विचार-01 - Gyan Sagar Times
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विचार-01

वर्तमान समय की परिस्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि सता की लोलुप आकाओं और उनसे जुड़े महामंडित विद्ववानों के कारण अब “ धरा को जन्म देने वालों को कितना कष्ट हो रहा होगा ” कि … इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल ही नहीं नामुनकिन भी होगा. जहाँ तक रही शासन सत्ता के इतिहास की… इतिहास गवाह है सत्ता का गरूर उस परमात्मा को भी ना रहा जिसने सृष्टि बनाई . कहने को तो हम सभी डिजिटल युग के प्राणी होते जा रहें हैं. लेकिन आज मानव की मानवता व अपनापन लुप्त हो गई उसकी जगह पर स्वार्थ, लालच व क्रूरता ने जगह ले ली है. घर के बड़े-बूढों के जिन्दगी के कटु अनुभव को पढने व सुनने के बाद एक स्वप्न सा महसूस होता है.

सत्ता तो आखिर सत्ता है चाहे वो राजा का हो या वर्तमान समय की पद्दति के अनुसार… दोनों की एक ही मंजिल है…  “ निरही जनता की गाढ़ी कमाई पर ऐश “. आज हम एक ऐसे देश के बारे में बात कर रहें जिसका लिखित इतिहास है और वहां रहने वाले लोग सनातनी है. करीब पांच हजार साल पुराना इतिहास है. पूरी दुनिया के लोग सनातन परम्परा का निर्वाह कर रहें हैं लेकिन वही सनातनी अपनी ही परपरा को छोड़ रहें हैं. सत्ता और सत्ता से जुड़े लोलुप आकाओं और उनसे जुड़े महामंडित विद्ववानों के कारण वर्तमान समय तक सनातनी जजिया कर देने को विवश है. आज भी गुलामी की वो दौड़ जारी है पर कागजी घोड़ों पर आजादी के 75 वर्ष होने जा रहें हैं. लेकिन सत्ता आसीन लोलुप आकाओं और उनसे जुड़े महामंडित विद्ववानों की गुलामी सोच से हैरान व परेशान है.

जिस तथाकथित के कारण सत्ता का निर्माण होता है वो पांच वर्ष के लिए गुलाम हो जाते हैं, सत्ता आसीन लोलुप आकाओं और उनसे जुड़े महामंडित विद्ववानों ने सता सुख के लिए जमीन के टुकड़े-टुकड़े कर, कब्र में पाँव लटकी है लेकिन वो…अभी भी युवा ही हैं. साथ जाति-धर्म के किस्से पुराने हो गये नए तो सामजिक कुरीतियों के नाम पर सत्ता सुख हासिल कर रहें है. निरही प्राणी को कोई फायदा नहीं लेकिन अय्याशी के लिए तमाम तरह की बंदिशे लगा कर खुद सत्ता सुख का आनन्द ले रहें हैं. खैर छोडिये इन बातों को आजकल देश में चौकीदार व उनसे जुड़े सहयोगी देश व राज्य में सत्ता सुख का आनन्द ले रहें हैं. आइये देखतें है सत्ता सुख के अनछूये पहलुओं को…

एक चौकीदार ऐसा जिसने आज तक कोई जिम्मेदारी का वहन लिया हो फिर भी वो चौकीदार. खुद पर लगे दाग हमेशा दूसरों पर मढ देता हो, जरुरत पड़ने पर खुद को महात्मा कहना, वो नाम के मर्द और काम….महिलाओं के. सत्ता में आने पहले रुपया पतला हो रहा था वर्तमान समय में इतना मोटा हो गया कि किसी के पास टिकता ही नहीं, सत्ता में आने पहले महंगाई ‘डायन’ थी आज सौतन हो गई. सत्ता में आने पहले बेरोजगारी शबाव पर थी वर्तमान में बेरोजगारों के पास रोजगार के लिए समय नहीं… बताते चलें कि, धराती को खोदने से क्या नहीं मिलता कोयला व हीरा तो आम हो गई अब तो चोकीदार की नाक के नीचे रूपये की खान ही मिल गई.

चौकीदार के सहयोगी विकास पुरुष हैं. विकास ही उनका मुख्य कर्म है.उनका  एक पाँव कब्र में लटका है लेकिन सत्ता सुख के पैतरों के महारथी भी. सत्ता सुख के लिए राज्य को कंगाली की चादर ओढाकर ऐयाशी के नए कीर्तिमान बना रहे हैं. विकास पुरुष के राज्य में विकास का हाल यह है कि हलकी हवा के झोकें से पुल धराशाई हो जाता है तो कहीं पूरा का पूरा पुल ही चोरी हो जाता है लेकिन,विकास पुरुष अपने कर्म पर डटे हैं. चोरी से याद आया कि चौकीदार व उनसे जुड़े सहयोगीयों से क्या उम्मीद करें 15 वर्षों से शासन कर रहें हैं लेकिन “ ईमानदार मुक्त सरकार का सपना अधूरा ही रह गया “ अपनी खीज निकालने के लिए अपना दोष लालू और नेहरु पर मढ कर इतिश्री कर सप्त्मों अध्याय समाप्त हो गया. विकास पुरुष के राज्य में पिछले 15 वर्षों से सड़क और पुल का निर्माण हो रहा है जो आजतक बदसूरत जारी है.

कभी सनातनी परपरा  से जुड़ा एक और नगरी हुआ करता था लेकिन सत्तालोलुपों के कारण वह भी देश बन गया आलम यह है कि वहां इतिहास की पुनरावृत्ति हुई. इतिहास के अनुसार एक जीवात्मा ने उसे कभी जलाया था आज उस देश के लोग खुद के घर जला रहें हैं. आने वाले कुछ समयाप्रांत पुन: इस घटना को दुहराया जाएगा और वो देश सनातन परम्परा का जन्मदाता होगा.

वर्तमान समय में सत्तासीन व उनसे जुड़े सहयोगियों की पश्चमी सोच व कल्चर का ऐसा नशा छाया कि सनातन संस्कृति और इतिहास को दफ़न कर रहें है. कभी इस धरा पर शिक्षा की ऐसी व्यवस्था की पडोसी देशों सहित विदेश के छात्र यंहा पढ़ते थे लेकिन, वर्तमान समय में सत्तासीन से जुड़े सहयोगियों की कांभेंट सोच के कारण शिक्षा व व्यवस्था का जनाजा निकल गया.

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