Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-10…

…लंकादहन…

दोहा :-

कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।

तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ ।। 

वालव्याससुमनजीमहाराज

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, मै सबको समझाकर कहता हूँ कि बंदर की ममता पूँछ पर होती है. अतः तेल में कपड़ा डुबोकर उसे उसकी पूँछ मे बाँधकर फिर आग लगा दो.

चौपाई :-

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।

जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँ मैं तिन्ह कै प्रभुताई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, जब बिना पूँछ का यह बंदर अपने स्वामी के पास जाएगा, तब यह मूर्ख अपने मालिक को साथ ले आएगा. जिसकी इसने बहुत बड़ाई होगी, मै भी तो जरा उनकी प्रभुता को देखूँ !

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।

जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, यह वचन सुनते ही हनुमानजी मन में हीं मुस्कुराए मैं जान गया, सरस्वती जो सहायक हुई है. रावण के वचन सुनकर मूर्ख राक्षस वही तैयारी करने लगे.

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।

कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हनुमानजी के पूँछ को लपेटने में इतना घी-तेल और कपडा लगा कि नगर में कपड़ा, घी और तेल समाप्त हो गया. महावीर ने ऐसा खेल किया कि पूँछ लम्बी हो गई. जिसे देखने के लिए नगरवासी के लोग आए और वे हनुमानजी को पैर से ठोकर मारते हुये उनकी हँसी करते है.

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।

पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, ढोल बजाते और ताली पीटते हुए हनुमानजी को नगर में घुमा-फिराकर, फिर पूँछ में आग लगा दी. अग्नि को जलते हुए देखकर हनुमानजी तुरन्त ही बहुत छोटे रूप में हो गए.

निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, और बंधन से निकलकर वे सोने की अटारियो पर जा चढ़े. जिसे देखकर राक्षसो की स्त्रियाँ भयभीत हो गई.

दोहा :-

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।

अट्टहास करि गर्ज कपि बढ़ि लाग अकास ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, उस समय भगवान् की प्रेरणा से उनचासो पवन चलने लगे. हनुमानजी अट्टहास करके गर्जे और बढ़कर आकाश से जा लगे.

चौपाई :-

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।

जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, हनुमानजी की देह बड़ी विशाल, परन्तु बहुत ही फुर्तीली है. वे दौड़कर एक महल से दूसरे महल पर चढ़ जाते है. नगर जल रहा है लोग बेहाल हो गए है. आग की करोड़ो भंयकर लपटे झपट रही है.

तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।

हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, चारों ओर चीख पुकार मची है हाय बप्पा ! हाय मैया ! के शोर सुनाई पड़ रही हैं. इस अवसर पर हमें कौन बचाएगा? चारो और यही पुकार सुनाई पड़ रही है. हमने तो पहले ही कहा था कि यह वानर नही है, वानर का रूप धरे कोई देवता है!

साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।

जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, साधु के अपमान का यह फल है कि नगर अनाथ की तरह जल रहा है. हनुमानजी ने एक ही क्षण में हीं सारे नगर को जला डाला. एक विभीषण का घर नही जलाया.

ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।

उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी ।।

श्लोक का अर्थ बताते हुए महाराजजी कहते है कि, शिवाजी कहते है – हे पार्वती ! जिन्होने अग्नि को बनाया, हनुमानजी उन्हीं के दूत है. इसी कारण वे अग्नि से नहीं जले. हनुमानजी ने उलट-पलटकर सारी लंका जला दी. फिर वे समुन्द्र में कूद पड़े.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्री रामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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