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विचार….

वैश्विक महामारी कोरोना पूरी तरह अभी तक खत्म नहीं हुआ है लेकिन, सांस लेने की आजादी ने…सोचने को विवश भी कर दिया… कहीं ये आजादी का जश्न जिंदगी पर न भारी पड़ जाय…? वर्तमान समय में देवताओं के चिकित्सक का पावन और पवित्र महीना चल रहा है. राज्य में माँ शक्ति की आराधना का बड़े ही धूमधाम से आयोजन किया जा रहा है. विगत दिनों वैश्विक महामारी के कारण इसके आयोजन पर रोक लगी थी. अभी कुछ दिनों पहिले ही वैश्विक महामारी के विकराल रूप को भी देखा…लेकिन कटु अनुभव से सीखा कुछ भी नहीं.

एक तरफ बड़े-बड़े पंडालों व सजावट के साथ-साथ माता व कन्याओं (बेटी) की पूजा कर रहें हैं वहीँ, राज्य में चंद स्लोगन के साथ-साथ कन्यायों, बेटियों और महिलाओं के प्रति सम्मान और आदर-भाव भी दिया जा रहा है. वैसे तो पुरे देश में भी कन्यायों, बेटियों और महिलाओं के साथ अत्याचार के समाचार छपते ही रहते हैं तो फिर कैसे देश के निवासी ईतनी भव्यता और दिव्यता से कन्यायों, बेटियों और महिलाओं के स्वरूप की आराधना करते होंगें…?

वर्तमान समय के भारत में रोचक विषय पर वैश्विक चर्चा चल रहा है. जिस विषय पर चर्चा चल रही है उसके ‘मर्म’ को कुछ ही लोग जानते हैं लेकिन, पुरे देश में हर किसी के जुबान पर इसकी चर्चा चल रहीं है. वो विषय है “ हिंदू “, हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की. बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहा करते थे कि जिस घर में मन्थरा होगी वो घर बर्वाद हो जाता है. वर्तमान समय में सम्पूर्ण राष्ट्र में ही मन्थरा ही मन्थरा है फिर कैसे संभव है हिंदू, हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की…?

वर्तमान समय के भारत में बेरोजगारों की लंबी फौज के साथ-साथ आधुनिक युग के देवताओं, कर्मचारयों और अर्दलियों की बड़ी फौज है. ईतनी बड़ी आबादी में चंद ही लोग कामगार हैं बाकी बेकार हैं..? चंद कामगारों के कंधों पर देवताओं, कर्मचारीयों और अर्दलियों के फौज को राजसी सुख उपलब्बध करवाने की पूरी जिम्मेदारी के साथ-साथ देश में आए हुये आपदा के लिए भी सहयोग की पूरी जिम्मेदारी है. इतनी बड़ी जिम्मेदारी का वहन करने वाला आम-आदमी… आम-आदमी की तेल निकल गई लेकिन, चंद स्वार्थी लोग की मनमानी चल रही है. स्वार्थी लोगों के कुटिल और स्वार्थी सोच के कारण ही आम लोगों की तेल निकल रही है बाकी ईन्द्रासन पर बैठकर कुटिल चालें चलनें में व्यस्त है.

वर्तमान समय की शिक्षा और व्यवस्था के कई मायने है. देखा जाय तो, बेकारों  की फौज तैयार करने वाली मशीन व व्यस्था भी नए–नए स्वरूप में चल रही है. हम सभी अपने-अपने इतिहास की बात करते हैं लेकिन, कभी भी झाँक कर या यूँ कहें कि अनुभव करके नहीं देखते है बस… भीड़ का हिस्सा बनकर उम्र गुजार लेते हैं. कभी अताताईयों ने जिस राष्ट्र की संस्कृति, इतिहास और वैभव को नष्ट कर दिया था आज उसी अतातीईयों को भगवान मानकर शीस झुका रहें हैं.

