Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-18…

...दूत का रावण को समझाना और लक्ष्मणजी का पत्र देना…

दोहा :-

की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।

कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, उनसे तेरी भेंट हुई या वे कानो से मेरा सुयश सुनकर ही लौट गए? शत्रु सेना का तेज और बल बताता क्यों नहीं? तेरा चित्त विचलित क्यूँ हो रहा है.

चौपाई :-

                 नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।                         

वालव्याससुमनजीमहाराज

मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे नाथ ! आपने जैसे कृपा करके पूछा है, वैसे ही क्रोध छोड़कर मेरी बात पर विश्वास कीजिए. जब आपका छोटा भाई श्रीरामचंद्रजी से जाकर मिला, तब उसके पहुँचते ही श्रीरामचंद्रजी ने उसको राज तिलक कर दिया.

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।

श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हम रावण के दूत है, यह कानो से सुनकर वानरो ने हमे बाँधकर बहुत कष्ट दिए, यहाँ तक कि वे हमारे नाक-कान काटने लगे. श्रीरामचंद्रजी की शपथ दिलाने पर उन्होने हमको छोड़ा.

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।

नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे नाथ ! आपने श्रीरामचंद्रजी की सेना पूछी, सो वह तो सौ करोड़ मुखो से भी वर्णन नही की जा सकती. अनेको रंगो के भालु और वानरो की सेना है, जो भयंकर मुख वाले, विशाल शरीर वाले और भयानक है.

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।

अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जिसने नगर को जलाया और आपके पुत्र अक्षय कुमार को मारा, उसका बल तो सब वानरो मे थोड़ा है. असंख्य नामो वाले बड़े ही कठोर और भयंकर योद्धा है. उनमे असंख्य हाथियो का बल है और वे बड़े ही विशाल है.

दोहा :-

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।

दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, द्विविद, मयंद , नील , अंगद , गद , विकटास्य , दधिमुख, केसरी , निशठ, शठ और जाम्बवान् ये सभी भल की राशि है.

चौपाई :-

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।

राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, ये सब वानर बल मे सुग्रीव के समान है और इनके जैसे ( एक-दो नही ) करोड़ो है, उन बहुत सौ को गिन ही कौन सकता है. श्रीरामचंद्रजी की कृपा से उनमे अतुलनीय बल है. वे तीनो लोको को तृण के समान तुच्छ समझते है.

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।

नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे दसग्रीव ! मैने कानो से ऐसा सुना है कि अठारह पद्द तो अकेले वानरो के सेनापति है. हे नाथ ! उस सेना मे ऐसा कोई वानर नही है, जो आपको रण मे न जीत सके.

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।

सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, सब के सब अत्यंत क्रोध से हाथ मीजते है. पर श्रीरघुनाथजी उन्हे आज्ञा नही देते. हम मछलियो और साँपो सहित समुन्द्र को सोख लेंगे. नही तो बड़े-बड़े पर्वतो से उसे भरकर पूर पाट देंगे.

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।

गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, और रावण को मसलकर धूल मे मिला देंगे. सब वानर ऐसे ही वचन कह रहे है. सब सहज ही निडर है, इस प्रकार गरजते और डपटते है मानो लंका को निगल ही जाना चाहते है.

दोहा :-

सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।

रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, सब वानर-भालू सहज ही शूरवीर है फिर उनके सिर पर प्रभु श्रीरामचंद्रजी है. हे रावण ! वे संग्राम मे करोड़ो कालो को जीत सकते है.

चौपाई :-

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई ।।

सक सर एक सोषि सत सागर । तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, श्रीरामचंद्रजी के तेज, बल और बुद्धि की अधिकता को लाखो शेष भी नही गा सकते. वे एक ही बाण से सैकड़ो समुद्रो को सोख सकते है, परन्तु नीति निपुण श्रीरामचंद्रजी ने नीति की रक्षा के लिए आपके भाई से उपाय पूछा.

