जीव विज्ञान से संबंधित(45)… - Gyan Sagar Times
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जीव विज्ञान से संबंधित(45)…

“बल्ड ग्रुप” की खोज सबसे पहले किसने की थी?

अगर मनुष्य के शरीर में खून की कमी होने पर कमजोरी लगने लगती है,शरीर पीला हो जाता है,और कई मामलों में खून की कमी होने से मौत भी हो सकती है. आमतौर पर हमसभी लोगों का बल्ड ग्रुप क्या है इसका पता होता है. अगर कभी किसी इंसान को ब्लड की जरूरत होती है तो उसके ग्रुप का ब्लड मिलान करने के बाद  ही उस ब्लड को चढ़ाया जाता है. ब्लड में 4 ग्रुप होते हैं A, B, AB, O इनमें से दो इंटीजन होते हैं और दो एंटीबॉडी. इंसान के ब्लड में अंतर एंटीजन और एंटीबॉडी की वजह से ही होता है. ब्लड ग्रुप इंसान को अपने माता-पिता से आनुवांशिक तरह से मिलता है.

अमेरिका में एक रोग विज्ञानी थे, जिनका नाम था “कार्ल लैंडस्टीनर”. पढ़ाई के दौरान उन्होंने देखा कि कई व्यक्ति सिर्फ इसलिए मर रहे हैं, क्योंकि उन्हें ब्लड की जरूरत है जो उन्हें नहीं मिल पाती थी. उन्होंने जब एक व्यक्ति के खून को दूसरे व्यक्ति के शरीर में चढ़ाया तो “ब्लड” के थक्के जमने लगे. कई व्यक्तियों को पीलिया जैसी बीमारी या और गंभीर बीमारियों में कई लोगों की मौत भी हुई, उसके बाद ही उन्होंने “ब्लड” पर रिसर्च करने का काम शुरु किया.

कार्ल लैंडस्टीनर ने बल्ड ग्रुप और उसके प्रकार के बारे में बताया कि, खून देने वाले व्यक्ति का ब्लड पाने वाले व्यक्ति के लिए मैच नहीं कर रहा है, इसका पता हेमागल्युटिनेशन के कारण होने वाली क्रॉस मैचिंग से चला. जो की खून देने वाले के खून की कोशिकाओं और खून पाने वाले के सेरम या प्लाजमा के मिलान करने पर किया गया. वर्ष 1901 में लैंडस्टीनर ने यह पता लगाया की, ऐसा रक्त जो रक्त सीरम के सम्पर्क में आने के कारण ही होता है. इसके बाद हर व्यक्ति का ब्लड अलग-अलग होता गया और इसी वजह से खून देने वाले व्यक्ति और खून पाने वाले व्यक्ति की कोशिकाओं में अंतर आने लगा.

रिसर्च को आगे बढ़ाते हुए, लैंडस्टीनर ने सैंकड़ों लोगों के ब्लड का सैंपल लिए और एक साल के अध्ययन के बाद वो इस परिणाम पर पहुंचे कि, ब्लड के तीन ग्रुप का होते हैं. जिनका उन्होंने नाम दिया ए, बी और सी. इसके बाद “सी” बल्ड ग्रुप को “ओ” का नाम दिया गया. लैंडस्टीनर की इस खोज को उनके दो साथियों ने आगे बढ़ाया और चौथे ब्लड ग्रुप का भी पता लगा लिया, जिसे ‘एबी’ ग्रुप का नाम दिया गया. न्यूयॉर्क के सेनाई हॉस्पिटल में लैंडश्टीनर ने अविष्कार के चार सालों बाद सबसे पहला आधुनिक ब्लड ट्रांसफ्यूजन किया गया था. इसके बाद ही बल्ड ग्रुप के सिद्धांत को पूरी दुनिया ने माना और अपनाया, जो आज तक लगातार चलता चला आ रहा है.

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