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महान वैज्ञानिक गाटफ्रीड लैबनिट्ज…

दुनिया के महान गणितज्ञ व दार्शनिक गाटफ्रीड लैबनिट्ज का जन्म 01 जुलाई 1646 को जर्मनी के लिपजिंग नामक स्थान पर हुआ था. उनके पिता का नाम मोरल था और वे फिलोसफी के प्रोफ़ेसर थे. गाटफ्रीड विल्हेम लैबनिज गणित और दर्शन शास्त्र के बड़े विद्धवान थे. उन्होंने यांत्रिक गणना के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर काम किया.  करीब 300 सालों बाद यही कैल्कुलेटिंग मशीन इलेक्ट्रानिक कैलकुलेटर के रूप में विकसित किया गया. पहली बार इलेक्ट्रानिक कैलकुलेटर 1970 के मध्य में लोगों के सामने आया.

ज्ञात है कि यह मशीन कई प्रकार की गणितीय गणनाएं करने में सक्षम था. लैबनिज ने इस मशीन को पेरिस में एकेडमी देस साईंसेज के सामने पेश किया जहाँ उनके इस अविष्कार की बड़ी सराहना हुई. इसके बाद लैबनिज ने इस मशीन को रॉयल सोसाइटी लंदन लेकर गये वहां उनके काम से प्रभावित होकर 1673 में उन्हें रॉयल सोसाइटी का सदस्य भी मनोनीत किया गया. बताते चलें कि लैबनिज की उम्र छह साल की हुई तो उनके पिता ने लिपजिग स्थित निकोलाई स्कूल में पढने के लिए भेजा, लेकिन दुर्भाग्यवश उसी साल उनके पिता की मृत्यु हो गई. इससे उनकी पढाई में दिक्कत होने लगी कभी वो स्कूल जाते और कभी नहीं भी जा पाते. लैबनिज बहुत ही कुशाग्र बुद्धि के थे और उन्होंने आठ साल की उम्र में लैटिन भाषा सीख ली व 12 साल की उम्र में वो ग्रीक भाषा के भी जानकार हो गये.

लैबनिज प्राय: स्वअध्याय द्वारा विद्या-अर्जन करने लगे. वो अपने पिता से इतिहास संबंधी काफी जानकारी प्राप्त की थी और उनकी अभिरुचि इतिहास के अध्ययन में काफी बढ़ गई थी. उन्हें विभिन्न भाषाएँ सीखने में काफी रूचि थी. लैटिन भाषा सीखने के बाद उन्होंने कविताएँ भी लिखनी शुरू कर दी थी. आगे चलकर उन्होंने कानून, दर्शन शास्त्र और गणित का भी अध्ययन किया. गणित के विषय में उनके योगदान को सर्वत्र सराहना मिली. उन्होंने कैलकुलस के विकास में अहम् योगदान दिया. लैबनिज ने डिफरेंशियशन और इंटिग्रेशन के क्षेत्र में जो काम किया उसका आजतक इस्तेमाल हो रहा है.

बताते चलें कि लैबनिज को सिर्फ विज्ञान ही नहीं दर्शन और अध्यात्म का भी गहन अध्ययन किया. दर्शन के क्षेत्र  का अध्ययन करने के बाद उन्होंने कहा कि हमारा ब्रह्मांड ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है. उन्होंने अपने समकालीन सैम्युएल क्लार्क को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने ईश्वर, आत्मा, काल एवं स्थान के बारे में प्रतिपादित सिद्धांतों की विस्तृत चर्चा की. लैबनिज के अधिकतर शोध पत्र उनके निधन के बाद प्रकाशित की गई. उनके जीवन काल में एक ही कृति प्रकाशित हो पाई थी जिसका नाम “एस्सेज डि थियोडिसी सुरला बोंटे डि डिउला डि एल हिम्मे” था. लैबनिज की मृत्यु 14 नवम्बर 1746 को हैनोवर में हुई थी. जीवन के आखरी दिनों में उन्हें कष्ट गुजारने पड़े थे. मृत्यु शैय्या पर उनकी सेवा करने वाला कोई नहीं था. ज्ञात है कि, 1692 से 1716 तक उन्हें कई बीमारियों ने जकड़ रखा था तब उनकी स्थिति बहुत ही खराब और दयनीय हो गई थी.

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