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं

सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, आपके भाई के वचन सुनकर वे ( श्रीरामचंद्रजी) समुंद्र से राह (रास्ता) माँग रहे है, उनके मन मे भी कृपा है इसलिए वे उसे सोखते नही. दूत के ये वचन सुनते ही रावण खूब हँसा और बोला – जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरो को सहायक बनाया है.

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई

मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, स्वाभाविक ही डरपोक विभीषण के वचन को प्रमाण करके उन्होने समुद्र से मचलना ( बालहठ ) ठाना है. अरे मूर्ख ! झूठी बड़ाई क्या करता है ? बस, मैने शत्रु  राम के बल और बुद्धि की थाह पा ली.

चौपाई :-

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें ।।

सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जिसके पास विभीषण जैसा डरपोक मंत्री हो, उसे जगत में विजय और ऐश्र्वर्य कहाँ? दुष्ट रावण के वचन सुन कर दूत को क्रोध बढ़ गया! उसने मौका समझ कर पत्रिका निकाली.

रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती ।।

बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, श्रीरामचंद्रजी के छोटे भाई लक्ष्मण ने यह पत्रिका दी है. हे नाथ ! इसे बचवाकर (पढ़वाकर) छाती ठंडी कीजिए. रावण वे हँसकर उसे बाएँ हाथ से लिया और मंत्री को बुलवाकर उसने कहा और वह मूर्ख भी उसे बचाने (पढ़ने) लगा.

दोहा :-

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।

राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, पत्रिका मे लिखा था- अरे मूर्ख ! केवल बातो से ही मन को रिझाकर अपने कुल को नष्ट-नष्ट न कर. श्रीरामचंद्रजी से विरोध करके तू विष्णु, ब्रह्मा और महेश की शरण जाने पर भी नही बचेगा.

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।

होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, या तो अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषण की भाँति प्रभु के चरण कमलो का भ्रमर बन जा. अथवा रे दुष्ट ! श्रीरामचंद्रजी के बाण रूपी अग्नि में परिवार सहित पतिंगा हो जा, दोनो में से जो अच्छा लगे सो कर.

चौपाई :-

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।

भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, पत्रिका सुनते ही रावण मन मे भयभीत हो गया, परन्तु मुख से मुस्कुराता हुआ वह सबको सुनाकर कहने लगा – जैसे कोई पृथ्वी पर पड़ा हुआ हाथ से आकाश को पकड़ने की चेष्टा करता है, वैसे ही यह छोटा तपस्वी लक्ष्मण डींग हाँकता है.

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।

सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, शुक ( दूत ) ने कहा – हे नाथ ! अभिमानी स्वभाव को छोड़कर ( इस पत्र मे लिखी ) सब बातो को सत्य समझिए. क्रोध छोड़कर मेरा वचन सुनिए. हे नाथ ! श्री रामचंद्रजी से वैर त्याग दीजिए.

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।

मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, यद्यपि श्रीरघुवीर समस्त लोको के स्वामी है, पर उनका स्वभाव अत्यंत ही कोमल है. मिलते ही प्रभु आप पर कृपा करेंगे और आपका एक भी अपराध वे हृदय में नहीं रखेंगे.

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।

जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जानकीजी श्रीरघुनाथजी को दे दीजिए. हे प्रभु ! इतना कहना मेरा मानिये. जब उस दूत ने जानकीजी को देने के लिए कहा, तब दुष्ट रावण ने उसको लात मारी.

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।

करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, वह भी विभीषण की भाँति चरणो में सिर नवाकर नही चला, जहाँ कृपासागर श्रीरघुनाथजी थे. प्रणाम करके उसने अपनी कथा सुनाई और श्रीरामचंद्रजी की कृपा से अपनी गति मुनि का स्वरूप पाई.

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।

बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, शिवाजी कहते है – हे भवानी ! वह ज्ञानी मुनि था, अगस्त्य ऋषि के शाप के राक्षस हो गया था. बार-बार श्रीरामचंद्रजी के चरणो की वंदना करके वह मुनि अपने आश्रम को चला गया.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्री रामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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