Dhram Sansar

सूर्य षष्ठी व्रत…

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर।

दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते।।

पौराणिक काल से ही भगवान भास्कर की पूजा-अर्चना हो रही है. वर्तमान समय में भी भगवान आदित्य की त्रिकाल पूजा-अर्चना की जाती है. पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार भगवान आदित्य ही ऐसे एकमात्र देवता हैं जो प्रत्यक्ष रूप से लोगों को दिखाई देते हैं. वैदिक काल से ही भगवान विश्वरूप की पूजा होती चली आ रही है, भगवान भास्कर के उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण व ब्रह्म वैवर्त पुराण में विस्तार से चर्चा की गई है. भगवान सूर्य की पत्नी का नाम अदिति और छाया है. कहा जाता है कि, सूर्य शक्तियों के स्वामी हैं और उनकी शक्ति का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी अदिति और छाया है. भगवान सूर्य की आराधना में उनकी पत्नी को ही अर्घ्य देकर प्रणाम करते हैं. भगवान आदित्य की विशेष पूजा साल में दो बार की जाती है. सबसे पहले साल की शुरुआत हिंदी महीने अनुसार, चैट माह में और दूसरी कार्तिक महीनें में और इस महापर्व का नाम है , “षष्ठी”  जिसे अपभ्रंश स्वरूप छठ व्रत कहते हैं.

बताते चले कि, कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को यह व्रत मनाये जाने के कारण इसका नामकरण छठ व्रत पड़ा. यह महापर्व चार दिवसीय होता है और सबसे बड़ी बात यह है कि 36 घंटो का निर्जला उपवास जिसमें पानी (जल) पीने से व्रत टूट जाता है. सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, नेपाल सहित पुरे विश्व में मनाया जाता है. . पारिवारिक सुख-समृद्धी तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए इस महापर्व को स्त्री व पुरुष बड़े उल्लासपूर्वक मनाते हैं. सूर्योपासना से सम्बन्धित हमारे धर्मग्रन्थो में कई कहानियाँ या प्रसंगों का वर्णन मिलता है. महाभारत में ही दो प्रसंग मिलता है. पहला प्रसंग है कि, बात कर रहें हैं सूर्य पुत्र कर्ण या यूँ कहें, सूत पुत्र कर्ण की. कहा जाता है कि, कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वह घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर भगवान आदित्य की आराधना किया करते थे.

दूसरा प्रसंग है, पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्री कृष्ण द्वारा बताये जाने पर द्रौपदी ने भी छठ व्रत रखा था और उनकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिल गया. पौराणिक कहानियों के अनुसार, पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार, राजा प्रियवद की कोई सन्तान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर को महारानी मालिनी को खिलाई गई. कुछ समय पश्चात राजा प्रियवद को मृत पुत्र का जन्म हुआ, प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे, उसी समय ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि, सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ. हे राजन! आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें. राजा प्रियवद ने भी पुत्र की इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. राजा प्रियवद ने षष्ठी देवी का व्रत-पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी को की थी.

ॐ सूर्य देवं नमस्ते स्तु गृहाणं करूणा करं |

अर्घ्यं च फ़लं संयुक्त गन्ध माल्याक्षतै युतम् ||

चार दिवसीय महापर्व छठ  की शुरुआत कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को नहाय-खाय के साथ शुरू हो गया है. सर्व प्रथम कार्तिक शुक्ल पक्ष चतुर्दशी के दिन साधक अपने घरों की सफाई करते हैं और स्नान कर शुद्ध शाकाहारी भोजन बनाकर व्रती भगवान भास्कर के व्रत का संकल्प लेते हैं और उसके बाद बना हुआ प्रसाद ग्रहण करते हैं, उसके बाद ही परिवार के लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं. दुसरे दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी को को व्रतधारी दिनभर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं, इसे ‘खरना’ कहा जाता है. प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है, इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है. इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है.

तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी के दिन में प्रसाद बनाया जाता है. प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ भागों में “टिकरी” भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, उसे बनाते हैं. शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं. सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है. चौथा और आखरी दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. व्रति वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। सभी व्रती तथा श्रद्धालु घर वापस आते हैं और  गाँव के पीपल के पेड़ को पूजा करते हैं. पूजा के बाद व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर और गुड व आदि खाकर व्रत पूर्ण करते हैं जिसे पारण या परना भी कहते हैं.

इस महापर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि, सूर्योपासना के महापर्व में साधक सहित परिवार के लोग बड़े ही सादगी और पवित्रता का ख्याल रखते हुए भक्ति और अध्यात्म से परिपूर्ण बांस और मिटटी से बने बर्तनों या पीतल व चांदी के बर्तनों का है प्रयोग करते हैं. पकवान बनाने के लिए गन्ने का रस या मीठा (गुंड), चावल और गेहूं का ही प्रयोग किया जाता है. इस पर्व में जन सामान्य के द्वारा अपने रीती-रिवाजो के रंगों में गधी गई उपासना पद्धति है, इसके केंद्र में वेद-पुराण ना होकर ग्रामीण परिवेश से जुड़ी हुई परम्परा दीखता है. आस-पास के सहयोग और परिवार के लोग मिलकर ही सामूहिक अभियान संगठित कर जनता स्वयं ही नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था कर उत्सव का आनंद मनाती है.

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