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फर्श से अर्श तक…

  1. वो अभागी महिला, जो एक बड़ी आयु तक, घर के बाहर शौच जाने के लिए विवश और अभिशप्त थी.. अब वो भारत की ‘राष्ट्रपति’ बनने जा रही है!
  2. वो महेनती पुत्री, जो केवल इसलिए पढ़ना चाहती थी, कि परिवार के लिए रोटी कमा सके.. !
  3. वो शिक्षिका महिला, जो बिना वेतन के शिक्षिका के तौर पर अपने गाँव के बालकों को पढाने का काम करती रही थी.. !
  4. वो निःस्वार्थ महिला, जिसे जब ये लगा कि पढ़ने-लिखने के बाद आदिवासी और वनवासी महिलाएं उससे थोड़ा दूर हो गई हैं, तो वो स्वयं सबके घर जा कर ‘खाने को दे’ कह के बैठने लगीं.. !
  5. वो कमनसीब महिला, जिसने अपने पति और दो पुत्रों की मृत्यु के दर्द को बड़ी हिम्मत से झेला, और आखिरी पुत्र की मृत्यु के पश्चात तो ऐसे डिप्रेशन में चली गईं, कि लोग कहने लगे, कि अब ये नहीं बच पाएंगी, वो अब भारत की ‘राष्ट्रपति’ बनने जा रही हैं!
  6. जिस गाँव में कहा जाता था, राजनीति बहुत खराब चीज है, और महिलाएं को तो इससे बहुत दूर रहना चाहिए, उसी गाँव की हिम्मतवान् महिला …!
  7. वो आदरणीय महिला, जिन्होंने अपना पहला काउंसिल के चुनाव में विजयी होने के बाद, विजय का इतना प्रामाणिक कारण बताया, कि ‘वो क्लास में अपना विषय ऐसा पढ़ाती थीं, कि विद्यार्थियों को उस विषय में किसी दूसरे से ट्यूशन लेने की आवश्यकता ही नहीं पडती थी, और उनके 70% तक अंक आते थे, इसीलिए क्षेत्र के सारे नागरिक और सभी अभिवावक उन्हें बहुत आदर करते थे’.. !
  8. वो साधारण महिला, जो अपनी बातों में मासूमियत को जीवित रखते हुए, अपनी सबसे बड़ी सफलता इस बात को मानती है, कि ‘राजनीति में आने के बाद मुझे वो महिलाएं भी पहचानने लगी, जो पहले नहीं पहचानती थी’..!
  9. वो समझदार महिला, जो 2009 में चुनावों में पराजित होने के बाद, अपनी असफलता की जड़ को तलाशने फिर से गाँव में जा कर रहने लगी, और जब वापस लौटी, तो अपनी आँखों को दान करने की घोषणा की.. वो अब भारत की ‘राष्ट्रपति’ बनने जा रही हैं!
  10. वो कर्मयोगी महिला, जो ये मानती हैं कि ‘Life is not bed of रोसेस, और जीवन कठिनाइयों के बीच ही रहेगा, हमें ही आगे बढ़ना होगा; कोई push करके कभी हमें आगे नहीं बढ़ा पायेगा’..!

दशकों-दशक से ठीक कपड़ों और खाने तक से दूर रहने वाले समुदाय को देश के सबसे बड़े ‘भवन’ तक पहुँचा कर भारत ने विश्व को फिर से दिखा दिया है, कि यहाँ रंग, जाति, भाषा, वेष, धर्म, संप्रदाय का कोई भेद नहीं चलता!  जिनके प्रयासों से उनके गाँव से जुड़े अधिकतर गाँवों में आज लड़कियों के स्कूल जाने का प्रतिशत लड़कों से अधिक हो गया है.

 

सतेन्द्र सिंह(धनबाद).

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