भूगोल से संबंधित-42… - Gyan Sagar Times
High School

भूगोल से संबंधित-42…

सूर्य…

हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार स्वर्गलोक के देवता इंद्र के सभासदों में एक है और इन्हें भगवान सूर्य कहते हैं . भारत की आवाम भगवान सूर्य को प्रणाम करते हुए प्रतिदिन अर्घ्य देकर दिन की शुरुआत करते हैं. पौराणिक ग्रंथो के अनुसार सूर्य की उत्पत्ति के कई प्रसंग है . प्रचलित मान्यताओं के अनुसार महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति  के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं भगवान सूर्य. अदिति के पुत्र होने के कारण उन्हें आदित्य भी कहते हैं.

सूर्य आकाशगंगा  के 100 अरब से अधिक तारो में से एक सामान्य मुख्य क्रम  में G2 श्रेणी का साधारण तारा है.  अक्सर यह  कहा जाता है कि सूर्य एक साधारण तारा है. यह भी सच है कि सूर्य के जैसे लाखों तारे और भी  हैं. लेकिन सूर्य से बड़े तारो की तुलना में छोटे तारे की संख्या ज़्यादा है. आकाशगंगा में सितारों का औसत द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान के आधे से भी कम है. सूर्य को दूरबीन  से देखने पर इसकी सतह पर छोटे-बड़े धब्बे दिखलाई पड़ते हैं, इन्हें सौर कलंक कहा जाता है. ये कलंक अपने स्थान से सरकते हुए दिखाई पड़ते हैं, वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला है कि सूर्य पूरब से पश्चिम की ओर अपने अक्ष पर एक परिक्रमा करता है. सूर्य की बाहरी परतें भिन्न भिन्न घुर्णन गति दर्शाती है, भूमध्य रेखा ( मध्य भाग ) पर सतह हर 25.4 दिनों में एक बार घूमती है, ध्रुवो के पास यह 36 दिन का होता हैं. इस अजीब व्यवहार का मुख्य कारण है कि, सूर्य पृथ्वी के जैसा ठोस नहीं है, इस तरह का प्रभाव गैसिए ग्रहों में देखा जाता है, जबकि  सूर्य का केन्द्र एक ठोस पिण्ड के जैसे घुर्णन करता है. सूर्य पर धब्बो / सौर कलंक (चलते हुए गैसों के खोल) के क्षेत्र होते है जिनका तापमान अन्य क्षेत्रों से कुछ कम लगभग 3800 डिग्री या केल्वीन(1500 ºC) होता है. सूर्य के धब्बे काफ़ी बड़े हो सकते हैं, इनका व्यास 50000 किलोमीटर तक  हो सकता है. सूर्य धब्बे सूर्य के चुंबकीय क्षेत्रों में परिवर्तन से बनते हैं. सूर्य के धब्बों का पूरा चक्र 22 वर्षों का होता है, पहले 11 वर्षों तक यह धब्बा बढ़ता है उसके बाद के 11 वर्षों तक यह धब्बा घटता है. जब सूर्य की सतह पर धब्बा दिखलाई देता है, उस समय पृथ्वी पर चुम्बकीय आंधी उत्पन्न होते हैं, इससे चुम्बकीय सुई की दिशा बदल जाती है, एवं रेडियो, टेलीविजन व  बिजली से चलने वाली मशीनों में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है. सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र बहुत ही मज़बूत और जटिल है. सूर्य में उर्जा का उत्पादन स्थिर नहीं होता है, ना ही सूर्य धब्बो की गतिविधि.17वी शताब्दी के उत्तारार्ध में सूर्य धब्बे अपने न्यूनतम पर था. सौर मंडल के जन्म के बाद से सूर्य ऊर्जा का उत्पादन 40% तक  बढ़ गया है.

मुख्यरूप से सूर्य हाइड्रोजन और हीलियम गैसों का एक विशाल गोला है. सूर्य की सतह का निर्माण हाइड्रोजन, हीलियम, लोहा, निकिल, ऑक्सीजन, सल्फर, मैग्नीशियम, कार्बन, नियोन, कैल्सियम व  क्रोमियम तत्वों से बना है. वर्तमान में सूर्य के द्रव्यमान का 71%  हाइड्रोजन,  26.5% हीलियम और 2.5% अन्य तत्व है. यह अनुपात धीरे-धीरे बदलता रहता है, क्योंकि सूर्य हायड्रोजन को जलाकर ही  हीलियम बनाता है.  हैंस बेथ (Hans Bethe) ने बताया कि 107 ºC ताप पर सूर्य के केन्द्र पर चारों हाइड्रोजन नाभिक मिलकर एक हीलियम नाभिक का निर्माण करता है, अर्थात सूर्य के केन्द्र पर नाभिकीय संलयन होता है, इस परमाणु विलय की प्रक्रिया द्वारा सूर्य अपने केंद्र में उर्जा पैदा करता है. सूर्य से निकली ऊर्जा का छोटा सा भाग ही पृथ्वी पर पहुँचता है, जिसमें से 15 प्रतिशत अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाता है, 30 प्रतिशत पानी को भाप बनाने में काम आता है, और बहुत सी ऊर्जा पेड़-पौधे व समुद्र सोख लेते हैं. इसकी मज़बूत गुरुत्त्वाकर्षण शक्ति विभिन्न कक्षाओं में घूमते हुए पृथ्वी और अन्य ग्रहों को इसकी तरफ खींच कर रखती है.  सूर्य का केन्द्रीय भाग “कोर कहलाता है, और यहाँ का तापमान 15600000 डिग्री केल्विन (1.5×107 ºC) होता है, और दबाव 250 विलियन वायुमंडलीय दबाव भी होता है. सूर्य के केंद्र का घनत्व पानी के घनत्व से 150 गुना से अधिक होता है.  सूर्य की शक्ति  नाभिकीय संलयन द्वारा निर्मित होता है, यहां हर सेकंड 700,000,000 टन की हाइड्रोजन 695000000 टन में परिवर्तित हो जाती है, शेष 5,000,000 टन गामा किरणो के रूप में ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है. यह ऊर्जा जैसे-जैसे केंद्र से सतह की तरह बढती है, और विभिन्न परतो द्वारा अवशोषित हो कर कम तापमान पर उत्सर्जित होती है. सतह पर यह मुख्य रूप में प्रकाश किरणो के रूप में उत्सर्जित होती है, इस तरह से केंद्र में निर्मित कुल ऊर्जा का 20% भाग ही उत्सर्जित होता है.

