Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-16…

विभीषण का भगवान् श्रीरामजी की शरण के लिए प्रस्थान और शरण प्राप्ति

दोहा :-

रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।

मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि ।।

वालव्याससुमनजीमहाराज

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, श्रीरामचंद्रजी संकल्प एवं  सर्वसमर्थ प्रभु है. हे रावण तुम्हारी सभा काल के वश है. अतः मै अब श्रीरघुवीर की शरण जाता हूँ, मुझे दोष न देना.

चौपाई :-

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।

साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, ऐसा कहकर विभीषणजी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गए. शिवजी कहते है –  हे भवानी साधू का अपमान ही संपूर्ण कल्याण का नाश कर देता है.

रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।

चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, रावण ने जिस क्षण विभीषण को त्यागा, उसी क्षण वह अभागा ऐश्र्वर्य से हीन हो गया. विभीषणजी हर्षित होकर मन में अनेको मनोरथ करते हुए श्रीरघुनाथ जी के पास चले.

देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।

जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, मैं जाकर भगवान् के कोमल और लाल वर्ण के सुन्दर चरण कमलो के दर्शन करूँगा, जो सेवको को सुख देने वाले है, जिन चरणो का स्पर्श पाकर ऋषि पत्नी अहल्या तर गई और जो दंडकवन को पवित्र करने वाले है.

जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।

हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जिन चरणो को जानकी जी ने हृदय में धारण कर रखा है, जो कपटमृग के साथ पृथ्वी पर ( उसे पकड़ने को ) दौड़ थे और जो चरणकमल साक्षात् शिवजी के हृदय रूपी सरोवर मे विराजते है, मेरा अहोभाग्य है कि उन्ही को आज मैं देखूँगा.

दोहा :-

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।

ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जिन चरणो की पादुकाओ में भरतजी ने अपना मन लगा रखा है, अहा ! आज मैं उन्ही चरणो को अभी जाकर इन नेत्रो से देखूँगा.

चौपाई :-

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।

कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, इस प्रकार प्रेमसहित विचार करते हुए वे शीघ्र ही समुन्द्र के इस पार जिधर श्रीरामचन्द्रजी की सेना थी वहाँ आ गए. वानरो ने विभीषण को आते देखा तो उन्होने जाना कि शत्रु का कोई खास दूत है.

ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, उन्हे पहरे पर ठहराकर वे सुग्रीव के पास आए और उनको सब समाचार कह सुनाए. सुग्रीव ने श्रीरामचंद्रजी के पास जाकर कहा – हे रघुनाथ जी ! सुनिए, रावण का भाई आप से मिलने आया है.

कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।

जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने कहा – हे मित्र ! तुम्हारी क्या राय है? वानरराज सुग्रीव ने कहा – हे महाराज ! सुनिए, राक्षसो की माया जानी नही जाती है. यह इच्छानुसार रूप बदलने वाला न जाने किस कारण आया है.

भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।

सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि,जान पड़ता है यह मूर्ख हमारा भेद लेने आया है, इसलिए मुझे तो यही अच्छा लगता है कि इस बाँधकर रखा जाए. तब श्रीरामचंद्रजी ने कहा –  हे मित्र ! तुमने नीति तो अच्छी विचारी, परन्तु मेरा प्रण तो है शरणागत के भय को हर लेना है.

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, प्रभु के वचन सुनकर हनुमान् जी प्रसन्न हुए और मन ही मन में कहने लगे कि भगवान कैसे शरण में आये हुए पर पिटा की ही भाँती प्रेम करने वाले हैं.

दोहा :-

सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।

ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, श्रीरामचंद्रजी जो मनुष्य अपने अहित का अनुमान करके शरण में आए हुए का त्याग कर रहे है, वे क्षुद्र है, पापमय है, उन्हे देखने में भी हानि है या यूँ कहें कि पाप लगता है.

चौपाई :-

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जिसे करोड़ो ब्राह्मणो की हत्या लगी हो, शरण में  आने पर मै उसे भी नही त्यागता. जीव ज्यों ही मेरे सम्मुख होता है, त्यों ही उसको करोड़ो जन्मो के पाप नष्ट हो जाते है.

पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।

जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, पापी का यह सहज स्वभाव होता है कि मेरा भजन उसे कभी नही सुहाता. यदि वह रावण का भाई निश्चय ही दुष्ट हृदय का होता तो क्या वह मेरे सम्मुख आ सकता था?

निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।

भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा  ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है. मुझे कपट और छल-छिद्र नही सुहाते. यदि उसे रावण ने भेद लेने को भेजा है, तब भी हे सुग्रीव. अपने को कुछ भी भय या हानि नही है.

जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।

जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, क्योकि हे सखे ! जगत में जितने भी राक्षस है, लक्ष्मण क्षणभर में उन सबको मार सकते है और यदि वह भयभीत होकर मेरी शरण आया है तो मैं तो उसे प्राणो की तरह रखूँगा.