जहाँ तक रही शिक्षा की बात तो आपको पता ही होगा कि जिन अतातीईयों को भगवान मानकर शीस झुका रहें हैं उनके ही पुरखे संस्कृति, इतिहास और वैभव को नष्ट कर दिया था. वर्तमान समय में ऐसे अतातीईयों को अल्पसंख्यक कहते हैं उनके लिए केन्द्र व राज्य स्तर पर कई सुविधाएँ उपलब्बध कराई जा रही है. जो कल भी अतातीईयों थे और आज भी अताती हीं है. ये वैसे लोग हैं जो धर्म के नाम पर अनाचार और अत्याचार करते हैं फिर भी इन्हें विशेष प्रजाति का तमगा प्राप्त है.

वर्तमान समय के भारत में शिक्षितों की एक लम्बी फौज है जिसे बेरोजगार भी कहा जाता है. ये शिक्षित बेरोजगार हर साल हनुमान के पूंछ की भांति हीं और लम्बी ही होती जा रही है. इन शिक्षितों के पास कई तरह की डिग्री उपलब्बध है वहीँ, कुछ ऐसे भी है जो बिना डिग्री के हुनरमंद है फिर भी बेरोजगार हैं. बेरोजगारों की श्रेणी में हाल के कुछ वर्षों में बढोतरी हुई है. ये जो नए तरह के बेरोजगार हुये है उनकी वजह है स्वार्थी लोगों के कुटिल सोच…? देश अगले वर्ष अपनी आजादी के सिल्वर जुबली मनाने की तैयारी कर रहा है लेकिन, स्वार्थी लोगों के कुटिल सोच के कारण हनुमान के पूंछ की ही भांति शिक्षित व टेक्नीकल बेरोजगारों की फौज बढती ही जा रही है.

आजादी की सिल्वर जुबली सुनने में जितना कर्णप्रिय लगता है उससे कहीं ज्यादा दर्द अपनों (देवताओं, कर्मचारयों और अर्दलियों) की उपेक्षाओं से.  कुछ बातें कड़वी होती है जैसे… आजादी के बाद अभी तक… शिक्षा और संकृति के अर्थ को बदलना. बात कड़वी मगर सच्ची है कि… जो काम आपके पूर्वजों ने किया वही, आप भी कर रहें हैं साथ ही ढोल भी पीट रहें हैं. आज हम सभी अपने आप को हिंदू, सनातन और ना जाने क्या-क्या कहते हैं… क्या पता आगे आने वाले चंद वर्षों व महीनों में हिंदू और सनातन के मायने व स्वरूप ही बदल जाय.

हम बात कर रहें हैं शिक्षा की, संस्कृति की…. लेकिन, हम सभी अपनी संस्कृति और शिक्षा को दुर कर रहें हैं. भारतीय समाज आज इतनी तरक्की कर ली है कि शिक्षा ही बिकाऊ बस्तु बनकर रह गई है. बात कड़वी मगर सच्ची है कि कितने लोगों को कॉन्वेंट का अर्थ क्या होता है  मालुम है…? फिर भी उनके बच्चे कॉन्वेंट स्कूल में पढ़तें है. जब देश के बच्चे कॉन्वेंट स्कूल में पढेंगें… तो सनातनी संस्कार कहाँ से लायेंगें…?

धार्मिक नगरों में आज भी ‘गुरुकुल’ चल रहें है और वहां आज भी ‘गुरुकुल परम्परा’ का निर्वाह किया जा रहा है. वहां के बच्चों में संस्कार देखने को मिलता है उनके चेहरे पर ओज देखकर शान्ति का अहसास होता है. लेकिन, सरकार की उपेक्षापूर्ण दृष्टि से गुरुकुल बदहाली के कगार पर है. अगर देश की आवाम को सनातनी सोच और संस्कार विकसित करना है या यूँ कहें कि हिंदू राष्ट्र बनाना है तो पौराणिक शिक्षा प्रणाली यानी गुरुकुल को विकसित करना होगा.

आजादी के बाद सरकारी कार्य करने के लिए 15 सालों तक अंग्रेजी में काम करने की मोहल्लत मिली थी लेकिन, अगले कुछ ही महीनों में देश की आजादी के सिल्वर जुबली मनाने की भी  तैयारी चल रही है ‘कॉन्वेंट’ सोच होने के कारण आज भी ‘अंग्रेज’ का भूत सर पर खड़ा है.

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