Dhram Sansar

सुन्दरकाण्ड-04…

…हनुमान-विभीषण संवाद…

दोहा:-

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।

नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि,हनुमानजी एक ऐसे महल में पहुंचे जहाँ भगवान श्रीरामचन्द्रजी के आयुध (धनुष-बाण) के चिन्हो से अंकित थे, जिसकी शोभा वर्णन नही की जा सकती है. वहाँ नवीन-नवीन तुलसी के वृक्ष-समूहो को देखकर अंजनीनंदनबहुत ही खुश हुए.

 चौपाई :-

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।

मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा ।।

वालव्याससुमनजीमहाराज,

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, केसरीनंदन अपने मन में तर्क करते हुए सोचने लगे कि लंका तो राक्षसो के समूह का निवास स्थान है. यहाँ सज्जन यानी साधु पुरूष का निवास कैसे संभव है? ठीक उसी समय विभीषणजी की नींद खुल गई या यूँ कहें कि जाग उठे.

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।

एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, जब विभीषणजी की नींद खुली तो उन्होंने सबसे पहले राम नाम का का स्मरण करते हुए उच्चारण किया.और पवनपुत्र ने उन्हें सज्जन जानकार बहुत ही हर्षित हुए. हनुमानजी ने विचार किया कि इनसे हठ करके अपनी ओर से ही परिचय करूँगा, क्योकि साधू से कार्य की हानि नही होती बल्कि लाभ ही होता है.

बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।

करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते है कि, ब्राह्मण का रूप धरकर हनुमान् जी ने उन्हे सुन्दर वचन सुनाए जिसे सुनकर विभीषणजी उठकर वहाँ आये और प्रणाम करके कुशल क्षेम पूछी और कहा कि हे ब्राह्मणदेव! अपनी कथा विस्तारपूर्वक कहिए.

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।

की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि, क्या आप हरिभक्तों में से कोई हैं? क्योकिं आपको देखकर मेरे हृदय में अत्यंत प्रेम उमड़ रहा है. या आप दीनो से प्रेम करने वाले स्वयं श्रीरामजी ही है जो मुझे बड़भागी बनाने घर-बैठे दर्शन देकर कृतार्थ करने आए है?

  दोहा:-

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।

सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि, हनुमान् जी ने श्रीरामचंद्रजी की सारी कथा कहते हुए अपना नाम बताया, जिसे सुनकर दोनों के शारीर पुलकित हो गए और श्रीरामचन्द्रजी के गुणों के समूह को स्मरण करके दोनों के मन प्रेम और आनंद में मग्न हो गए.

 चौपाई :-

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।

तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि, विभीषण ने कहा – हे पवनपुत्र ! मेरी कहानी सुनो. मै यहाँ वैसे ही रहता हूँ जैसे दाँतो के बीच मे बेचारी जीभ. हे तात ! मुझे अनाथ जानकर सूर्यकुल के नाथ श्रीरामचन्द्रंजी क्या कभी मुझ पर भी कृपा करेंगे?

तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।

अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि, मेरा तामसी शरीर होने से साधन तो कुछ बनता नहीं और न मन मे श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलो मे प्रेम ही है, परन्तु हे हनुमान् ! अब मुझे विश्र्वास हो गया कि श्री रामजी की मुझ पर कृपा है, क्योकि हरि की कृपा के बिना संत नही मिलते हैं.

जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।

सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि, जब श्रीरघुवीर ने कृपा की है, तभी तो आपने मुझे हठ करके दर्शन दिए है. तब हनुमानजी के कहा कि – हे विभीषणजी ! सुनिए, प्रभु की यही रीति है कि वे सेवक पर सदा ही प्रेम किया करते है.

कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।

प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि, भला कहिए, मै ही कौन बड़ा कुलीन हूँ? जाति का चंचल वानर हूँ और सब प्रकार से नीच हूँ, प्रातःकाल जो हम लोगो यानी (बंदरो) का नाम ले ले तो उस दिन उसे भोजन न मिले.

दोहा:-

अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।

कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि, हे सखा ! सुनिए, मै ऐसा अधम हूँ, पर श्रीरामचन्द्रजी ने तो मुझ पर भी कृपा ही की है. भगवान् के गुणो का स्मरण करके हनुमानजी के दोनो नेत्रो मे प्रेमाश्रुओ का जल भर आया.

चौपाई :-

जानत हूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।

एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि, जो जानते हुए भी ऐसे स्वामी को भुलाकर भटकते फिरते है, वे दुःखी क्यो न हो ? इस प्रकार श्रीरामजी के गुण समूहो को कहते हुए उन्होने परम शांति प्राप्त की.

पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।

तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता ।।

वाल्व्याससुमनजीमहाराज श्लोक का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि, फिर विभीषणजी ने, श्रीजानकीजी जिस प्रकार वहॉ (लंका में) रहती थी, वह सब कथा कही. तब हनुमान् जी ने कहा— भाई सुनो, मैं जानकी माता को देखना चाहता हूँ.

वालव्याससुमनजीमहाराज, महात्मा भवन,

श्री रामजानकी मंदिर, राम कोट,

अयोध्या. 8544241710.

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