धन्वंतरि जयंती - Gyan Sagar Times
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धन्वंतरि जयंती

सर्ववेदेषु निष्णातो मन्त्रतन्त्र विशारद:।

शिष्यो हि वैनतेयस्य शंकरोस्योपशिष्यक:।।

पौराणिक ग्रंथो के अनुसार, कार्तिक के पावन और पवित्र महीने को पुण्य मास भी कहा जाता है. इस मास का अपना अलग ही महत्व है. इस मास का वर्णन कई पौराणिक ग्रन्थों में हुआ है. पौराणिक ग्रन्थों में देवताओं और दानवों के युद्ध व कटुता का वर्णन है. युद्ध व कटुता को दूर करने के लिए समुद्र मंथन हुआ था. समुद्र मंथन के दौरान कई प्रकार की वस्तुएं निकली थी. पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष द्वादशी को कामधेनु गाय, कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को धन्वंतरी, कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को माँ काली और कार्तिक अमावस्या को माँ लक्ष्मी का सागर से प्रादुर्भाव हुआ था.

पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को धन्वंतरी का प्रादुर्भाव सागर से हुआ था और इसी दिन से इन्होने आयुर्वेद का प्रादुर्भाव किया था. आयुर्वेदाचार्य धन्वन्तरी को भगवान विष्णु का दूसरा रूप भी कहते हैं. इनकी चार भुजाएं हैं और इन चार भुजाओं में उपर की दोंनों भुजाओं में  शंख और चक्र धारण किये हुये हैं जबकि, दो अन्य भुजाओं मे से एक में जलूका और औषध तथा दूसरे मे अमृत कलश लिए हुए हैं और इनका प्रिय धातु पीतल माना जाता है. इन्होंने ही अमृतमय औषधियों की खोज की थी. बताते चलें कि, इनके वंश में दिवोदास हुए जिन्होंने “ शल्य चिकित्सा ” का पहला विद्यालय काशी में स्थापित किया जिसके प्रधानाचार्य आचार्य सुश्रत बनाये गये थे.

सुश्रुत ॠषि विश्वामित्र के पुत्र और दिवोदास के शिष्य थे. ॠषि विश्वामित्र पुत्र सुश्रुत ने ही सुश्रुत संहिता लिखा था और विश्व के पहले शल्य चिकित्सक या यूँ कहें कि सर्जन थे. पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, जब सागर से धन्वंतरी का प्रादुर्भाव हुआ तब धन्वंतरी ने भगवान विष्णु से कहा कि, लोक में मेरा स्थान और भाग निश्चित कर दें. इस पर विष्णु ने कहा कि यज्ञ का विभाग तो देवताओं में पहले ही हो चुका है अत: यह अब संभव नहीं है. देवों के बाद आने के कारण तुम (देव) ईश्वर नहीं हो. अत: तुम्हें अगले जन्म में सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और तुम लोक में प्रसिद्ध होगे और तुम्हें उसी शरीर से देवत्व प्राप्त होगा और द्विजातिगण तुम्हारी सभी तरह से पूजा करेंगे. तुम आयुर्वेद का अष्टांग विभाजन भी करोगे.

द्वापर युग में तुम पुन: जन्म लोगे इसमें कोई सन्देह नहीं है. इस वर के अनुसार पुत्र काम काशिराज धन्व की तपस्या से प्रसन्न हो कर अब्ज भगवान ने उसके पुत्र के रूप में जन्म लिया और धन्वंतरि नाम धारण किया. बताते चलें कि, धन्व ही काशी नगरी के संस्थापक काश के पुत्र थे. वे सभी रोगों के निवराण करने में निपुण थे और उन्होंने भारद्वाज से आयुर्वेद ग्रहण कर उसे अष्टांग में विभक्त कर अपने शिष्यों में बाँट दिया. हरिवंश पुराण के अनुसार…

काश-दीर्घतपा-धन्व-धन्वंतरि-केतुमान्-भीमरथ (भीमसेन)-दिवोदास-प्रतर्दन-वत्स-अलर्क।

बताते चलें कि, वैदिक काल में जो महत्व और स्थान अश्विनी को प्राप्त था वही पौराणिक काल में धन्वंतरि को प्राप्त हुआ. अश्विनी कुमार के हाथों मधुकलश था वहाँ धन्वंतरि को अमृत कलश मिला चूँकि, भगवान विष्णु ही संसार की रक्षा करते हैं अत: रोगों से रक्षा करने वाले धन्वंतरि को विष्णु का अंश माना गया है. पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, कश्यप और तक्षक का जो संवाद महाभागवत  पुराण में आया है वैसा ही धन्वंतरि और नागदेवी मनसा का ब्रह्मवैवर्त पुराण में आया है. उन्हें गरुड़ का भी शिष्य कहा गया है.

