मोहनी एकादशी… - Gyan Sagar Times
Dhram Sansar

मोहनी एकादशी…

सत्संग सत्र की समाप्ति के बाद कुछ भक्तों ने महाराजजी से पूछा कि, महाराजजी सूना है कि बैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी का जो व्रत करता है उस व्रत के प्रभाव से मानव जीवन के माया व मोह समाप्त हो जाते हैं?               

वालव्याससुमनजीमहाराज कहते है कि स्कंद पुराण में पावन पवित्र नदी शिप्रा का वर्णन है. शिप्रा नदी भी पवित्र नदियों में से एक है और इसका उद्गम जानापाव की पहाड़ियों में माना गया है. जानापाव की पहाड़ियाँ मध्यप्रदेश के महू छावनी से लगभग 17 किलोमीटर दूर स्थित है. महाराजजी कहते है कि, इस स्थान पर भगवान नारायण के अवतार भगवान परशुराम का जन्म स्थान भी माना जाता है. इस पवित्र नदी के तट पर द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंगों महाकालेश्वर भी यहीं है. शिप्रा नदी के तट पर ही कुम्भ (उज्जैन) का आयोजन भी किया जाता है. वालव्याससुमनजीमहाराज कहते है कि इस नदी में सिंहस्थ स्नान होने के कारण इसका महत्व और भी बढ़ जाता है.

वालव्याससुमनजीमहाराज कहते है कि, मान्यता यह है कि, बैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी के ही भगवान विष्णु ने ही मोहनी रूप को धारण किया था. पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान कई प्रकार की समाग्री निकली थी उनमे से एक अमृत भी था. इस अमृत को पाने के लिए देवताओं और असुरों में लड़ाई होने लगी. दोनों ही पक्ष अमृत के दावेदार हो गये. अंतत: भगवान केशव ने मोहनी रूप का धारण किया और असुरों को अपने मोहपाश में बांध लिया और देवताओं को अमृत का पान करवाकर देवता अमरत्व की प्राप्ति कर ली. महाराजजी कहते है कि, यह सारा घटनाक्रम बैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी को हुई थी इस कारण बैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी को मोहनी एकादशी भी कहा जाता है.

पूजन सामाग्री :-

वेदी, कलश, सप्तधान, पंच पल्लव, रोली, गोपी चन्दन, गंगा जल, दूध, दही, गाय के घी का दीपक, सुपाड़ी, शहद, पंचामृत, मोगरे की अगरबत्ती, ऋतू फल, फुल, आंवला, अनार, लौंग, नारियल, नीबूं, नवैध, केला और तुलसी पत्र व मंजरी.

व्रत विधि:-

सबसे पहले आपको एकादशी के दिन सुबह उठ कर स्नान करना चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए. उसके बाद भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र की स्थापना की जाती है. उसके बाद भगवान विष्णु की पूजा के लिए धूप, दीप, नारियल और पुष्प का प्रयोग करना चाहिए. अंत में भगवान विष्णु के स्वरूप का स्मरण करते हुए ध्यान लगायें, उसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करके, कथा पढ़ते हुए  विधिपूर्वक पूजन करें. ध्यान दें…. एकादशी की रात्री को जागरण अवश्य ही करना चाहिए, दुसरे दिन द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मणो को अन्न दान व दक्षिणा देकर इस व्रत को संपन्न करना चाहिए.

कथा:-

सरस्वती नदी के तट पर भद्रावती नाम का एक सुंदर नगर था और उस नगर का राजा धृतिमान था जो चन्द्रवंश में पैदा हुए थे जो सत्यप्रतिज्ञ थे. उसी राज्य में एक वैश्य रहता था जिसका नाम धनपाल था और उसके पांच पुत्र थे. धनपाल धनधान्य से परिपूर्ण और समृद्धिशाली भी था. वह हमेशा सत्कर्म में ही लगा रहता था और भगवान् केशव का अनयन भक्त भी था. धनपाल हमेशा दूसरों के लिए पौसला (प्याऊ), कुआँ, मठ, बगीचा, पोखरा और घर बनवाया करता था. धनपाल के पांच पुत्रों के नाम इस प्रकार है   सुमना, द्युतिमान, मेधावी, सुकृत तथा धृष्ट्बुद्धि. सबसे छोटा बेटा धृष्ट्बुद्धि अपने नाम के अनुकूल ही वो सारे कर्म भी करता था. वह हमेशा ही बड़े-बड़े पापों में संलग्न रहता साथ ही जुये आदि दुर्व्यसनों में उसकी बड़ी आसक्ति थी. धृष्ट्बुद्धि हमेशा ही वेश्याओं से मिलने के लिये लालायित रहता और अन्याय के मार्ग पर चलकर पिता का धन बरबाद किया करता था.

एक दिन उसके पिता ने तंग आकर उसे घर से निकाल दिया और वह दर दर भटकने लगा. भूख-प्यास से व्याकुल वह भटकते- भटकते महर्षि कौँन्डिन्य के आश्रम जा पहुँचा और हाथ जोड़ कर बोला : ‘ब्रह्मन ! द्विजश्रेष्ट ! मुझ पर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइये, जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो. कौँन्डिन्य ऋषि ने कहा कि वैशाख के शुक्ल पक्ष में ‘मोहिनी’ नाम से प्रसिद्द एकादशी का व्रत करो. मोहनी व्रत को करने से प्राणियों के अनेक जन्मों के किए हुए मेरु पर्वत जैसे महापाप भी नष्ट (समाप्त) हो जाते हैं. मुनि का यह वचन सुनकर धृष्ट्बुद्धि का मन प्रसन्न हो गया और मुनि के बताये उपायों के अनुसार मोहनी एकादशी का व्रत किया और व्रत के प्रभाव से धृष्ट्बुद्धि निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर आरूढ़ हो सब प्रकार के उपद्रवों से रहित श्रीविष्णुधाम को चला गया. इसके पढने और सुनने से सहस्त्र गोदान का फल मिलता है.

एकादशी का फल:-

एकादशी प्राणियों के परम लक्ष्य, भगवद भक्ति, को प्राप्त करने में सहायक होती है. यह दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से सेवा करने के लिए अति शुभकारी एवं फलदायक माना गया है. इस दिन व्यक्ति इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध मन से भगवान की भक्तिमयी सेवा करता है तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपापात्र बनता है.

 

 वालव्याससुमनजीमहाराज,

महात्मा भवन,श्रीरामजानकी मंदिर,

राम कोट, अयोध्या. 8709142129.

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