सुन्दरकाण्ड-15… - Gyan Sagar Times
Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-15…

रावण को विभीषण का समझाना और विभीषण का अपमान…

दोहा :-

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।

राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास ।। 

वालव्याससुमनजीमहाराज

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, मंत्री, वैद्य और गूरू – ये तीन यदि अप्रसन्नता के भय या लाभ की आशा से हित की बात न कहकर प्रिय बोलते है तो राज्य, शरीर और धर्म- इन तीन का शीघ्र ही नाश हो जाता है.

चौपाई :-

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।

अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, रावण के लिए भी वही संयोग आ बनी है. मंत्री उसे सुना-सुनाकर स्तुति करते है. ठीक उसी समय अवसर जानकर विभीषण जी आए और उन्होने बड़े भाई के चरणो में सिर नवाया.

पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।

जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, फिर से सिर नवाकर अपने आसन पर बैठ गए और आज्ञा पाकर ये वचन बोले – हे कृपाल जब आपने मुझसे राय पूछी ही है, तो हे तात ! मै अपनी बुद्धि के अनुसार आपके हित की बात कहता हूँ.

जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।

सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जो मनुष्य अपना कल्याण, सुन्दर यश, सुबुद्धि, शुभ गति और नाना प्रकार के सुख चाहता हो, वह हे स्वामी ! परस्त्री के ललाट को चौथ के चन्द्रमा की तरह त्याग दे.

चौदह भुवन एक पति होई। भूत द्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।

गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, चौदहो भुवनो का एक ही स्वामी हो, वह भी जीवो से वैर करके ठहर नही सकता वो नष्ट हो जाता है. जो मनुष्य गुणो का समुन्द्र और चतुर हो , उसे चाहे थोड़ा भी लोभ क्यो न हो, तो भी कोई भला नही कहता.

दोहा :-

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।

सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे नाथ ! काम, क्रोध, मद और लोभ – ये सब नरक के रास्ते है, इन सबको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी को भजिए, जिन्हे संत भजते है.

चौपाई :-

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।

ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे तात ! राम मनुष्यो के ही राजा नही है. वे तो  समस्त लोको के स्वामी और काल के भी काल है. वे ही सम्पूर्ण ऐश्र्वर्य, यश, श्री, वैराग्य, एवं ज्ञान के भंडार और भगवान् है, वे निरामय ( विकाररहित ), अजन्मे, व्यापक, अजेय, अनादि और अनन्त ब्रह्म है.

गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।

जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, उनकी कृपा के समुन्द्र भगवान् ने पृथ्वी, ब्राह्मण, गो और देवताओ का हित करने के लिए ही मनुष्य शरीर धारण किया है. हे भाई ! सुनिए, वे सेवको को आनन्द देने वाले, दुष्टो के समूह का नाश करने वाले वेद तथा धर्म की रक्षा करने वाले है.

ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।

देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, वैर त्यागकर उनकी शरण में जाइए. श्रीरघुनाथजी शरणागत का दुःख दूर करने वाले है. हे नाथ! जानकीजी को प्रभु! कोप दे दीजिए और बिना ही कारण स्नेह करने वाले श्रीरामचन्द्रजी को भजिए.

सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।

जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जिसे संपूर्ण जगत् से द्रोह करने का पाप लगा है, उनके शरण में जाने पर प्रभु उसका भी त्याग नही करते. जिसका नाम तीनो तापो का नाश करने वाला है, वे ही प्रभु मनुष्य रूप मे प्रकट हुए है. हे रावण ! हृदय में यह समझ लीजिए.

दोहा :-

बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।

परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे दशशीश ! मै बार-बार आपके चरण लगता हूँ और विनती करता हूँ कि मान, मोह और मद को त्यागकर आप कोसलपति श्रीरामजी का भजन कीजिए.

मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।

तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, मुनि पुलस्त्यजी ने अपने शिष्य के हाथ यह बात कहला भेजी है. हे तात अवसर बहुत ही अच्छा है इसीलिए मैंने जल्दी ही आकर आपको यह बात आपसे बता दी.

चौपाई :-

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना ।।

तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, माल्यवान् नाम का एक बहुत ही बुद्धिमान मंत्री था. उसने विभीषण के वचन को सराहते हुए कहा–  हे तात ! आपके छोटे भाई की नीति को भूषण रूप मे धारण करने वाले अर्थात् नीतिमान है. विभूषण जो कुछ कह रहे है उसे हृदय मे धारण कर लीजिए.

रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ ।।

माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, तब रावन ने कहा – ये दोनो मूर्ख शत्रु की महिमा बखान रहे है. यहाँ कोई है? इन्हे दूर करो ना ! तब माल्यबान तो घर लौट गए! और बिभीषणजी हाथन जोड़कर फिर से कहने लगे.

सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं ।।

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे नाथ ! पुराण और वेद ऐसा कहते है कि सुबुद्धि और कुबुद्धि सबके हृदय मे रहती है, जहाँ सुबुद्धि है, वहाँ नाना प्रकार की संपदाएँ रहती है और जहाँ कुबुद्धि है वहाँ परिणाम मे विपत्ति यानी दुःख रहती है.

तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ।।

कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, आपके हृदय मे उलटी बुद्धि आ बसी है. इसी से आप हित को अहित और शत्रु को मित्र मान रहे है. जो राक्षस कुल के लिए कालरात्रि के समान  है, उन सीता पर आपकी बड़ी प्रीति है.

दोहा :-

तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार ।

सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे तात ! मै चरण पकड़कर आपसे भीख माँगता हूँ या यूँ कहें कि विनती करता हूँ कि आप मेरा दुलार रखिए और श्रीरामचन्द्रजी को सीताजी दे दीजिए, जिसमे आपका अहित न हो.

चौपाई :-

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।

सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, विभीषण ने पंडितो, पुराणो और वेदो द्वारा अनुमोदित वाणी से नीति बखानकर कही. पर उसे सुनते ही रावण क्रोधित होकर उठा और बोला कि रे दूष्ट ! अब मृत्यु तेरे निकट आ गई है.

जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।

कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, अरे मूर्ख ! मेरे ही अन्न से पल रहा है. पर हे मूढ़ ! तुझे शत्रु का ही अच्छा लगता है. अरे दुष्ट ! बता न, जगत् मे ऐसा कौन है जिसे मैने अपनी भुजाओ के बल से न जीता हो?

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।

अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, मेरे नगर में रहकर प्रेम करता है तपस्वियो पर. मूर्ख ! उन्ही से जा मिल और उन्ही को नीति बता. ऐसा कहकर रावण ने उन्हे लात मारी, परन्तु छोटे भाई विभीषण ने रावण के मारने पर भी बार-बार उसके चरण ही पकड़े.

उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।

तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, शिवाजी कहते है – हे उमा ! संत की यही बड़ी महिमा है कि वे बुराई करने पर भी भलाई ही करते है. विभीषणजी ने कहा –  आप मेरे पिता के समान है, मुझे मारा सो तो अच्छा ही किया, परन्तु हे नाथ भला हो आपका! अगर आप श्रीरामचन्द्रजी का नाम उच्चारण करते हैं तो इसमें आपकी ही भलाई है.

सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, इतना कहकर विभीषण अपने मंत्रियो को साथ लेकर आकाश मार्ग में गए और सबको सुनाकर वे ऐसा कहने लगे.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्री रामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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