स्वास्थवर्धक है तिल… - Gyan Sagar Times
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स्वास्थवर्धक है तिल…

भारतीय खान-पान में कई मसालों का प्रयोग किया जाता है. वहीँ, कई पौधों के बीज का भी प्रयोग किया जाता है, उन्ही बीजों में एक बीज “तिल” भी है. तिल एक प्रकार का पुष्पीय पौधा है, जिसका वैज्ञानिक नाम सेसमम इंडिकॉम(Sesamumindicum) है. तिल को तमिल में “नल्ला एन्नाई”, तेलगु में “नुव्वुला नूने “, कन्नड़ में “येल्लेन्ने” मराठी में इसे तीळ तेल और श्रीलंका में “थाला थेल”  के नाम से पुकारते हैं. इसके कई रिश्तेदार अफ्रिका में पाए जाते है, भारत में इसकी खेती हजारों वर्षों से होती आ रही है. तिल की खेती सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान की गई थी, और यह तेल उत्पादक फसल थी. 2500 ई. पू. के आसपास शायद यह मेसोपोटामिया को निर्यात किया गया था और अक्काडियन तथा सुमेरियनों में ‘एल्लू’ के रूप में जाना जाता था.

बताते चलें कि, तिल की खेती उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ही होती है. तिल के पौधे कई उंचाई करीब एक मीटर होती है, साथ ही इसके फूल सफेद रंग के होते है, केवल मुँह पर भीतर की ओर बैंगनी धब्बे भी  दिखाई देते है. इसके फूल गिलास के आकर के उप्पर कई ओर चार भागों में विभक्त होते हैं, साथ ही इसके बीज चिपटे और लम्बे होते हैं. भारत में तिल दो प्रकार के होते हैं सफेद और काला. कहा जाता है कि, जब किसी अन्य बीज का तेल नहीं निकाला गया था, तब सर्वप्रथम  तिल का ही तेल निकाला गया था. अथर्ववेद के अनुसार तिल और धान के द्वारा तर्पण करने का उल्लेख मिलता है. आयुर्वेद जानकारों के अनुसार, तिल भारी, स्निग्ध, गरम, कफ-पित्त-कारक, बलवर्धक, केशों को हितकारी, स्तनों में दूध उत्पन्न करनेवाला, मलरोधक और वातनाशक माना जाता है जबकि, तिल में चार रस पायें जाते हैं इनमें गर्म, कसैला, मीठा और चरपरा स्वाद भी पाया जाता है. अपनी इसी खूबी की वजह से ही यह लंग कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर होने की आशंका को कम करता है. इसके अलावा भी तिल के कई फायदे हैं

तिल का तेल विटामिन ‘ई’ का प्रमुख स्रोत माना जाता है,अधिकांश वनस्पति आधारित मसालों के साथ, तिल के तेल में मैग्नीशियम, तांबा, कैल्शियम, लोहा, जस्ता और विटामिन ‘बी6’ भी प्रमुख रूप से पाया जाता है. तिल में विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ छोड़कर वे सभी आवश्यक पौष्टिक पदार्थ होते हैं साथ ही विटामिन ‘बी’ और आवश्यक फैटी एसिड्स से भरपूर होता है. इसके अलावा इसमें मीथोनाइन और ट्रायप्टोफन नामक दो बहुत महत्त्वपूर्ण एमिनो एसिड्स भी पाए जाते हैं.ट्रायोप्टोफन को शांति प्रदान करने वाला तत्व भी कहा जाता है जो गहरी नींद लाने में सक्षम होता है और, मीथोनाइन लीवर को दुरुस्त रखता है साथ ही कॉलेस्ट्रोल को भी नियंत्रित रखता है. तिल हजम करने के लिहाज से भारी होता है जबकि, खाने में स्वादिष्ट और कफनाशक माना जाता है.यह बालों के लिए लाभप्रद माना जाता है.

तिल के फायदे:-

दाँतों की समस्या दूर करने के साथ ही यह श्वास संबंधी रोगों में भी लाभदायक होता है. स्तनपान कराने वाली माताओं में दूध की वृद्धि करता है साथ ही पेट की जलन को कम करता है. तिल याददाश्त शक्ति को भी बढाता है. बहुमूत्र या बार-बार पेशाब करने की समस्या को भी नियन्त्रण करता है. तिल का स्वभाव गर्म होता है, और इसे सर्दियों में प्रयोग किया जाता है. यह कब्ज भी नहीं होने देता है.तिल बीजों में उपस्थित पौष्टिक तत्व,जैसे-कैल्शियम और आयरन त्वचा को कांतिमय बनाए रखते हैं.तिल में न्यूनतम सैचुरेटेड फैट होते हैं इसलिए इससे बने खाद्य पदार्थ उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद करता है. जबकि, तिल में उपस्थित लेसिथिन नामक रसायन कोलेस्ट्रोल के बहाव को रक्त नलिकाओं में बनाए रखने में मददगार होता है. तिल के तेल में प्राकृतिक रूप में उपस्थित सिस्मोल एक ऐसा एंटी-ऑक्सीडेंट है, जो इसे ऊँचे तापमान पर भी बहुत जल्दी खराब नहीं होने देता है. “चरक संहित” के अनुसार इसे पकाने के लिए सबसे अच्छा तेल माना जाता है.

मकर संक्रांति के पर्व पर तिल का प्रयोग विशेष रूप से किया जाता है, इस दिन इसे दान देने की भी परम्परा प्रचलित है.मकर संक्रांति के दिन तिल के उबटन से स्नान करके ब्राह्मणों एवं गरीबों को तिल एवं तिल के लड्डू दान किये जाते हैं. प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, संक्रांति के दिन तिल का तेल लगाकर स्नान करना, तिल का उबटन लगाना, तिल की आहुति देना, पितरों को तिल युक्त जल का अर्पण करना, तिल का दान करना एवं तिल को स्वयं खाना, इन छह उपायों से मनुष्य साल भर स्वस्थ, प्रसन्न एवं पाप रहित होता है.तिल के तेल का प्रयोग अनेक प्रकार के सलादों में भी किया जाता है.तिल व गुड़ का पराठा, तिल गुड़ और बाजरे से मिलाए गए ठेकुए उत्तर भारत में विशेष रूप से प्रचलित हैं.

यज्ञादि हविष्य में तिल का प्रयोग किया जाता है, जिसे सभी देवता प्रसन्‍नता के साथ ग्रहण करते हैं. ‘मनुस्मृति’ में कहा गया है-

त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः।

त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम्।।

अर्थात, श्राद्ध कर्म में काले तिल तथा लक्ष्मी आराधना में सफेद तिल का प्रयोग करने से शीघ्र लाभ मिलता है. घृत (घी) में तिल मिलाकर “श्री” यज्ञ करने से माता लक्ष्मी की अति शीघ्र कृपा होती है.

नुक्सान :-

यदि उचित मात्रा में तिल का सेवन किया जाए तो इससे स्वास्थ्य के लिहाज से सुरक्षित माना जाता है. वहीँ, अधिक मात्रा में इसका सेवन करने से उल्टी, जी मिचलाना, दस्त, पेट संबंधी व अन्य समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं.

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