्राह्मण एवं देवताओं के निमित्त अन्न दान नहीं करती थी. अत: मैंने सोचा कि, यह स्त्री बैकुण्ड में रहकर भी अतृप्त रहेगी अत: मैं स्वयं एक दिन भिक्षा लेने पहुंच गया. स्त्री से जब मैंने भिक्षा की याचना की तब उसने एक मिट्टी का पिण्ड उठाकर मेरे हाथों पर रख दिया और मैं वह पिण्ड लेकर अपने धाम लौट आया. कुछ ही दिनों बाद वह स्त्री भी देह त्याग कर मेरे लोक में आ गयी, और उसे यहां एक कुटिया व आम का पेड़ मिला. खाली कुटिया को देखकर वह स्त्री घबराकर मेरे समीप आई और बोली की मैं तो धर्मपरायण हूं फिर मुझे खाली कुटिया क्यों मिली है? तब मैंने उसे बताया कि, यह अन्नदान नहीं करने तथा मुझे मिट्टी का पिण्ड देने से हुआ है. उसके बाद मैंने फिर उस स्त्री को बताया कि, जब देव कन्याएं आपसे मिलने आएं तब आप अपना द्वार तभी खोलना, जब वे आपको षट्तिला एकादशी के व्रत का विधान बताएं. स्त्री ने भी ऐसा ही किया और जिन विधियों को देवकन्या ने कहा था, उसी विधि से ब्रह्मणी ने षट्तिला एकादशी का व्रत किया और व्रत के प्रभाव से उसकी कुटिया अन्न धन से भर गयी. इसलिए हे नारद इस बात को सत्य मानों कि जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत करता है और तिल एवं अन्न दान करता है उसे मुक्ति और वैभव की प्राप्ति होती है.

एकादशी का फल:-

एकादशी प्राणियों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है. यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है. इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है.

 

वालव्याससुमनजीमहाराज,

महात्मा भवन,श्रीरामजानकी मंदिर,

राम कोट, अयोध्या. .8544241710

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