धनतेरस के दिन दीप जलाककर भगवान धन्वन्तरि की पूजा करें. भगवान धन्वन्तरी से स्वास्थ और सेहतमंद बनाये रखने हेतु प्रार्थना करते हुए कहें… “परम भगवान, जिन्हें हम सभी सुदर्शन वासुदेव धन्वंतरी के नाम से जानते हैं, जो हाथों में अमृत कलश लिये हैं, वो प्रभु सभी का नाश करने वाले हैं, जो तीनों लोकों के स्वामी हैं और उनका निर्वाह करने वाले हैं, उन विष्णु स्वरूप धन्वंतरी को बारम्बार बरम्बार नमस्कार है”

कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को आयुर्वेद के जानकार या डॉक्टर भगवान धन्वंतरि की पूजा-अर्चना करते हैं. इसी दिन धनतेरस का पर्व भी मनाया जाता है. स्कन्द पुराण के अनुसार, कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन को मनाए जाने वाले इस महापर्व का वर्णन लिखा गया है. लोकमान्यता के अनुसार, भगवान धन्वन्तरि चूंकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए ही इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है, कहीं-कहीं तो इस दिन स्वर्ण, चांदी या अन्य वस्तु खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है. अक्सर, इस अवसर पर लोग झाड़ू या धनिया के बीज खरीदते हैं और दीपावली उपरान्त इन बीजों को अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं.

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Srwwedeshu Nishnato Mantra Tantra Wishard:।

Shishyo Hi Wainteysy  Shankrosyoshishyak:।।

According to mythological texts, the holy and holy month of Kartik is also called Punya Maas. This month has its own importance. This month has been described in many mythological texts. In the mythological texts, there is a description of the war and bitterness of the gods and the demons. The ocean was churned to remove war and bitterness. Many types of objects came out during the churning of the ocean. According to mythological texts, Kamdhenu cow on Kartik Krishna Paksha Dwadashi, Dhanvantari on Kartik Krishna Paksha Trayodashi, Goddess Kali on Kartik Krishna Paksha Chaturdashi, and Goddess Lakshmi on Kartik Amavasya emerged from the ocean.

According to mythological texts, Dhanvantari originated from the ocean on Kartik Krishna Paksha Trayodashi, and from this day onwards, he started Ayurveda. Ayurvedacharya also calls Dhanvantari another form of Lord Vishnu. He has four arms and in these four arms, both the upper arms hold conch shells and chakras, whereas, in one of the other two arms, Jaluka, and medicines, and in the other nectar urns are held and their favorite metal is considered to be brass. He was the one who discovered the nectar of medicines. Let us tell that, there were Divodas in his lineage, who established the first school of “surgery” in Kashi, whose principal Acharya Sushrat was made.

Sushruta was the son of sage Vishwamitra and a disciple of Divodas. Sushruta, son of sage Vishwamitra, wrote the Sushruta Samhita and was the world’s first surgeon or rather a surgeon. According to mythological texts, when Dhanvantari emerged from the ocean, then Dhanvantari asked Lord Vishnu to fix his place and part in the world. On this Vishnu said that the department of Yagya has already been done among the deities, so it is not possible now. You (dev) are not God because you come after the gods. Therefore you will get siddhis in the next life and you will be famous in the world and you will get divinity from the same body and the two castes will worship you in every way. You will also do the Ashtanga division of Ayurveda.

There is no doubt that you will be born again in Dwapara Yuga. According to this boon, being pleased with the penance of their son Kama Kashiraj Dhanva, Abj Lord took birth as his son and assumed the name Dhanvantari. Let us tell you that Dhanva was the son of Kash, the founder of Kashi city. He was proficient in curing all diseases and after taking Ayurveda from Bharadwaj he divided it into Ashtanga and distributed it among his disciples. According to Harivamsa Purana…

Kasha-Dirghatapa-Dhanva-Dhanvantari-Ketuman-Bhimaratha (Bhimasena)-Divodas-Pratardana-Vatsa-Alarka.

Let us tell that, the importance and place that Ashwini got in the Vedic period, Dhanvantari got the same in the Puranic period. In the hands of Ashwini Kumar, there was a nectar urn. According to mythological texts, the dialogue of Kashyap and Takshak has come in the Mahabhagavata Purana, and the same has come in the Brahmavaivarta Purana of Dhanvantari and Nagdevi Manasa. He is also said to be a disciple of Garuda.

Worship Lord Dhanvantari by lighting a lamp on the day of Dhanteras. Praying to Lord Dhanvantari to keep him healthy and healthy, say… “The Supreme Lord, whom we all know by the name of Sudarshan Vasudev Dhanvantari, who holds the nectar urn in his hands, that Lord is the destroyer of all who He is the lord of all the three worlds and is the sustainer of them, repeatedly salutations to Dhanvantari, the form of Vishnu.

On Kartik Krishna Paksha Trayodashi, Ayurveda experts or doctors worship Lord Dhanvantari. The festival of Dhanteras is also celebrated on this day. According to Skanda Purana, the description of this great festival celebrated on the day of Trayodashi of Krishna Paksha of Kartik month has been written. According to popular belief, since Lord Dhanvantari had appeared with an urn, it is a tradition to buy utensils on this occasion, sometimes buying gold, silver, or any other item on this day increases it thirteen times. Often, people buy broom or coriander seeds on this occasion and sow these seeds in their gardens or fields after Diwali.

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