रंगोत्सव… - Gyan Sagar Times
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रंगोत्सव…

भारत में होली का पर्व ऐतिहासिक ही नहीं सांस्कृतिक भी है और यह सदियों से चली आ रही है. पुराणों में भी वर्णित है रंगोत्सव या यूँ कहें मदनोत्सव.होली जिसे होलिका. होलाका धुलेंडी, धुरड्डी, धुरखेल और धूलिवंदन आदि नामों से जाना जाता है. बताते चलें कि, “ होली ” शब्द का जन्म संस्कृत से हुआ है. संस्कृत में इसे “होलक्का” कहा जाता हैं.

वैदिक युग में देवताओं के खाद्य-पदार्थ को भी “होलक्का” कहा जाता था. प्राचीन धर्म ग्रन्थ श्रीमद्भागवत महापुराण में भी रास का वर्णन आया है जिसमे भगवान श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रास रचाते थे. जबकि, प्राचीन ऋषि-मुनियों के कथनानुसार होली का शुरूआती शब्दरूप होलक्का था जो भारत के पूर्वी भागों में ज्यादा प्रचलित था.’होलाका’ उन बीस क्रीड़ाओं में एक है जो सम्पूर्ण भारत में प्रचलित हैं. इसका उल्लेख वात्स्यायन के कामसूत्र में भी हुआ है. हेमाद्रि ने बृहद्यम का एक श्लोक का जिक्र किया है जिसमें होलिका-पूर्णिमा को हुताशनी कहा गया है. लिंग पुराण के अनुसार “फाल्गुन पूर्णिमा” को “फाल्गुनिका” कहा जाता है जो लोगों को को विभूति व ऐश्वर्य प्रदान करती है.

वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव या काम-महोत्सव के नाम से जाना जाता है. होली का सांस्कृतिक महत्व ‘मधु’ अर्थात ‘मदन’ से भी जुड़ा है. संस्कृत और हिन्दी साहित्य में इस मदनोत्सव को वसंत ऋतु का प्रेम-आख्यान माना गया है. वसंत यानी शीत और ग्रीष्म ऋतु की संधि-वेला अर्थात एक ऋतु का प्रस्थान और दूसरी का आगमन माना जाता है. इस समय प्राकृति एक ऐसा परिवेश रचती है, जो मधुमय और रसमय होता है.पौराणिक ग्रन्थ ऋग्वेद में मधु का उल्लेख है. मधु का अर्थ होता है संचय से जुटाई गई मिठास (मधुमक्खियां अनेक प्रकार के पुष्पों से मधु को जुटाकर एक स्थान पर संग्रह करने का काम करती हैं) या यूँ कहें कि, मधु-संचय के लिए यह संघर्ष ही जीवन को मधुमय या रसमय बनाने का काम करती है.

रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिनों तक मनाया जाता है. यह पर्व फाल्गुन महीने की पूर्णिमा से शुरू होकर चैत्र महीने के पहले दिन मनाया जाता है. वैसे तो रंगों का त्यौहार होली जो वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाती है. वसंत पंचमी के दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है. इसी दिन से चैता, फाग या धमार का गाना आरंभ हो जाता है. चैता के गीतों में ‘रामा’ का शब्द हर पंगती में लगाते हैं जैसे:- “चढ़त चइत चित लागे ना रामा, बाबा के भवनवा, बीर बमनवा सगुन बिचारो,कब होइ हैं पिया से मिलनवा हो रामा,चढ़ल चइत चित लागे ना रामा”. इसके अलावा ठुमरी दादरा और कजरी भी गाया जाता है.

कामसूत्र और भविष्योत्तर पुराण के अनुसार, होलिका हेमंत या पतझड़ के अन्त का सूचक है लेकिन, वसंत काम और प्रेममय लीलाओं का द्योतक है. वहीँ, राग-रंग का संदेशवाहक भी माना जाता है. राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है. खेतों में सरसों खिल जाते हैं साथ ही साथ बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है. खेतों में गेंहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं. पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं. बच्चे हों या बूढ़े या युवा लोक लाज व संकोच को छोड़कर ढोलक- झाँझ और मंजीरे की धुन पर नाचने गाने लगते हैं.

होली की बात चल रही हो, और श्यामसुन्दर की याद ना आये ऐसा संभव ही नहीं है. बाल-गोपाल, श्यामसुंदर, मुरलीमनोहर का जन्म मथुरा में हुआ था और व श्याम वर्ण के थे जबकि, उनकी सखी राधा गौरवर्ण की थी. एक बार की बात है कि, बालकृष्ण प्रकृति के इस अन्याय की शिकायत करते हुए अपनी माँ यशोदा से इसका कारण जानने का प्रयत्न करते हैं. तब उनकी माँ यशोदा ने कहा कि, “लला” तुम राधा के मुख पर रंग लगा दो. नटखट श्रीकृष्ण यही कार्य करने चल पड़े. नटखट श्रीकृष्ण प्रेममयी शरारत करते हुए राधा व अन्य गोपियों को रंग लगा दिया. तभी से यह परम्परा चल पड़ी है. बताते चलें कि, मथुरा में होली के कई रंग होते हैं पूरी दुनिया में सबसे अच्छी होली मथुरा में ही खेली जाती है.

भारतीय साहित्य में भी होली की झलक देखने को मिलती है जिसमे हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली और कालिदास की कुमारसम्भव शामिल है. जबकि, कालिदास रचित ऋतुसंहार में वसंतोत्सव पर ही आधारित है. कई संस्कृत के कवियों ने भी अपनी कविता में वसंत की क्या खूब चर्चा की है. भक्तिकाल व रीतिकाल के हिंदी साहित्य में फाल्गुन और होली का विशिष्ट स्थान रहा है. आदिकालीन कवि विद्यापति, सूरदास, रहीम, रसखान, मलिक मुहम्मद जायसी और कबीर सहित अन्य कवियों का प्रिय विषय रहा है.

वहीं मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं. मुग़ल काल में लिखे गये उर्दू साहित्य के कई नामी शायरों ने भी होली की मस्ती और राधा-कृष्ण के निश्च्छल प्यार को अपनी शायरी में  ख़ूबसूरती से पिरोया है. उर्दू के जानेमाने शायर नजीर अकबराबादी पर भारतीय संस्कृति और परम्पराओं का जबर्दस्त असर था. उनकी लिखी रचना ‘नज़ीर की बानी’ के नाम से प्रसिद्ध है और उन्होंने जिस मस्ती के साथ होली का वर्णन किया है उसे पढ़कर ही उस दौर में खेली जाने वाली होली की मस्ती के महक को और भी मदमस्त कर देती है.

भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है. भारतीय शास्त्रीय संगीत में भी होली का विशेष महत्व दिया गया है. कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें है जैसे- “चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर”, “खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी”, “ होली खेलें रघुवीरा अवध में”, “आज रंग है री मन रंग है, अपने महबूब के घर रंग है री”. वहीं फ़िल्मी गीतों में “रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे”, “आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार”.

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