गुप्त नवरात्रा… - Gyan Sagar Times
Dhram Sansar

गुप्त नवरात्रा…

हिन्दू पंचांग अनुसार साल का ग्यारहवां (11) महीना चल रहा है. यह महीना बड़ा ही पवन और पवित्र महीना है. इस महीने में मघा नक्षत्रयुक्त पूर्णिमा होने के कारण ही इसका नाम माघ मास (महीना) कहा जाता है. आमतौर पर लोग इसे भगवान श्रीकृष्ण का महीना भी कहते हैं. पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, इस महीने में मानव अगर शीतल जल में डुबकी लगा ले तो वो पापमुक्त होकर स्वर्गलोक चला जाता है.

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वित: |
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यती न संशय: ||

आमतौर पर माता की विशेष पूजा जिसे हम सभी नवरात्रा के नाम से जानते है जिसमें चैत व आश्विन महीने में मनाया जाता है लेकिन, माँ भगवतीं की दो और गुप्त नवरात्र की पूजा माघ और अषाढ़ मास में भी की जाती है. गुप्त नवरात्रा में माँ भगवतीं के दस महाविद्याओं की अराधना की जाती है. ये दस महाविद्याएं हैं मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां धूमावती, बगलामुखी, मातंगी और कमला देवी.

पौराणिक ग्रन्थों में गुप्त नवरात्रा के बारे में विस्तार से बताया गया है. विशेष तौर पर गुप्त नवरात्रा में तांत्रिक पूजा की जाती है आमतौर पर कम ही लोग इस पूजा को करते हैं. धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्रृंगी ऋषि ने गुप्त नवरात्रा के महत्व को बताया था. जिस प्रकार वसंत ऋतू में होनेवाली नवरात्र में भगवान विष्णु की पूजा होती है उसी प्रकार शारदीय नवरात्रा में देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है ठीक, उसी प्रकार गुप्त नवरात्रा में दस महाविद्याओं की अराधना की जाती है. कहा जाता है कि, यदि कोई मानव इन महाविद्याओं के रूप में शक्ति की उपासना करता है उसका जीवन में हर प्रकार के ऐश्वर्य से भर जाता है. उसके जीवन की हर कामना पूर्ण हो जाती है.

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, नवरात्रा से भी ज्यादा गुप्त नवरात्र का महत्व होता है चुकिं, गुप्त नवरात्रा से बढ़कर कोई साधना काल नहीं होता है. गुप्त नवरात्र में अनेक प्रकार के अनुष्ठान व व्रत-उपवास के विधान शास्त्रों में मिलते हैं. “दुर्गावरिवस्या” नामक ग्रंथ के अनुसार साल में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्रों में भी माघ में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र मानव को न केवल आध्यात्मिक बल ही प्रदान करते हैं, बल्कि इन दिनों में संयम-नियम व श्रद्धा के साथ माता भगवती की उपासना करने वाले व्यक्ति को अनेक सुख व साम्राज्य भी प्राप्त होते हैं. “शिवसंहिता” के अनुसार ये नवरात्र भगवान शंकर और आदिशक्ति माँ पार्वती की उपासना के लिए भी श्रेष्ठ माना जाता है. कहा जाता है कि, इन अनुष्ठानों के प्रभाव से मानव को सहज ही सुख व अक्षय ऎश्वर्य की प्राप्ति होती है.

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में ही आदिशक्ति का अवतरण था. कभी सागर की पुत्री सिंधुजा-लक्ष्मी तो कभी पर्वतराज हिमालय की कन्या अपर्णा-पार्वती. जीवन शक्ति संसार में जहाँ कहीं भी दिखाई देती है, वहाँ देवी का ही दर्शन होता है. ऋषि-मुनियों की दृष्टि हमेशा विश्वरूपा देवी को ही देखती है, इसलिए माँ दुर्गा ही महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है. दुर्गा सप्तशती के अनुसार, “देवी ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप धारण कर संसार का पालन और संहार करती हैं”. “ मारकंडेय पुराण ” के अनुसार, “हे देवि! तुम सारे वेद-शास्त्रों की सार हो. भगवान विष्णु के हृदय में निवास करने वाली माँ लक्ष्मी और भगवान शंकर की महिमा बढाने वाली माँ तुम ही हो”.

माघी नवरात्रा की सबसे बड़ी पूजा पंचमी तिथि को मनाई जाती है. इसे आमतौर पर ‘श्रीपंचमी’, ‘वसंत पंचमी’ या ‘सरस्वती महोत्सव’ के नाम से जाना जाता है. पौराणिक काल से ही इस दिन माता सरस्वती की पूजा-अर्चना बड़ी धूमधाम से किया जाता है.

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