बदलते स्वरूप… - Gyan Sagar Times
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बदलते स्वरूप…

जब से आई है कोरोना देश के नौनिहालों का भविष्य ही अटक गया है. वैसे तो देखा जाय तो यह कहना तो एक बहाना ही होगा…इतिहास गवाह है कि आपसी फुट का नतीजा यह है कि देश में बेरोजगारी आज चरम पर है. दूसरी तरफ आजादी के बाद एकल परिवार का प्रचलन बढ़ा जिससे एकल परिवार के बच्चे अपनी मिट्टी या यूँ कहें कि संस्कार, सामजिक रीती-रिवाज से दूर हो गये.

कभी सोने की चिड़िया कही जाने वाली देश वर्तमान समय में कर्जों के बोझ से लदी है. जिस देश ने शिक्षा की शुरुआत की आज उसी देश के लोग नक़ल से पास हो रहें हैं. जिस देश ने लोगों को जीने की कला सिखाई आज वही लोग जीना ही भूल गए. जिस देश ने लोगों को बीमारी और उसके आयुर्वेदिक उपचार बताया आज उस देश के लोग रासायनिक घोल में उलझ गए.

संस्कृति, परम्पराये और शिक्षा के धनी इस देश में संस्कृति और शिक्षा तो पहले ही ध्वस्त हो गई थी बाकी बचा था परम्परा उसे कोरोना ने धो डाला. वैसे तो देखा जाय तो वर्तमान समय में कोरोना ने काल की गति को रोक दिया है वहीँ, आज भी गाँव के निवासियों के लिए कोरोना तो एक बहाना है. सवाल यह है कि, अगर कोरोना इतना ही भयानक था तो तीसरी लहर का प्रकोप भी शहर के आगे नहीं बढ़ पाया आखिर क्यों?

आजादी के बाद राजवाड़ा समाप्त हो गया उसके बाद पुरानी विरासत को सँभालने की जिम्मेदारी पुरातत्त्व विभाग को दी गई. लेकिन, अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि देश की आजादी के 73 साल पुरे होने के बाद भी पुरातत्त्व विभाग को यह नहीं पता है कि देश में पुरानी विरासत की संख्या कितनी है क्या उसका वजूद मौजूद है या उसके अवशेष भी गायब हो गए?

अफ़सोस के बाद कहना पड़ता है कि देश की आजादी मिलने के बाद देश के लोगों का मानसिकता या यूँ कहें कि सोच या दिशा ही बदल गई. आजादी के 73 साल पुरे होने के बाद भी देश चलने वालों और उनसे जुड़े कर्मचारियों की मानसिकता और सोच में परिवर्तन नहीं आया. आज भी हर क्षण सरकारी दफ्तरों में इस घृणित मानसिकता और सोच से आम-आवाम को रूबरू होना पड़ रहा है.

आधी 19वीं दशक के करीब देश को आजादी मिली. देश से गुलामी दूर करने के लिए इस धरती ने अनेक सपूतों को खोया… जो आज भी गुमनाम है. गुलामी और  आजादी के बीच या यूँ कहें कि, आजादी के बाद नये देश में नई संविधान व्यवस्था के तहत नई देश का आगाज हुआ लेकिन, गुलामी के दौर में जो घृणित मानसिकता और सोच गुलाम देश के कर्मचरियों, अर्दलियों और साहबों की थी वही, घृणित मानसिकता और सोच और भी विकृत होकर वर्तमान समय जो आभासी दुनिया का है जिसे हम सभी डिजिटल युग या यूँ कहें कि, 21वीं सदी कहते हैं उसमें प्रत्यक्ष दिख रहा है.

हमने शुरुआत में ही कोरोना और शिक्षा से की थी. जिस देश ने पूरी दुनिया को बोलना, लिखना और पढ़ना सीखाया. उस देश में कभी सौ प्रतिशत लोग शिक्षित और खुशहाल थे आज उसी देश में नक़ल और पिछला दरवाजे के सहारे सीढ़ी चढ़ रहें है. खुशहाली शब्द किताबों में लिखा हुआ अच्छा लगता है वर्तमान समय में लोग खुशहाली को खोजने में व्यस्त हैं वहीँ सरकार भी अपनी तरफ से तमाम तरह के उपाय कर रही है लेकिन, खुशहाली है की मिलती ही नहीं.

कभी इस देश में बच्चे शिक्षा पाने के लिए अपने माता-पिता और सगे-संबंधी दूर होकर शिक्षा ग्रहण करते थे. शिक्षित होकर अपना अपने परिवार के जीवकोपार्जन में सहायक होते थे लेकिन आजादी क्या मिली… कि शिक्षित होकर भी खुद के जीवकोपार्जन के लाले पड़ गए.

सौ प्रतिशत प्रमाणिक सत्य है कि बुजुर्गों के आखरी दोस्त बच्चे होते हैं और बच्चे के पहले दोस्त बुजुर्ग होते है. लेकिन, क्या कहें और किसे सुनाएँ आज बचपन और बुजुर्ग दोनों ही एक दूसरे से दूर हो गए. दोनों एक-दूसरे से मिलने की जद्दोजहद में समय की घडियां को गिनते रहते हैं ना तो मुलाकत होती है ना बात समय तो समय है लेकिन, उम्र के इस पड़ाव पर उम्र थक कर हमेशा के लिए चिरनिद्रा में सो जाती है.