सूर्य की सतह, जो दीप्तिमान रहती हैं, जिसे “प्रकाश मंडल (Photo sphere)”  कहते  हैं , और यहां का तापमान 5800 डिग्री केल्वीन (6000 ºC) होती है. प्रकाश मण्डल के किनारे प्रकाशमान नहीं होते, क्योंकि सूर्य का वायुमण्डल प्रकाश का अवशोषण कर लेती है, जिसे “वर्ण मण्डल” भी कहते हैं, जो काले रंग का होता है. यह प्रकाश मण्डल से उपर का क्षेत्र होता है. वर्ण मण्डल के उपर के  क्षेत्र जिसे ‘सूर्य कोरोना’ भी कहते है, यह अंतरिक्ष में लाखों किलोमीटर तक फैला हुआ है. इस क्षेत्र का तापमान लगभग 1,000,000 डिग्री केल्वीन तक होता है, जो केवल सूर्य ग्रहण के समय ही दिखायी देता है. सूर्य कोरोना  “एक्स–रे” उत्सर्जित करता है, इसे सूर्य का मुकुट भी  कहा जाता है. पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सूर्य कोरोना से प्रकाश की प्राप्ति होती है. सौर ज्वाला को उत्तरी ध्रुव पर औरोरा बोरियलिस और दक्षिणी ध्रुव पर औरोरा औस्ट्रेलिस भी कहते हैं.

  • सूर्य, गर्मी और प्रकाशके अलावा इलेक्ट्रान और प्रोटोन की एक धारा का भी उत्सर्जन करता है, जिसे सौर वायु कहते हैं, जो 450 किलोमीटर/सेकंड की रफ्तार से चलती है. सौर वायु और सौर ज्वाला के द्वारा अधिक ऊर्जा के कणों का प्रवाह होता है, जिससे पृथ्वी पर बिजली की लाईनो के अलावा संचार उपग्रह और संचार माध्यमो पर प्रभाव पडता है. ध्रुविय क्षेत्रो में इससे  सुंदर अरोरा बनता  हैं.
  • अंतरिक्ष यान युलीसीस से प्राप्त आंकड़ो से पता चलता है कि, जब सौर गतिविधि अपने निम्न स्तर पर होती है, तब ध्रुवीय क्षेत्रों से प्रवाहित सौर वायु दुगनी गति 750 किलोमीटर/सेकंड से चलती है, जो कि उच्च अक्षांशों में कम होती है. ध्रुवीय क्षेत्रों से प्रवाहित सौर वायु की संरचना भी अलग होती है, जबकि सौर गतिविधि के चरम पर यह यह अपने मध्यम गति पर चलती है.
  • सूर्य का द्रव्यमान 989e30 किलो है, जबकि सौरमंडल के द्रव्यमान का कुल 99.8% द्रव्यमान सूर्य का है.
  • सूरज देखने में इतना बड़ा नहीं लगता क्योंकि वह धरती से बहुत दूर है. सूर्य का व्यास 13 लाख 92 हज़ार किलोमीटर (865000 मील) है, जो पृथ्वी के व्यास का लगभग 110 गुना बड़ा है. सूर्य पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा है, और पृथ्वी को सूर्यताप का 02अरबवाँ भाग ही मिलता है.
  • सूर्य से पृथ्वी की औसत दूरी लगभग 14,96,00,000 किलोमीटर या 9,29,60,000 मील है तथा सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने में 08 मिनट 06 सेकेण्ड का समय लगता है. इसी प्रकाशीय उर्जा से प्रकाश संश्लेषण नामक एक महत्त्वपूर्ण जैव-रासायनिक अभिक्रिया होती है, जो पृथ्वी पर जीवन का आधार होता है. यह पृथ्वी के जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है.

Related Articles

Back to top button
error: Content is protected !!