दोहा :-

उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।

जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, कृपा के धाम श्रीरामचंद्रजी ने हँसकर कहा – दोनो ही स्थितियो में उसे ले आओ. तब अंगद और हनुमान् सहित सुग्रीव जी कपालु श्रीरामचंद्रजी की जय हो , कहते हुए चले.

चौपाई :-

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।

दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, विभीषणजी को आदर सहित आगे करक वानर फिर वहाँ चले, जहाँ करूणा की खान श्रीरघुनाथजी ने नेत्रो को आनन्द का दान देने वाले अत्यंत सुखद दोनो भाइयो को विभीषणजी ने दूर से ही देखा.

बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।

भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, फिर शोभा के धाम श्रीरामचंद्रजी को देखकर वे पलक रोककर ठिठककर एकटक देखते ही रह गए. भगवान् की विशाल भुजाएँ है लाल कमल के समान नेत्र है और शरणागत के भय का नाश करने वाला साँवला शरीर है.

सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।

नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, सिंह के समान कंधे है, विशाल चौड़ी छाती  अत्यंत शोभा दे रहा है. असंख्य कामदेवो के मन को मोहित करने वाला मुख है. भगवान् के स्वरूप को देखकर विभीषणजी के नेत्रो में जल भर आया और शरीर अत्यंत पुलकित हो गया. फिर मन में धीरज धरकर उन्होने कोमल वचन कहे.

नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।

सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे नाथ ! मै दशमुख रावण का भाई हूँ. हे देवताओ के रक्षक ! मेरा जन्म राक्षस कुल मे हुआ है. मेरा तामसी शरीर है, स्वभाव से ही मुझे पाप प्रिय है, जैसे उल्लू को अंधकार पर सहज स्नेह होता है.

दोहा :-

श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।

त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, मै अपने कानो से आपका सुयश सुनकर आया हूँ कि प्रभु आप जन्म-मरण के भय का नाश करने वाले है ! हे दुखियो के दुःख दूर करने वाले और शरणागत को सुख देने वाले श्रीरघुवीरजी ! मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए.

चौपाई :-

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।

दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, प्रभु ने उन्हे ऐसा कहकर दंडवत् करते देखा तो वे अत्यंत खुश होकर तुरंत उठे . विभीषणजी के विनम्र वचनों (बातों) कों सुनने पर प्रभु के मन को अच्छा लगा. उन्होंने  अपनी विशाल भुजाओ से पकड़कर उनको हृदय से लगा लिया.

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।

कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, छोटे भाई लक्ष्मण जी सहित गले मिलकर उनको अपने पास बैठाकर श्रीरामचंद्रजी भक्तो के भय को हरने वाले वचन बोले – हे लंकेश ! परिवार सहित अपनी कुशल कहो, तुम्हारा घर अच्छी निवास पर नहीं है.

खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।

मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, दिन-रात दुष्टो की मंडली मे रहते हो. ऐसी दशा में हे सखे ! तुम्हारा धर्म किस प्रकार निभता (पूर्ण होता) है? मैं तुम्हारी सभी  रीति (आचार-व्यवहार ) जानता हूँ. तुम अत्यंत नीतिनिपुण हो, तुम्हें अन्याय पसंद नहीं है.

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।

अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे तात ! नरक में रहना अच्छा है, परन्तु विधाता (भगवान) दुष्ट का साथ कभी न दे. विभीषण जी ने कहा – हे रघुनाथ जी ! अब आपके चरणो का दर्शन कर कुशल से हूँ , जो आपने अपना सेवक जानकर मुझ पर दया की है.

दोहा :-

तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।

जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, कोई भी व्यक्ति तब-तक निपुण नहीं है और ना ही स्वप्न में भी शान्ति है जब तक वो व्यक्ति काम, क्रोध, लोभ और कामना को छोड़कर प्रभु श्रीरामचन्द्र को नहीं भजता है.

चौपाई :-

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।

जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, लोभ, मोह, डाह, मद और मान आदि अनेको दुष्ट तभी तक हृदय में बसते है, जब तक कि धनुष-बाण और कमर में तरकस धारण किए हुए    श्रीरघुनाथ जी हृदय में नहीं बसते हैं.

ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।

तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं ।।

अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, ममता पूर्ण अँधेरी रात है, जो राग-द्वेष रूपी उल्लुओ को सुख देने वाली है. वह ममता रूपी रात्रि तभी तक जीव के मन में बसती (रहती) है , जबतक प्रभु का प्रताप रूपी सूर्य उदय नहीं होता है.

तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला ।।

मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे श्री राम जी ! आपके चरणारविन्द के दर्शन कर अब मै प्रसन्न से हूँ, मेरी सारी परेशानी और भय दूर हो गए हैं. हे कृपालु ! आप जिस पर कृपा करते हैं, उसके तीनो प्रकार के भवशूल ( आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक ताप) स्वत: ही नष्ट हो जातें हैं.

जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, मै अत्यंत नीच स्वभाव का राक्षस हूँ. मैने कभी शुभ आचरण भी नहीं किया है. ऋषि- मुनियो का रूप ध्यान करने पर भी नहीं आता है  फिर भी प्रभु ने स्वयं हर्षित (खुश) होकर मुझे हृदय से लगा लिया.