आजादी के बाद सरकार और उसके नुमाइंदों की गलत नीतियों के कारण या यूँ कहें कि लालच और स्वार्थ से वशीभूत होकर देश के निवासियों को खुशहाली की खोज में लगाकर चैन की वंशी बजा रहें है. देश की परम्परा ऐसी है कि वर्ष के बारहों महीने कोई-कोई त्यौहार होता ही है लेकिन आजादी क्या मिली…की आजादी के बाद चुनाव भी एक महापर्व के रूप में शामिल हो गया. इस महापर्व में बात तो होती है आमलोगों की लेकिन लक्ष्मीपति का तमगा और मजा कोई और ले जाता है. आमलोगों को मिलती है बस बेकारी और बेबसी…

हर साल इस देश में कहीं ना कही चुनावी महापर्व आयोजन होता ही रहता है वर्तमान समय में भी पांच राज्यों में इस चुनावी महापर्व का आयोजन हो रहा है. अक्सर ही देखा जाता है कि इस तरह के महापर्व में मुद्दों से शुरू होकर शिकवे-शिकायतों के साथ-साथ निजी कटाक्ष पर सिमट जाता है और मुद्दाविहीन होकर ब्लैकहोल की अनंत गहराइयों में विलीन हो जाता है. और आमलोगों को मिलती है बस बेकारी और बेबसी…

डिजिटल युग से पहले इस देश में टोपी पहनाने की प्रथा चली आ रही थी लेकिन, डिजिटल युग में प्रवेश करते ही सबसे पहले माला कौन पहनायेगा इस प्रथा का आगाज हो चूका है. आए दिन टकराव की घटनाएँ होती रहती है और छपती रहती है. इस तरह की घटनाओं से मन दुखीं होकर एक ही सवाल करता है वास्तविक में “क्या हम सभी शिक्षित है?”. इस तरह के अशोभनीय आचरण का प्रयोग सरेआम कर क्या हम सभी विरासत के पन्नों में अंकित होंगें?

आभासी दुनिया का अपना अलग ही अंदाज है, देश की आधी आबादी इसके पीछे पागल है. ना रात का पता और दिन का, ना गर्मी का न ठंडे का. उनकी दुनिया में बाते या जुमले ट्रेंड करते हैं. अभी हाल के दिनों में सोशल साईट सहित कई चैनलों में स्कूल और ड्रेस बनाम हिजाब पर काफी लंबी चर्चा चल रही है. कभी इस देश में गुरुकुल हुआ करता था उस वक्त शिक्षितों की संख्यां सौ प्रतिशत हुआ करती थी. गुरुकुल के बाद पाठशाला, विद्यालय उसके बाद स्कूल बना.लेकिन, जैसे-जैसे शताब्दियाँ बदलती गई और वैसे-वैसे पढ़ाई का स्तर गिरता गया. स्थिती इतनी नाजुक हो गई कि आज घर बैठे डिग्रियां उपलब्बध हो जाती है.

हम बात कर रहें हैं एक ऐसे देश की जिसका ईतिहास व संस्कृति इतना अनोखी है. वर्तमान समय के निवासी उन रहस्यों को लगातार समझने की कोशिश कर रहें है और विस्मित हो रहें हैं… वहीं वर्तमान समय में इस देश के कुछ चंद आवाम के कारनामों से महसूस होता है कि आज भी जयचंद के पूर्वजों के वंशज या यूँ कहें कि जयचंद की वंश परम्परा चल रही है. एशियाई देशों में भारत को विकाशशील का तमगा प्राप्त है. वहीँ, इस देश में पत्थर भी पुजे जाते हैं वहाँ, कभी सांढ़ भी स्कूटर की सवारी करते थे क्या उस देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े कर्मचारी को अज्ञात हिमालियन बाबा का आशीर्वाद प्राप्त नहीं हो सकता है क्या..? इसमें इत्तनी हाय-तौबा क्यों.

शक्ति के अर्थ और उसके मायने ही बदल गए हैं पहले जहाँ शक्ति का अर्थ ताकत नहीं होता था बल्कि सुसंस्कृत,संस्कारी,धर्म व कर्म को मानने वाला…वहीँ वर्तमान समय में लुटो और बेवकूफ बनाओ. वहीँ इस देश के लोग राष्ट्रपिता और उसकी महता को भूल गए लेकिन उनकी छायाप्रति या यूँ कहें कि चित्र (तस्वीर) आज भी सरकारी दफ्तरों में लगी रहती है साथ ही उनकी याद में दो दिन घड़याली आँसू भी बहा लेते हैं.

एक जमाना था कि कभी शिक्षक यानी गुरु की महिमा बहुत ही अनोखी थी. हम सभी बचपन में एक श्लोक को हमेशा बोला करते थे. वो श्लोक है….

गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरा

गुरु साक्षात परमब्रह्मा तस्मै श्री गुरवे नम:II

एक जमाना था कि गुरु की महता सभी देवों से अधिक होती थी लेकिन, वर्तमान समय में गुरु ज्ञान से दूर होकर राजा-महाराजा की आदेशों के पालन-पोषण में लगी है. कभी दुनिया को ज्ञान देनेवाले आज खुद अँधेरे में दौर रहें है. वर्तमान समय में आज के शिक्षको का मूल मंत्र है “अँधेरा कायम रहें”.

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