Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-12…

…समुन्द्र के इस पार आना, सबका लौटना, मधुवन प्रवेश…

चौपाई :-

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।

नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, चलते समय उन्होने महाध्वनि से भारी गर्जन किया, जिसे सुनकर

वालव्याससुमनजीमहाराज

राक्षसो की स्त्रियो के गर्भ गिरने लगे. उसके बाद समुन्द्र लाँघकर वे इस पार आए और उन्होने वानरो को किलकिला शब्द सुनाया.

हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।

मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हनुमानजी को देखकर सब हर्षित हो गए और तब वानरो ने अपना नया जन्म समझा. हनुमानजी का मुख प्रसन्न है और शरीर मे तेज विराजमान है, जिससे उन्होने समझ लिया कि ये श्रीरामचन्द्रजी का कार्य कर आए है.

मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।

चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, सब हनुमान् जी से मिले और बहुत ही सुखी हुए, जैसे तड़पती हुई मछली को जल मिल गया हो. सब हर्षित(खुश) होकर नए-नए वृत्तांत पूछते -पूछते हुए श्रीरघुनाथजी के पास चले.

तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।

रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, तब सब लोग मधुवन के भीतर आए और अंगद की सम्मति से सबने मधुर फल या (मधु और फल ) खाए. जब रखवाले बरजने लगे, तब घूँसो की मार मारते ही सब रखवाले भाग गए.

दोहा :-

जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।।

सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, उन सबने जाकर पुकारा कि युवराज अंगद वन उजाड़ रहे है. यह सुनकर सुग्रीव हर्षित (खुश) हुए कि वानर प्रभु का कार्य कर आए है.

चौपाई :-

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।

एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, यदि सीताजी की खबर न पाई होती तो क्या वे मधुवन के फल खा सकते थे ? इस प्रकार राजा सुग्रीव मन मे विचार कर ही रहे थे कि समाज सहित वानर आ गए.

आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।

पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, सबने आकर सुग्रीव के चरणो से सिर नवाया. कपिराज सुग्रीव सभी से बड़े प्रेम के साथ मिले और उन्होने कुशल पुछी, तब वानरो ने उत्तर दिया कि – आपके चरणों के दर्शन से सब कुशल है. श्रीरामजी की कृपा से विशेष कार्य में  विशेष सफलता मिली है.

नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।

सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे नाथ ! हनुमान ने सब कार्य किया और सब वानरो के प्राण बचा लिए. यह सुनकर सुग्रीव जी हनुमानजी से फिर मिले और सब वानरो समेत श्रीरघुनाथजी के पास चले.

राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।

फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, श्रीरामजी ने जब वानरो को कार्य किए हुए आते देखा तब उनके मन मे विशेष हर्ष हुआ. दोनो भाई स्फटिक शिला पर बैठे थे. सब वानर जाकर उनके चरणो पर गिर पड़े.

दोहा :-

प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।

पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, दया के सागर श्रीरघुनाथजी सबसे प्रेम सहित गले लगकर मिले और  कुशल पूछी.  वानरो ने कहा – हे नाथ ! आपके चरण कमलो के दर्शन पाने से अब कुशल है.

चौपाई :-

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।

ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जाम्बंत ने कहा – हे रघुनाथ जी ! सुनिए ! हे नाथ ! जिस पर आप दया करते है, उसे सदा कल्याण और निरंतर कुशल रहते है. देवता, मनुष्य और मुनि सभी उस पर प्रसन्न रहते है.

सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।

प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, वही विजयी है, वही विनयी है और वही गुणो का समुन्द्र बन जाता है. उसी का सुन्दर यश तीनो लोको मे प्रकाशित होता है. प्रभु की कृपा से सब कार्य हुआ. आज हमारा जन्म सफल हो गया.

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।

पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे नाथ ! पवनपुत्र हनुमान ने जो कार्य किया है, उसका हजार मुखो से भी वर्णव नही किया जा सकता है. तब जाम्बंत ने हनुमानजी के  सुन्दर चरित्र(कार्य) श्रीरघुनाथजी को सुनाए.

सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।

कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, उन कार्यों के सुनने पर कृपानिधि श्रीरामचन्द्रजी के मन को बहुत ही अच्छे लगे और उन्होने हर्षित होकर हनुमानजी को फिर हृदय से लगा लिया और कहा – हे तात ! कहो, सीता किस प्रकार रहती और अपने प्राणो की रक्षा करती है?

दोहा :-

नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हनुमानजी ने कहा – आपका नाम रात-दिन पहरा देने वाला है, आपका ध्यान ही किंवाड़ है. नेत्रो को अपने चरणो मे लगाए रहती है, यही ताला लगा है, फिर प्राण जाएँ तो किस मार्ग से?

चौपाई :-

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।

नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, चलते समय उन्होने मुझे चूड़ामणि उतारकर दी. श्रीरघुनाथजी ने उसे लेकर हृदय से लगा लिया. हनुमानजी ने फिर कहा हे अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।

मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, छोटे भाई समेत प्रभु के चरण पकड़ना और कहना कि आप दीनबंधु है, शरणागत के दुःखो को हरने वाले है और मै मन, वचन और कर्म से आपके चरणो की अनुरागिणी हूँ. फिर स्वामी आप ने मुझे किस अपराध से त्याग दिया?

अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।

नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हाँ  एक दोष मै अपना अवश्य मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नही चले गए, किंतु हे नाथ !  यह तो नेत्रो का अपराध है जो प्राणो के निकलने मे हठपूर्वक बाधा देते है.

बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।

नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, विरह अग्नि है, शरीर रूई है और श्र्वास पवन है, इस प्रकार अग्नि और पवन का संयोग होने से यह शरीर क्षणमात्र मे जल सकता है, परन्तु नेत्र अपने हित के लिए प्रभु का स्वरूप देखकर सुखी होने के लिए जल ( आँसू ) बरसाते है, जिससे विरह की आग से भी देह जल नही पाती.

सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, सीता जी विपत्ति बहुत बड़ी है. हे दीनदयालु ! वह बिना कही रही अच्छी है कहने से आपको बड़ा क्लेश होगा.

दोहा :-

निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।

बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे करूणानिधान ! उनका एक-एक पल कल्प के समान बीतता है. अतः हे प्रभु ! तुरन्त चलिए और अपनी भुजाओ के बल से दुष्टो के दल को जीतकर सीता जी को ले आइए.

चौपाई :-

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।

बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, सीता जी का दुःख सुनकर सुख के धाम प्रभु के कमल नेत्रो मे जल भर आया और वे बोले – मन, वचन और शरीर से जिसे मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय ) है, उसे क्या स्वप्न में भी विपत्ति हो सकती है?

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।

केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हनुमान् जी ने कहा – हे प्रभु ! विपत्ति तो वही  है जब आपका भजन-स्मरण न हो. हे प्रभु ! राक्षसो की बात ही कितनी है ? आप शत्रु को जीतकर जानकीजी को ले आवेंगे.

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।

प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, भगवान् कहने लगे हे हनुमान् ! सुनो , तेरे समान मेरा उपकारी देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी शरीरधारी नही है. मै तुम्हारा प्रत्युपकार (बदले मे उपकार) के लिए क्या करूँ, मेरा मन भी तुम्हारे सामने नही हो सकता.

सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।

पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे पुत्र ! सुन, मैने मन में विचार करके देख लिया कि मै तुझमे उऋण नही हो सकता. देवताओ के रक्षक प्रभु बार-बार हनुमानजी को देख रहे है. नेत्रो मे प्रेमाश्रुओ का जल भरा है और शरीर अत्यंत पुलकित है.

दोहा :-

सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।

चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, प्रभु के वचन सुनकर और उनके प्रसन्न मुख तथा पुलकित अंगो को देखकर हनुमानजी हर्षित हो गए और प्रेम मे विकल होकर ‘ हे भगवान् ! ’ मेरी रक्षा करो, रक्षा करो कहते हुए श्रीरामचन्द्रजी के चरणो मे गिर पड़े.

चौपाई :-

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।

प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, प्रभु उनको बार-बार उठाना चाहते है, परन्तु प्रेम मे डूबे हुए हनुमानजी को चरणो से उठना सुहाता नही. प्रभु का करकमल हनुमानजी के सिर पर है. उस स्थिति का स्मरण करके शिवजी प्रेममग्न हो गए.

सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।

कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, फिर मन को सावधान करके शंकरजी अत्यंत सुन्दर कथा कहने लगे – हनुमानजी को उठाकर प्रभु ने हृदय से लगाया और हाथ पकड़कर अत्यंत निकट बैठा लिया.

कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।

प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे हनुमान ! बताओ तो, रावण के द्वारा सुरक्षित लंका और उसके बड़े बाँके किले को तुमने किस तरह जलाया ? हनुमान् जी ने प्रभु को प्रसन्न जाना और वे अभिमान रहित वचन बोले.

साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।

नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, बंदर का बस, यही बड़ा पुरूषार्थ है कि वह एक डाल से दूसरी डाल पर चला जाता है. मैने जो समुन्द्र लाँघकर सोने का नगर जलाया और राक्षसगण को मारकर अशोक वन को उजाड़ डाला.

सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, यह सब तो हे श्रीरघुनाथजी ! आप ही का प्रताप है. हे नाथ ! इसमे मेरी प्रभुता कुछ भी नही है.

दोहा :-

ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।

तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे प्रभु ! जिस पर आप प्रसन्न हो, उसके लिए कुछ भी कठिन नही है. आपके प्रभाव से रूई जो स्वयं बहुत जल्दी जल जाने वाली वस्तु है, बड़वानल को निश्चय ही जला सकती है या यूँ कहें कि असंभव भी संभव हो सकता है.

चौपाई :-

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।

सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे नाथ ! मुझे अत्यंत सुख देने वाली अपनी निश्चल भक्ति करके दीजिए. हनुमानजी की अत्यंत सरल वाणी सुनकर, हे भवानी ! तब प्रभु श्रीरामचंद्रजी ने ‘एवमस्तु’ (ऐसा ही हो)- कहा.

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हे उमा ! जिसने श्रीरामचंद्रजी का स्वभाव जान लिया. उसे भजन छोड़कर दूसरी बात ही नही सुहाती है. यह स्वामी-सेवक का संवाद जिसके ह्रदय मे आ गया, वही श्रीरघुनाथजी के चरणो की भक्ति पा गया.

सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।

तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, प्रभु के वचन सुनकर वानरगण कहने लगे – कृपालु आनंदकंद श्रीरामचंद्रजी की जय हो जय हो, जय हो ! तब श्रीरघुनाथजी ने कपिराज सुग्रीव को बुलाया और कहा – चलने की तैयारी करो.

अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।

कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, अब विलंब किस कारण किया जाए. वानरो को तुरंत आज्ञा दो. भगवान् की यह लीला (रावणवध की तैयारी) देखकर, बहुत से फूल बरसाकर और हर्षित होकर देवता आकाश से अपने-अपने लोक को चले.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्री रामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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