दोहा :-

अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।

देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे कृपा और सुख के पुंज श्रीरामचंद्रजी ! मेरा अत्यंत और असीम सौभाग्य है, जो मैंने ब्रह्मा और शिवजी के द्वारा सेवित युगल चरण कमलो को अपने आँखों से देखा.

चौपाई :-

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ ।।

जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, श्री राम जी ने कहा – हे सखा ! सुनो, मै तुम्हे अपना स्वभाव कहता हूँ , जिसे काकभुशुण्डि, शिवजी और पार्वती जी भी जानती है. कोई मनुष्य संपूर्ण ज़ड़ –चेतन जगत् का द्रोही हो , यदि वह भी भयभीत होकर मेरी शरण में आ जाए.

तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।

जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, और मद, मोह तथा नाना प्रकार के छल-कपट त्याद दे, तो मैं उसे बहुत शीघ्र साधु के समान कर देता हूँ. माता-पिता, भाई,पुत्र, स्त्री, शरीर, धन, घर, मित्र और परिवार…

सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।

समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, इस सबको ममत्व रूपी धागों को बटोरकर और उन सबकी एक डोरी बनाकर उसके द्वारा जो अपने मन को मेरे चरणो में बाँध देता है. सारे सांसारिक संबंधो का केन्द्र मुझे बना लेता है, जो समद्रशी है, जिसे कुछ की भी इच्छा नही है और जिसके मन में हर्ष, शोक और भय नहीं है…

अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।

तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, ऐसा सज्जन मेरे हृदय में बसता है, जैसे लोभी के हृदय में धन का बास होता है. तुम जैसे सरीखे संत ही मुझे प्रिय है. मैं किसी और के देह को धारण नहीं करता हूँ.

दोहा :-

सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।

ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जो साकार भगवान् के उपासक है, दूसरे के हित में  लगे रहते है, नीति और नियमो में दृढ़ है और जिन्हे ब्राह्मणो के चरणो में प्रेम है, वे मनुष्य मेरे प्राणो के समान है.

चौपाई :-

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।

राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे लंकापति ! सुनो, तुम्हारे अन्दर उपर्युक्त सब गुण है. इससे तुम मुझे अत्यंत ही प्रिय हो. श्रीरामचंद्रजी के वचन सुनकर सब वानरो के समूह कहने लगे – कृपा के समूह श्रीरामचंद्रजी की जय हो.

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।

पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ।।

सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, प्रभु की वाणी सुनते है और उसे कानो के लिए अमृत जानकर विभीषणजी अघाते नही है. वे बार-बार श्रीरामचंद्रजी के चरण कमलो को पकड़ते है अपार प्रेम है, हृदय में समाता नही है.

उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही ।।

अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, विभीषण जी ने कहा –  हे देव ! हे चराचर जगत् के स्वामी ! हे शरणागत के रक्षक ! हे सबके हृदय के भीतर की जानने वाले. सुनिए, मेरे हृदय में पहले से कुछ वासना थी. लेकिन, वो प्रभु के चरणो की प्रीति रूपी नदी में बह गई.

एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा ।।

जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, अब तो हे कृपालु ! शिवजी के मन को सदैव प्रिय लगने वाली अपनी पवित्र भक्ति मुझे दीजिए. ‘ ऐसा ही हो ’  कहकर रणधीर प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने तुरन्त ही समुन्द्र का जल माँगा.

अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, और कहा – हे सखा ! यद्यपि तुम्हारी इच्छा नही है, पर जगत् में मेरा दर्शन अमोघ है वह निष्फल नहीं जाता है ऐसा कहकर श्रीरामचंद्रजी ने उनको राज तिलक कर दिया. आकाश से पुष्पो की अपार वृष्टि (वर्षा) हुई.

दोहा :-

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।

जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, श्रीरामचंद्रजी ने रावण की क्रोध रूपी अग्नि में, जो अपनी (विभीषण की) वचन रूपी पवन से प्रचन्ड हो रही थी, जलते हुए विभीषण को बचा लिया और उसे अखंड राज्य दिया.

जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।

सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, शिवजी ने जो संपत्ति रावण को दसो सिरो की बलि देने पर दी थी, वही संपत्ति श्रीरघुनाथजी ने विभीषण को बहुत सकुचते हुए दी.

चौपाई :-

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।

निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, ऐसे परम कृपालु प्रभु को छोड़कर जो मनुष्य दूसरे को भजते है, वे बिना सींग-पूँछ के पशु है. अपना सेवक जानकर विभीषण को श्रीरामचंद्रजी ने अपना लिया. प्रभु का यह स्वभाव देखकर वानरकुल के मन को आनंदित किया.

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहि त उदासी।।

बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, फिर सब कुछ जानने वाले, सबके हृदय में बसने वाले, सर्वरूप, सबसे रहित, उदासीन, भक्तो पर कृपा करने के लिए मनुष्य बने हुए तथा राक्षसो के कुल का नाश करने वाले श्रीरामचंद्रजी नीति की रक्षा करने वाले वचन बोले.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्री रामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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