सुन्दरकाण्ड-07… - Gyan Sagar Times
Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-07…

...माता सीता-हनुमान संवाद...

सोरठा :-

कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।

जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी ने हृदय में काफी  विचार कर माता सीता के सामने अँगूठी डाल दी, मानो ऐसा लगा कि अशोक ने अंगारा दे दिया.  वहीँ माता सीता ने खुश प्रसन्न होकर अपने हाथों में ले लिया.

 चौपाई :-

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।

चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी ।।

वालव्याससुमनजीमहाराज,

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, माता ने राम-नाम अंकित अत्यंत सुंदर और मनोहर अँगूठी देखी और पहचानकर आश्चर्यचकित होकर उसे देखने लगी. माता के हृदय में हर्ष और विषाद के गोते लगाने लगी.

जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।

सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, माता सोचने लगी कि श्रीरघुनाथजी तो सर्वथा अजेय है, उन्हे कौन जीत सकता है ! और माया से ऐसी अँगूठी बनाई नहीं जा सकती. माता अपने मन में अनेक प्रकार के विचार करने लगी. महाराजजी कहते हैं कि, तभी हनुमानजी मीठी वाणी में बोले.

रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।

लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी मीठे वचनों से श्री रामचन्द्रजी के गुणो का वर्णन करने लगे जिनके सुनते ही माता सीता का सारा दुःख भाग गया. महाराजजी कहते हैं कि, माता सीता ने कान और मन को एकाग्र कर ध्यानपूर्वक उन्हें सुनने लगी. वहीँ, हनुमानजी आदि से लेकर अंत तक की सारी कथा सुनाई.

श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।

तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, कथा के अंत में माता सीता ने कहा कि, जिसने कानो के लिए अमृत रूप यह सुन्दर कथा कही, वह हे भाई ! प्रकट क्यो नहीं होते? हनुमानजी यह सुनकर माता के पास आ गए और माता सीता ने हनुमानजी को देखकर फेरकर बैठ गई और माता के मन में आश्चर्य हुआ.

राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।

यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी ने माता सीता से कहा कि हे माता मैं प्रभु श्रीराम का दूत हूँ. हम अपने करुनानिधान की सच्ची शपथ करता हूँ कि हे माता यह अँगूठी ‘मैं’ ही लाया हूँ. हनुमानजी ने कहा कि माता प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने मुझे यह निशानी पहचान कराने के लिए दिया है.

नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, माता सीता ने पूछा कि नर और वानर का संग कैसे हुआ बताओ मुझे? तब हनुमानजी ने कहा कि माता जैसे संग हुआ था, वह सब कथा आपको कह सुनाया.

दोहा :-

कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।

जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी के प्रेमयुक वचनों को सुनकर माता सीता को विश्वास हो गया साथ ही उन्होंने जान लिया कि यह मन,वचन और कर्म से कृपासागर श्रीरघुनाथजी का दास है.

चौपाई :-

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।

बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, माता सीता के मन में भगवान का सेवक जानकर अत्यंत गाढ़ी प्रीति हो गई और माता के नेत्रों (आँखों) में खुशी के आँसू छलक गए और शरीर अत्यंत पुलकित हो गया. माता सीता ने कहा कि, हे तात हनुमान् ! विरहसागर मे डूबती हुई मुझको तुम जहाज हो.

अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।

कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, माता सीता ने कहा कि मै बलिहारी जाती हूँ, अब छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित खर के शत्रु सुखधाम प्रभु का कुशल-मंगल कहो. माता ने कहा कि श्रीरघुनाथजी तो कोमल ह्रदय और कृपालु हैं फिर भी हे हनुमान ! उन्होंने किस कारण से निष्ठुरता धारण कर ली है?.

सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।

कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, माता ने कहा कि सेवक को सुख देना उनकी स्वाभाविक शान है. श्रीरघुनाथजी क्या कभी मेरी भी याद करते है?  हे तात ! क्या कभी उनके कोमल साँवले अंगो को देखकर मेरे नेत्र शीतल होगे?

बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।

देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, माता के मुख से वचन नही निकलता और नेत्रो में विरह के आँसुओ का जल भर आया. माता ने बड़े ही दुखी स्वर से बोली हां नाथ ! आपने मुझे विल्कुल ही भुला दिया ! माता सीता को विरह से परम व्याकुल देखकर हनुमानजी सुंदर और मीठे वचनों में कहा.

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता ।।

जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हे माता ! सुन्दर कृपा के धाम प्रभु भाई लक्ष्मणजी के सहित शरीर से कुशल है, परन्तु आपके दुःख से दुःखी है. हे माता ! मन छोटा करके दुःख न कीजिए. श्रीरामचन्द्रजी के ह्रदय में आपसे दुगना प्रेम है.

दोहा :-

रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।

अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हे माता ! अब धीरज धरकर श्री रघुनाथ जी का संदेश सुनिए. ऐसा कहते ही हनुमानजी प्रेम से गदगद हो गए और उनके नेत्रों में खुशी के आँसू छलक गए.

