जीव विज्ञान से संबंधित(46)… - Gyan Sagar Times
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जीव विज्ञान से संबंधित(46)…

Life Processes

सभी जीव कोशिकाओं (Cell) से बनी होती है,और कोशिकाएँ (Cell) ही जीवन का आधार होती है. कई कोशिकाएँ (Cell) आपस में मिलकर उतक(Tissue) का निर्माण करती है. कई उतक (Tissue) मिलकर अंगों (Organs) का निर्माण करते हैं. प्रत्येक अंग जीवों के लिये विशेष कार्य करते हैं, जैसे:- दाँत का कार्य है भोजन को चबाना, आँख का कार्य देखना है…  कुल मिलाकर जीव का शरीर एक सुव्यवस्थित तथा सुगठित संरचना है जो निरंतर गति में रहकर कार्य करती हैं एवं जीव को जीवित रखती हैं. समय, वातावरण व पर्यावरण के प्रभाव के कारण यह संरचना विघटित होती रहती है, जिसके मरम्मत की आवश्यकता होती है. जीवों में कई प्रक्रम होते हैं जो शारीरिक संरचना की मरम्मत भी करते रहते हैं.

जैव प्रक्रम की परिभाषा (Definition of Life Processes):-

वे सभी प्रक्रिया जो सम्मिलित रूप से मरम्मत(Maintenance) का कार्य करते हैं उसे जैव प्रक्रिया(Life Processes) कहा जाता हैं. ये प्रक्रिया हैं… पोषण (Nutrition), श्वसन (Respiration), वहन (Trans portaion), उत्सर्जन (Excretion) इत्यादि.

पोषण(Nutrition):-

जीवों के भोजन ग्रहण करने तथा उसका उपयोग कर उर्जा प्राप्त करने की प्रक्रिया को ही पोषण कहा जाता है. जीवों को किसी भी कार्य करने के लिए उर्जा की आवश्यकता होती है. जब जीव चल या दौड़ रहा होता है, या कोई अन्य कार्य करता है, तो उसे उर्जा की आवश्यकता होती है, यहाँ तक की जब जीव कोई कार्य नहीं भी कर रहा होता है, तब भी शारीरिक क्रियाओं के क्रम को मरम्मत करने के लिए भी उर्जा की आवश्यकता होती है. यह आवश्यक उर्जा ही जीव पोषण से प्राप्त करता है.

सजीव अपना भोजन कैसे प्राप्त करते हैं?

किसी भी जीवों को उर्जा की आवश्यकता होती है, तो वे भोजन से प्राप्त करते हैं. परंतु सजीवों में उर्जा प्राप्त करने के तरीके अलग-अलग होते हैं. पेड़ – पौधे तथा कुछ जीवाणु अकार्बनिक श्रोतों से जैसे कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल के रूप में तरल पदार्थ प्राप्त करते हैं, जिनसे उन्हें उर्जा मिलती है, ऐसे जीव को स्वपोषी कहा जाता है, या यूं कहे कि खुद से बनाये हए भोजन से उर्जा प्राप्त करने वालों को स्वपोषी कहते हैं. अंग्रेजी में ऐसे जीवों को ऑटोट्रोप्स(Autotrophs) भी कहा जाता है, अंग्रेजी के इस शब्द में “ऑटो” का अर्थ है “खुद(स्वंय) तथा “ट्रॉप्स” का अर्थ होता है “पोषण”. वहीं, दूसरे जीव जंतु यथा मनुष्य, गाय, तथा अन्य जानवर, जिनकी संरचना अधिक जटिल होती हैं, उर्जा प्राप्ति के लिए जटिल पदार्थों का भोजन के रूप में उपयोग करते हैं. इसे प्राप्त करने के लिए जीव “जैव उत्प्रेरक (Bioactive catalyst)” का उपयोग करते हैं, जिन्हें एंजाइम कहते हैं. ऐसे जीव विषमपोषी जीव (Heterozygous organisms) कहलाते हैं. ये प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से स्वपोषी पर ही आश्रित होते हैं. अत: जीवों के द्वारा पोषण के लिए आवश्यक उर्जा की प्राप्ति के तरीकों में भिन्नता के आधार पर पोषण को दो भागों में बांटा जा सकता है.

(a) स्वपोषी पोषण,

(b) विषमपोषी पोषण,

स्वपोषी पोषण:-

खुद ही के द्वारा बनाये गये भोजन से पोषण प्राप्त करना ही स्वपोषी पोषण कहलाता है. हरे पेड़ पौधे तथा कुछ अन्य जीव, खुद भोजन बनाकर स्वपोषण करते हैं,अन्य जंतु भी इन स्वपोषी जीव पर भोजन तथा पोषण के लिए निर्भर होते हैं. स्वपोषी जीव पोषण के लिये आवश्यक उर्जा तथा कार्बन प्रकाश संश्लेषण के द्वारा पूरा करते हैं. स्वपोषी पोषण की प्रक्रिया में स्वपोषी बाहर से कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल लेते हैं, इस कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल को प्रकाश और क्लोरोफिल की उपस्थिति में “कार्बोहाइड्रेट”( उर्जा प्रदान करता है) के रूप में परिवर्तित कर संचित कर लेते हैं, यही प्रक्रिया को “प्रकाश संश्लेषण” कहा जाता है.

विषमपोषी पोषण :-

वैसे जीव जो कार्बनिक पदार्थ और ऊर्जा को अपना भोज्य पदार्थ के रूप में अन्य जीवित या मृत पौधे या जन्तु से ग्रहण करता है उसे विषमपोषी जीव कहते है. जैसे- अमरबेल, जीवाणु और कवक.  विषमपोषी जीव अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते हैं. विषमपोषी पोषण तीन प्रकार का होता है.

  1. मृतपोषित पोषण (Saprophytic Nutrition).
  2. परजीवी पोषण (Parasitic Nutrition).
  3. प्राणीसमभोज या पूर्णजांतविक पोषण (Holozoic Nutrition). 

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