सुन्दरकाण्ड-17… - Gyan Sagar Times
Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-17…

…समुन्द्र पार करने के लिए विचार…

चौपाई :-

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।

संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हे वीर वानरराज सुग्रीव और लंकापति विभीषण ! सुनो , इस गहरे

वालव्याससुमनजीमहाराज

समुन्द्र को किस प्रकार पार किया जाए? इसमें अनेक जाति के मगर, साँप और मछलियो से भरा हुआ है. इस अत्यंत अथाह समुन्द्र को पार करने में सब प्रकार से कठिनाई है.

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।

जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, विभीषण जी ने कहा- हे रघुनाथ जी ! सुनिए, यद्यपि आपका एक बाण ही करोड़ो समुन्द्रो को सोखने वाला है लेकिन, नीति ऐसी कही गई है कि पहले जाकर समुन्द्र से प्रार्थना की जाए.

दोहा :-

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।

बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे प्रभु ! समुन्द्र आपके कुल के पूर्वज है, वे विचारकर उपाय बतला देंगे. उसके बाद रीछ और वानरो की सारी सेना बिना ही परिश्रम के समुन्द्र के पार उतर जाएगी.

चौपाई :-

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।

मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, श्रीरामकचंद्रजी ने कहा –  हे सखा ! तुमने अच्छा उपाय बताया. यही किया जाए, यदि दैव यहायक हो. लेकिन, यही सलाह लक्ष्मणजी के मन को अच्छी नही लगी वहीँ, श्रीरामचंद्रजी के वचन सुनकर तो लक्ष्मणजी को बहुत ही दुःख मिला.

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।

कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, लक्ष्मणी जी ने कहा – हे नाथ! दैव का कोई  भरोसा नहीं है ! अत: मन में क्रोध लाईए और समुन्द्र को सुखा डालिए. यह दैव तो कायर के मन को तसल्ली देने का उपाय है. आलसी लोग ही हमेशा दैव-दैव पुकारा करते है.

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।

अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, यह सुनकर श्रीरघुवीर हँसकर बोले- ऐसे ही करेंगे, मन मे धीरज रखो. ऐसा कहकर छोटे भाई को समझाकर प्रभु श्रीरघुनाथजी समुन्द्र के समीप गए.

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।

जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, उन्होने पहले सिर झुकाकर प्रणाम किया. फिर किनारे पर ही कुश बिछाकर बैठ गए. इधर ज्यों ही विभीषणजी प्रभु के पास आए थे, त्यों ही रावण ने उनके पीछे दूत भेजे थे.

दोहा :-

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।

प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, कपट से वानर का शरीर धारण कर उन्होने सब लीलाएँ देखी. वे अपने हृदय में प्रभु के गुणो की और शरणागत पर उनके स्नेह की सराहना करने लगे.

चौपाई :-

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।

रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, फिर वे प्रकट रूप में भी अत्यंत प्रेम के साथ श्रीरामचंद्रजी के स्वभाव की बड़ाई करने लगे और अपने देश को भूल गए. सब वानरो ने जाना कि ये शत्रु के दूत है और वे उन सबको बाँधकर सुग्रीव के पास ले आए.

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।

सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, सुग्रीव ने कहा – सब वानरो ! सुनो , राक्षसो के अंग-भंग करके भेज दो. सुग्रीव के वचन सुनकर वानर दौड़े और दूतो को बाँधकर उन्होने सेना के चारो ओर घुमाया.

बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।

जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, वानर उन्हे बहुत तरह-तरह से मारने लगे और वे दीन होकर पुकारते थे, फिर भी वानरो ने उन्हे नही छोड़ा. तब दूतो ने पुकारकर कहा – जो हमारे नाक-कान काटेगा, उसे कोसलाधीश श्रीरामचंद्रजी की सौगंध है.

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।

रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, यह सुनकर लक्ष्मणजी ने सबको निकट बुलाया. उन्हे बड़ी दया लगी, उन्होने हँसकर राक्षसो को तुरंत ही छुड़वा दिया. और उनसे कहा – रावण के हाथ में यह चिट्ठी देना और कहना- हे कुलघातक ! लक्ष्मण के संदेश को पढ़ो.

दोहा :-

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।

सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, फिर उस मूर्ख से मुहँजबानी यह मेरा कृपा से भरा हुआ संदेश कहना कि सीता जी को देकर उनसे ( श्रीरामचंद्रजी से ) मिलो, नहीं तो तुम्हारा काल आ गया है समझो !

चौपाई :-

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।

कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, लक्ष्मणजी के चरणो में मस्तक नवाकर, श्रीरामचंद्रजी के गुणो की कथा का वर्णन करते हुए दूत तुरन्त ही चल दिए. श्रीरामचंद्रजी का यश कहते हुए वे लंका में आए और उन्होने रावण के चरणो में सिर नवाए.

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।

पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, दशमुख रावण ने हँसकर बात पूछी – अरे शुक ! अपनी कुशल क्यो नही कहता? फिर उस विभीषण का समाचार सुना, मृत्यु जिसके अत्यंत निकट आ गई है.

करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।

पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, मूर्ख ने राज्य करते हुए लंका को त्याग दिया. अभागा अब जौ का कीड़ा बनेगा. जैसे जौ के साथ घुन भी पिस जाता है, वैसे ही नर-वानरो के साथ वह भी मारा जाएगा, फिर भालु और वानरो की सेना का हाल कह, जो कठिन काल की प्रेरणा से यहाँ चली आई है.

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।

कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, और जिनके जीवन का रक्षक कोमल चित्त वाला बेचारा समुन्द्र बन गया है या यूँ कहें कि उनके और राक्षसो के बीच में यदि समुन्द्र न होता तो अब तक राक्षस उन्हे मारकर खा गए होते. फिर उन तपस्वियो की बात बता, जिनके हृदय में  मेरा बड़ा डर है.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्री रामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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