चौपाई :-

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।

नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी ने कहा कि, श्री रामचन्द्रजी ने कहा है कि हे सीते ! तुम्हारे वियोग में मेरे लिए सभी पदार्थ हानिकर हो गए है. वृक्षो के नए-नए कोमल पत्ते मानो अग्नि के समान, रात्रि कालरात्रि के समान, चन्द्रमा सूर्य के समान…

कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।

जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, और कमलो के वन भालो के वन के समान हो गए है. मेघ मानो खौलता हुआ तेल बरसाते है. जो हित करने वाले थे, वे ही अब पीड़ा देने लगे है. शीतल, मंद, सुगंध  वायु (हवा) साँप के श्र्वास के समान जहरीली और गरम हो गई है.

कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।

तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, मन का दुःख कह डालने के बाद भी कुछ बच जाता है, पर कहूँ किससे? यह दुःख कोई नहीं जानता है. हे प्रिये ! मेरे और तेरे प्रेम का रहस्य एक मेरा मन ही जानता है.

सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।

प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, श्रीरघुनाथजी कहतें हैं कि, मेरा मन सदा तेरे पास ही रहता है. बस, मेरे प्रेम का सार इतने में ही समझ ले. प्रभु का संदेश सुनते ही जानकीजी प्रेम में मग्न हो गई और उन्हे शरीर की सुध ही नहीं रही.

कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।

उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी ने कहा कि, हे माता ! हृदय मे धैर्य धारण कीजिये और सेवको को सुख देने वाले श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करें.  श्रीरघुनाथजी की प्रभुता को हृदय में लाईये और मेरे वचन सुनकर कायरता छोड़ दीजिए.

दोहा :-

निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।

जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी ने कहा- राक्षसो के समूह पतंगो के समान और श्रीरघुनाथजी के बाण अग्नि के समान है. अत: हे माता ! हृदय में  धैर्य धारण कीजिये और राक्षसो को जला हुआ ही समझिये.

चौपाई :-

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।

रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, श्रीरामचन्द्रजी ने यदि खबर पाई होती तो वे बिलंब न करते. हे जानकी माता! रामबाण रूप सूर्य के उदय होने पर राक्षसो की सेना रूपी अंधकार कहाँ से रह सकता है?

अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।

कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हे माता ! मै आपको अभी यहाँ से लिवा जाऊँ, पर मुझे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की शपथ है लेकिन, आज्ञा नहीं है. अत: हे माता ! कुछ दिन और धीरज धरो. जल्द ही प्रभु श्रीरामचन्द्रजी वानरो सहित यहाँ आएँगे.

निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।

हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, और राक्षसो को मारकर आपको ले जाएँगे. नारद आदि ऋषि-मुनि तीनो लोको में उनका यश गाएँगे. तब माता सीताजी ने कहा –  हे पुत्र! सब वानर तुम्हारे ही समान नन्हे-नन्हे से होगे , राक्षस तो बड़े बलवान, योद्धा है.

मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।

कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, अतः मेरे हृदय मे बड़ा भारी संदेह होता है  कि तुम जैसे बंदर राक्षसो को कैसे जीतेंगे ! यह सुनकर हनुमान् जी ने अपना शरीर प्रकट किया. सोने के पर्वत ( सुमेरू) के आकार का अत्यंत विशाल शरीर था, जो युद्ध मे शत्रुओ के हृदय मे भय उत्पन्न करने वाला, अत्यंत बलवान् और वीर था.

सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी को देखकर माता सीताजी के मन में विश्वास हुआ. उसके बाद हनुमानजी ने वापस छोटा रूप धारण कर लिया.

दोहा :-

सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।

प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी ने माता सीताजी से कहा कि, हे माता ! सुनो, वानरो मे बहुत बल-बुद्धि नही होती, परन्तु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरूड़ को खा सकता है.

चौपाई :-

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।

आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, भक्ति, प्रताप, तेज और बल से सनी हुई हनुमानजी की वाणी सुनकर सीता जी के मन में संतोष हुआ. तब माता सीताजी ने श्रीरामचन्द्रजी का प्रिय समझकर हनुमानजी को आशीर्वाद दिया कि हे तात ! तुम बल और शील के भंडार (ज्ञाता) हो जाओ.

अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।

करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, माता सीताजी ने कहा कि, हे पुत्र ! तुम अजर (बुढ़ापे से रहित), अमर और गुणो के खजाने हो. श्रीरघुनाथजी तुम पर बहुत कृपा करे. प्रभु कृपा करे ऐसा कानो से सुनते ही हनुमानजी पूर्ण प्रेम मे मग्न हो गए.

बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।

अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी ने बार-बार सीता जी के चरणो मे सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा- हे माता ! अब मै कृतार्थ हो गया. आपका आशीर्वाद अचूक है, यह बात जगत में प्रसिध्द है.

सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।

सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हे माता ! सुनो, सुंदर फल वाले वृक्षो को देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग गई है. तब माता सीताजी ने कहा- हे बेटा ! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते है.

तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, हनुमानजी ने कहा- हे माता !यदि आप प्रसन्न होकर आज्ञा दें तो मुझे उसका भय बिलकुल नहीं है.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्री रामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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